खून की बू का नशा भी होता है – विवेक अग्रवाल

अपनी नई किताब रक्तगंध के सिलसिले में लेखक विवेक अग्रवाल कहते हैं कि मुंबई अंडरवर्ल्ड के सबसे खतरनाक और सिरफिरे हत्यारे फिरोज कोंकणी से एक बार मुंबई पुलिस की अपराध शाखा के मुख्यालय में दो घंटों के लिए मिलना हुआ। उससे बातचीत के दौरान यह बात उभर आई कि हत्या करना उसका पेशा नहीं, मजबूरी है। यह मजबूरी महज पैसों की नहीं। वह तो एक खतरनाक मानसिक विकार से मजबूर है। उसके जहन और वजूद पर ‘खून की बू’ ने कब्जा कर रखा है। जब फिरोज हत्या करता, तो उसके अंदर नशे की जबरदस्त हूक उठती। उसके मन में जब भी ठनक उठती कि रक्तगंध चाहिए, तो वह इंसानों को मारने नहीं चल देता था। यह काम तो फिरोज बिना पैसे लिए करता ही नहीं था। पेशेवर हत्यारा जो ठहरा।

वे आगे बताते हैं कि बातचीत के दौरान ही यह भी पता चला कि फिरोज खून की बू हासिल करने और वक्तकटी के लिए मुर्गों – मेढ़ों की लड़ाई देखने चला जाता था। जब मुर्गों – मेढ़ों की लड़ाई का समय नहीं होता, तो किसी कसाईखाने के बाहर जा खड़ा होता। जिबह होते मुर्गों और बकरों के बहते खून से मिलने वाली ताजी रक्तगंध अपने में समो कर खुश हो लेता। उसके चिंतन, अवधान, स्मृति, चेतना, भाव पर भी रक्तगंध कब्जा किए है। उसके आगे-पीछे वह कुछ सोच ही नहीं सकता है।

विवेक ने कहा कि फिरोज के मनोविज्ञान और मानसिकता को रेखांकित करती यह कहानी सदा मेरे मानस पर छाई रही। सोचता रहा कि इसे कभी कहूंगा।

“मन में दुश्चिंता भी बनी रही कि पाठक न जाने इस कहानी को कैसे लेंगे। साहित्यकारों और आलोचकों के बीच जब कहानी जाएगी, तो उनके मन में क्या भाव आएंगे। अपराध जगत पर साहित्यिक दृष्टि से कथा लिखी जा सकती हैं, यह सोच कर भी लोगों को अजीब लग सकता है।” विवेक चिंता जाहिर करते हैं। “अपने कुछ साथियों के सामने जब इस बारे में जिक्र करता, तो किसी के मुखमंडल पर वक्र मुस्कान छा जाती, किसी की आंखें हैरत उगल देतीं, किसी की भृकुटी तन जाती। समझ नहीं आता कि क्या करूं!”

“एक दिन विचार आया कि खोजी व अपराध पत्रकारिता के दौरान सदा ‘अंडरवर्ल्ड के पे-रोल’ पर होने के आरोप झेलता आया, तो कहानी लिखने वक्त आरोपों और भावों की चिंता क्यों की जाए। जो मेरी कहानियों के कथातत्व समझने और समाजिक विसंगतियों से उपजे करुण भाव पढ़ने में नाकाम रह जाएंगे, उनके लिए यही कहूंगा कि वे इस समाज का हिस्सा ही नहीं। उनकी संवेदना का स्तर समाज के उसी हिस्से तक सीमित है, जिसमें वे जीते हैं, जिसे वे ऊपरी तौर पर देखते हैं। जीवन से परे कथा कविता हो नहीं सकती; यदि है, तो उसमें जीवन नहीं है। वे भी जीवित नहीं, जो स्याह सायों के संसार को समाज का अंग मानने से इंकार करते हैं।” विवेक ने साफ तौर पर अपने भाव रखे।

लेखक कहते हैं कि अपराध जगत का वह अंदरूनी और काला सच, जो कभी लोगों के सामने नहीं आता, वह उधेड़ कर जस का तस पेश करने का दुस्साहस कर लिया। ये कहानियां मेरे पेशेवर जीवन का अहम हिस्सा हैं। मैं इन्हें ही जिया हूं। इन्हें समाज को सौंपना दायित्व मानता हूं।

वे साफगोई बरतते हैं और यहां भी कहते हैं, “इन कहानियों में जितने चरित्र हैं, वे सब अपने आसपास ही देखे। उनसे मिला हूं। उनके आचार-विचार, चाल-चलन, रंग-ढंग, व्यवहार, अभ्यास, आदतें, स्वभाव पढ़ता रहा। मनोविज्ञान से परिचित हुआ। इन्हें देख-सुन कर हमेशा लगता कि ये ऊपर से क्रूर और राक्षसी दिखने वाले ये लोग, अंदर से कितने कमजोर हैं। कोई परिवार या दोस्तों के लिए कमजोरी पाले बैठा है, कोई बदले के लिए मन की कमजोरी से ग्रस्त है, कोई पेशेवराना जरायम कमजोरी से पीड़ित है, तो कोई जान बचाने के लिए दौड़-भाग कर रहा है। कैसा अजीब लगता है ना कि एक इंसान, जो दूसरों का कत्ल करने के पहले कभी सोचना नहीं है, वह अपनी जान बचाने के लिए कितनी जद्दोजहद करता है। उसे अपनी जान जितनी प्यारी होती है, उतनी ही दूसरों की जान की कीमत क्यों नहीं समझ पाता है?”

विवेक अग्रवाल का मानना है कि सरमायादारों के स्याह सायों के बीच सरगना, सिपहसालार, सुपारी हत्यारे और प्यादे हैं, तो पुलिस अधिकारी और अपराध पत्रकार भी हैं। हर एक की अपनी मानसिकता है, अपना जीवन है, अपने तौर-तरीके और समस्याएं हैं। उनके पास हर मुसीबत का अपना ही निदान भी है। कुछ नहीं है, तो बस चैन और सुकून नहीं। इसी की तलाश जब इंसान करने निकलता है, तो बुद्ध और महावीर हो जाता है। अब ये तो कालजीवों के पाताल लोक में संभव नहीं। वे इसी दुनिया में रौरव नरक जैसी पीड़ा भोगते हैं।

“इन कहानियों का तेवर और कलेवर वर्तमान का है। मेरा वर्तमान सन 1990 से आज तक हिस्सा माना जा सकता है। इस दौर में ही भारतीय समाज के पाताल लोक में विचरती अभिशप्त आत्माओं से साक्षात्कार किए, उन्हें समझा और कागज पर उकेरा है। इन शापित जीवों की नौ कहानियां आपके हवाले हैं।” इतना कह कर विवेक चुप लगा जाते हैं।

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