हथियारों का कुटीर उद्योग – भाग 8

बड़ा होकर बनाऊंगा कट्टे

“जब हम पढ़-लिख नहीं सकते तो क्या करेंगे, वही जो बाप-दादा करते आए हैं। हम भी कट्टे बनाएंगे।“ यह था जवाब एक छोटे से बच्चे का जो सिकलीगर समाज के उस अंधियाले हिस्से में पल-बढ़ रहा है, जो उसे भी अपराधी बनने की तालीम दे रहा है। इन बच्चों में देश और समाज के लिए कोई भावना ही नहीं हैं। हो भी तो कैसे, उन्होंने इन शब्दों का अर्थ ही नहीं जाना है। ऐसे ही कुछ बच्चों से इंडिया क्राईम के लिए देश के ख्यातनाम खोजी पत्रकार विवेक अग्रवाल ने इस इलाके के अंदर तक जाकर बातचीत की तो दंग रह गए। जानिए क्या कहते हैं ये बच्चे। इंडिया क्राईम की यह बेहद खास और एक्सक्लूसिव रपट-

 

“बड़ा होकर बनाऊंगा कट्टे”, यह बात कोई और नहीं आठ साल का नन्हा सा जवाहर कहता है। यह बात सुन कर किसी को भी हंसी आ सकती है, लेकिन खतरनाक बात यह है कि छोटा सा जवाहर अपने पिता की मदद कट्टे-पिस्तौल-रिवाल्वर बनाने में करता है। उनकी तरह ही बड़े होकर कट्टे बनाने की बात भी कहता है।

 

यह भयावह और रोंगटे खड़े कर देने वाला जवाब सुनने के बाद खुद से ही यह पूछने के लिए मजबूर होना पड़ता है कि कहां सो रही है हमारी सरकार? कहां है वे संगठन, संस्थान और एनजीओ जो पिछड़ों के उत्थान के नाम पर करोड़ों रुपए के अनुदान डकार रहे हैं?

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अपने छोटे-छोटे हाथों से मासूम सा चेहरे पर एक जोड़ी भोली सी आंखें सजाए आठ साल का छोटा सा जवाहर सिंह भाटिया अपने पिता पास बैठा है। जिस उम्र में उसके हाथों में होनी चाहिए कलम और किताबें, उस उम्र में जवाहर एक पिस्तौल बना रहा है। यह पिस्तौल खिलौने वाली नहीं है, उससे वाकई गोलियां चलती हैं। उनके दहानों से निकलता है पिघला सीसा है, जो किसी की भी जान ले सकता है।

 

लाभ सिंह को देख कर लगता ही नहीं है कि उसके मन में विचारों का कोई बवंडर पल रहा होगा। वह तो एक छोटा सा मासूम बच्चा ही दिखता है। जिस बच्चे के मन में पुलिस, डॉक्टर या इंजीनियर बनने की इच्छा होना चाहिए, उससे जब पूछा कि वो बड़ा होकर क्या बनेगा, तो जवाहर के मुख से अनायास ही निकलता है, “कट्टे बनाऊंगा।”

 

दिन-रात अपने पिता, चाचा, ताऊ और पड़ोसियों को कट्टे बनाते देख कर और उनके काम में मदद कर-करके छोटा सा लाभ सिंह भी कट्टे, रिवाल्वर और पिस्तौलें ही बनाने के ख्वाब देखने लगा है। उसका पिता भी कोई जवाब नहीं दे पाता है।

 

लाभ सिंह के पिता कहते हैं कि उनकी हैसियत नहीं है कि बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल भेज सकें। उनके पास अगर पैसे होते तो क्या बात थी, उनके बच्चों का भी भविष्य बन जाता। वे हथियार बनाने का काम सीखते ही क्यों? अब करें तो क्या करें, मजबूरी है कि ये भी इस उम्र से ही हथियार बनाना सीख रहे हैं।

 

लाभ सिंह स्कूल नहीं जाता है। उसके पिता की इतनी कमाई नहीं कि स्कूल भेज सके। फीस भरना उसके बूते में नहीं। और फीस में छूट इसलिए मिलती नहीं है क्योंकि उनको अनुसूचित जाति या जनजाति नहीं माना जाता है। तो ऐसे में हर सिकलीगर का बच्चा लाभ सिंह जैसा ही होगा, कोई भी लोहा कूटना नहीं छोड़ पाएगा।

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