500 की खाट: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

“कोई काम हो तो दीजिए…” बाबू भाई ने मरी आवाज में कहा।

“क्या कर सकते हैं…” गुप्ताजी सीधे मुद्दे पर आ गए।

बाबू भाई ने गिना दिया कि बीकॉम किया है। हिसाब-किताब कर सकते हैं। दुकान या बिजनेस का सारा कामकाज संभाल सकते हैं।

गुप्ताजी की पारखी आंखों ने फौरन ताड़ लिया कि इस जमाने का बीकॉम किया ये बंदा तो एक फिल्मी स्ट्रगलर है। काम का बंदा है। भूखा भी है।

लिहाजा पहले तो बाबू भाई को गुप्ताजी ने भरपेट खाना खिलाया। वे जानते हैं कि किसी भी मर्द के दिल तक जाने का रास्ता पेट से ही होता है। यह बात औरतें ही नहीं, गुप्ताजी भी समझते हैं।

जब बाबू भाई तृप्त हो गए, उनके मन में गुप्ताजी के लिए कृतज्ञ भाव पैदा हो गया, तब जाकर कहीं गुप्ताजी ने बाबू भाई को लॉज का काम समझाया।

कुछ ही वक्फे में क्लर्क से होते बाबू भाई दत्तात्रय लॉज के मैनेजर बन गए।

पहले गुप्ताजी हर दिन आते थे, बाद में हर रविवार आने लगे।

कुछ समय बाद हर महीने की 10 तारीख आने लगे।

विश्वास बड़ी चीज है। बाबू भाई ने वही कमाई। शादी की नहीं। दत्तात्रय लॉज ही परिवार हो रहा।

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