कोड्स: दिल्ली की सत्य घटना पर आधारित उपन्यास

संसद के बाहर आतंकी होने का शक में पागल माजिद को दिल्ली पुलिस ने पकड़ा। उससे मिले दो सेट आईडेंटीटी कार्ड में अलग-अलग नाम-पतों से शक गहराया। उससे मिली कोडशीट डीकोड करना संभव न रहा।

माजिद के बारे में खबर छपीं तो मां शबनम और वकील इकबाल दिल्ली आए। उन्हें भी पुलिस की स्पेशल सेल के डीसीपी प्रताप सिंह अवैध हिरासत में रख पूछताछ करते हैं।

माजिद का रहस्य बना हुआ है कि दिल्ली में तिहरा बमकांड हुआ। पुलिस की परेशानियां बढ़ गईं। एक दिन प्रताप के सेफ हाऊस में आग लग गई। शबनम-इकबाल गिरफ्त से बाहर आ गए। उनका मामला सामने आने से प्रताप निलंबित हो गया।

प्रताप मुखबिरों के साथ साजिश का खुलासा करने में जुटा। तेजी से चलते घटनाक्रम ने प्रताप को बदनामी के रसातल में पहुंचा दिया। इस बीच पागलखाने में भर्ती माजिद गायब हो गया।

दिल्ली बमकांड के आतंकी गिरफ्तार हुए, तो चौंकाने वाली सूचना मिली कि माजिद की हत्या कर लाश बड़ा कब्रिस्तान में दफना दी है।

शबनम-इकबाल कहते हैं कि माजिद का शव गांव के कब्रिस्तान में दफनाएं। अदालत से इजाजत मिल गई। माजिद की सड़ी लाश की तस्वीरें देख शबनम ने दावा किया कि यह माजिद नहीं है। सब चकराए। डीएनए टेस्ट से पुष्टि हुई कि लाश माजिद की नहीं है।

सवाल उठा कि माजिद नहीं मरा तो कहां गया? लाश किसकी है? शबनम ने इतने पुख्ता तौर पर कैसे कहा कि लाश माजिद की नहीं है?

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