मरीज इलाज से बच भी जाए तो इलाज खर्च से ‘मर’ जाता है!

अशोक भाटिया

कोरोना से जंग में दिन-ब-दिन हिंदुस्तान मजबूत होता जा रहा है और वायरस कमजोर होता दिख रहा है। देश में आज कोरोना वायरस के खिलाफ वैक्सीनेशन का का काम चालू है।

स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक देश भर में 10 लाख से ज्यादा लोगों को कोरोना वैक्सीन दी जा चुकी है। दूसरी ओर जिस तरह मजबूती से पिछले एक साल से हिंदुस्तान कोरोना से लड़ रहा है, उसका नतीजा है कि 7 महीने बाद कोरोना के एक्टिव मामले 2 लाख के नीचे पहुंच गए हैं और देश में 8 महीने बाद कोरोना संक्रमण की वजह से 1 दिन में होने वाली मौत का आंकड़ा भी कम होता जा रहा है।

एक ओर कोरोना वायरस पर वैक्सीन का प्रहार जारी है। लगातार बरती जा रही सावधानियों और तैयारियों का नतीजा है कि वायरस के अंत का आगाज हो चुका है और वो दिन दूर नहीं, जब हालात नॉर्मल हो जाएंगे।

कोरोना वायरस की चपेट में आए लोगों के इलाज में हुए खर्च से उन लोगों और उनके परिवारों की जो आर्थिक सेहत बिगड़ी है, वो नॉर्मल होने में शायद बहुत वक्त लग जाएगा और जब तक सबको वैक्सीन नहीं लग जाती है, तब तक ना जाने कितने लोग आर्थिक तंगी के शिकार हो जाएंगे।

एक विश्लेषण के मुताबिक 80 फीसदी से ज्यादा परिवार किसी एक सदस्य के कोरोना संक्रमित होने के बाद उसके इलाज पर होने वाले खर्च से आर्थिक तंगी का सामना कर सकते हैं। भले ही राज्यों में इलाज के खर्च की एक सीमा तय कर दी गई हो, लेकिन उसके बाद भी 10 दिन के इलाज का बिल उनके मासिक खर्च से कई गुना ज्यादा है।

इस चिंता को इन दिनों बढ़ा दिया है सोशल मीडिया पर वायरल हो रही एक दवा की तस्वीरों और उसमें छपी कीमतों की तस्वीरें हैं, जिसमें एक दवा के दो पत्ते दिख रहे हैं। ये कोरोना के दौरान दी जाने वाली दवा है। फोटो में आइवरमेक्टिन टैबलेट के दो पत्ते रखे हुए हैं। एक की मैन्यूफैक्चरिंग डेट सितंबर 2020 है और दूसरे की अक्टूबर 2020। पहले की एमआरपी 195 रुपये है और दूसरे की 350 रुपये यानी करीब-करीब 80 प्रतिशत की बढ़ोतरी।

सोशल मीडिया यूजर्स इस तस्वीर को शेयर करते हुए कोरोना काल में भी जारी लूट के लिए फार्मा कंपनियों, सरकार और सिस्टम पर सवाल उठा रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि दवा के दाम तय करने का सरकारी सिस्टम क्या है? कैसे उसकी एमआरपी तय होती है, और कैसे चंद पैसों में बनने वाली एक गोली कई गुना ज्यादा दाम में बिककर आपकी और हमारी जेब पर किसी गोले की तरह गिरती है?

भारत में दवा मरीजों का इलाज भी करती है और उन्हें मर्ज भी देती है। महंगी दवाएं खाकर भले ही मरीज ठीक हो जाए, लेकिन उसकी और उसके परिवार की आर्थिक सेहत बुरी तरह बिगड़ जाती है। ईलाज और दवा पर होने वाले खर्च की वजह से देश में हर साल 3 करोड़ 8 लाख लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।

ये दर्द लोगों को उन गोलियों से मिलता है, जो एक ओर उनकी बीमारी दूर करने के काम आती हैं। दूसरी तरफ जेब पर आग के गोले की तरह गिर कर उन्हें आर्थिक तौर पर बीमार बना देती है और कोरोना काल में भी ये बदस्तूर जारी है।

सोशल मीडिया पर वायरल आइवरमेक्टिन 12 एमजी टैबलेट के पत्ते की तस्वीरों के मुताबिक सितंबर 2020 मैन्यूफैक्चरिंग डेट वाली एक गोली की कीमत 19 रुपये 50 पैसे बैठती है। जो अक्टूबर 2020 की मैन्युफैक्चरिंग डेट वाले पैक में बढ़कर 35 रुपये प्रति गोली हो जाती है। आप लेकिन चौंक जाएंगे कि इसी आइवरमेक्टिन 12 एमजी टैबलेट की अलग-अलग कंपनियों में बनी एक गोली की एमआरपी 1 रुपये 70 पैसे से 58 रुपये 50 पैसे तक है।

ये सिर्फ एक दवा की कहानी नहीं है, बल्कि सैकड़ों दवाओं की हैं, जो हिंदुस्तान में बनती हैं, बिकती हैं।

देश में दवाओं की कीमत नियंत्रित करने के लिए एनपीपीए यानी नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी है। देश में 10 हजार से ज्यादा दवाइयां बनाई और बेची जाती हैं। इनमें से सिर्फ 874 एसेंशियल ड्रग की कीमतों को सरकार कंट्रोल करती है।

मतलब ये कि 874 को छोड़कर बाकी दवाओं को फार्मास्युटिकल कंपनियां कहने के लिए तो एमआरपी पर बेच रही हैं। हकीकत में मनमाफिक दाम वसूल रही हैं।

ये एमआरपी तय कैसे होता है, अब ये समझ लीजिए। फार्मा कंपनियां दवा बनाती हैं, इनमें से सरकार कुछ दवाओं की एमआरपी तय करती है, कुछ की नहीं। कंपनियां अपनी लागत और मुनाफा जोड़कर डिस्ट्रीब्यूटर को देती हैं। डिस्ट्रीब्यूटर 16 फीसदी मार्जिन पर रिटेलर्स को देते हैं। रिटेलर्स 8 फीसदी मार्जिन पर बेचते हैं।

देश में करीब 3000 फार्मास्यूटिकल कंपनियां दवा बनाती हैं। इनमें 90 फीसदी से ज्यादा प्राइवेट कंपनियां हैं। इन प्राइवेट कंपनियों के दांव-पेंच इतने शक्तिशाली और सरकार के कानून इतने कमजोर हैं कि भारत में मरीजों का मर्ज से पीछा छूटने के बाद भी महंगी दवाओं का दर्द सालों-साल सालता है।

ऐसे में सवाल ये है कि आखिर महंगी दवाओं के जंजाल से आप और हम कैसे बच सकते हैं? तो उसका जवाब है, ब्रांडेड दवाओं की जगह जेनेरिक दवाओं का इस्तेमाल।

आखिर ये जेनेरिक दवाएं क्या हैं? क्या ये ब्रांडेड दवाओं जितनी ही कारगर होती हैं? क्यों जेनेरिक दवाएं ढूंढना सागर में मोती चुनने जैसा मुश्किल है?

जेनेरिक दवा, मतलब किसी भी दवा का केमिकल नाम, जिसे साल्ट भी कहा जाता है।

मान लीजिए आपको बुखार आया है, आपने पैरासिटामॉल नाम की दवा खाई, तो ये एक जेनरिक दवा हुई। इसके केमिकल का नाम भी पैरासिटामॉल ही है, लेकिन जब पैरासिटामॉल साल्ट से बनी गोलियां पर बड़ी-बड़ी कंपनियों के नाम वाला रैपर लग जाता है, तो वो ब्रांडेड हो जाती हैं। जो महंगे दामों पर बिकती हैं। जेनेरिक में पैरासिटामॉल की 500 एमजी की एक गोली 50 पैसे की होती है। ब्रांडेड पैरासिटामॉल की एक गोली की कीमत एक रुपये हो जाती है।

अपने देश में 6 से 8 लाख मेडिकल स्टोर हैं, उसमें सिर्फ 4-5 हजार जनऔषधि दुकानें हैं यानी 1 प्रतिशत से कम। आप साधारण मेडिकल स्टोर पर जाएंगे, तो जेनेरिक नाम से मेडिसिन मिलेगी ही नहीं। जेनेरिक दवाओं को कम असरदार बताते हुए, उस कंपनी की दवा थमा देते हैं जिस पर मोटा मार्जिन मिलता है। सच ये है कि जेनरिक दवाएं भी ब्रांडेड दवाओं जितनी ही कारगर हैं, वैसा ही इलाज करती हैं जैसा ब्रांडेड दवाएं।

भारत में वहम की बीमारी और महंगे चीज को ही अच्छा मानने की मानसिकता, दवाओं के नाम पर बेहिसाब मुनाफाखोरी के खत्म नहीं होने की एक बड़ी वजह है।

दूसरी वजह है कुछ डॉक्टरों, केमिस्ट और दवा कंपनियों की सांठगांठ, जिसे आप और हम जेनेरिक दवाओं को अपनाकर तोड़ सकते हैं। दवाओं के दाम से जेब जलने से बचा सकते हैं।

ब्रांडेड बनाम जेनेरिक दवा की ये जंग जारी है और इस जंग में अगर जीत जेनरिक की हुईं, तो देश में हर साल दवाओं के दाम चुका-चुकाकर कंगाल हो रहे करोड़ो लोगों को गरीब के दलदल में धंसने से बचाया जा सकेगा।

सरकार भी डॉक्टरों से जेनेरिक दवा लिखने की अपील कर चुकी है। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया भी चेतावनी दे चुकी है कि ऐसा नहीं करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी। इसके बावजूद बहुत से डॉक्टर अब भी जेनेरिक दवा लिखने से परहेज कर रहे हैं।

यहां पर हम एक बात साफ कर देना चाहते हैं कि देश के सारे डॉक्टर्स ऐसा नहीं करते हैं। हम देश के तमाम डॉक्टर्स से अपील करना चाहते हैं कि वो भी मुनाफे के लिए महंगी दवाओं के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए आगे आएं। आप भी जेनेरिक दवाओं को लेकर जागरूक हों।

लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं। विगत चार दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।

अ-001 वैंचर अपार्टमेंट, वसंत नगरी, वसई पूर्व -401208 (जिला – पालघर), फोन / वाट्सएप +919221232130

(उक्त लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। संपादक मंडल का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

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