डोकलाम से सैन्य वापसी भारतीय जीत नहीं, चीन की मजबूरी

विवेक अग्रवाल

 

पिछले दिनों भारतीय कूटनय और राजनय की जीत के खूब ढोल बजे। सबने वर्तमान सरकार की नीतियों और खूबियों पर ऐसे-ऐसे कसीदे पढ़े कि लगा चीन को बस अब पटकनी देने में चंद क्षण ही लगेंगे। डोकलाम से चीनी सेना की वापसी का सच क्या है, उसके व्यापक अर्थ क्या हैं, यह जानने की किसी ने कोशिश ही नहीं की। सच तो यह है कि चीन ने घरेलू मजबूरी में यह कदम उठाया, न कि ब्रिक्स में कुछ मुद्दे उठ जाएंगे, इस डर से। न तो वह बारत से डरता है, न ही अमरीका से, न उसे रूस से कोई खतरा है। भारत सदा उसके लिए कमजोर कड़ी ही रहा है। ऐसे में डोकलाम से वापसी के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? निश्चित ही ब्रिक्स बैठक तो नहीं।

 

सच तो यह है कि चीन इन दिनों दो बड़ी आपदाओं से जूझ रहा है, एक प्राकृतिक, दूसरी आर्थिक।

 

पहले प्राकृतिक आपदा की बात करते हैं। चीन में पिछले दो सालों से लगातार आ रहे चक्रवाती तूफानों और बाढ़ ने उसके न केवल मानव संसाधन पर बुरा असर डाला है, पूरी शक्ति इस समस्या से जूझने पर लगानी पड़ी है। जुलाई 2017 में टाइफून नेपारटक के कारण चीन का एक हिस्सा तबाह हो गया। इस आसमानी आफत के कारण चीन में 612 नागरिकों की अकाल मौत हुई। इसके कारण चीन को लगभग 233.1 बिलियन युआन (35 बिलियन अमरीकी डॉलर) का नुकसान हुआ। चीन के गृह मंत्रालय ने ये आंकड़े जारी किए हैं। 10 लाख 87 हजार घर तबाह हो गए। लगभग 7.3 मिलियन हैक्टेयर खेतों की फसल नष्ट हो गई। 1.5 मिलियन हैक्टेयर खेतों से तो अब फसल भी हासिल नहीं हो पाएगी, उसकी एसी गत बन चुकी है। चीन के कुल 29 प्रांतों पर इस तूफान का असर हुआ था।

 

दो अलग-अलग तूफानों ने चीन की कमर तोड़ कर रख दी। विगत पांच बरसों में इतना भयानक तूफान चीन ने नहीं झेला था।

 

मावर नामक चक्रवाती तूफान के कारण चीन में खासी बाढ़ आई। दक्षिण-पूर्वी चीन में दो सप्ताह के छोटे से वक्फे में मां प्रकृति का प्रकोप चीन को तीसरी बार झेलना पड़ा। यह बात और है कि मावन का सीधा असर तटों पर कम हुआ क्योंकि उसकी गति तटवर्ती इलाकों तक पहुंचने के पहले ही धीमी पड़ गई थी। इसके बावजूद जो बारिश हुई, उसने भारी तबाही मचाई। हांगकांग से 125 किमी पूर्व में चीन के दो शहरों शानवेई और शांतोऊ के बीच से यह तूफान गुजरा। गुआंगडोंग तट पर आसमानी बारिश ने कहर ढा दिया। कई जगहों पर 80 मिमी तक बारिश चंद घंटों में हुई थी। चीन को तुरंत इस इलाके में जन-धन हानी रोकने के लिए पूरी ताकत झोंकनी पड़ी। लोगों को घरों में रहने के लिए कहा। खुद ही सैंकड़ों पेड़ काट गिराए। तमाम तटवर्ती इलाकों में नागरिकों को जाने से रोक दिया। बाढ़ से निपटने की आपात्कालीन तैयारियां पूरी तैयारी के साथ सड़कों पर जा पहुंची।

 

मावर के पीछे-पीछे टाइफून हातो और पाखर ने भी चीन में कम तबाही नहीं मचाई। हातो तूफान 23 अगस्त को मकाऊ से टकराया और 10 लोगों की जान लेता, 244 लोगों को घायल करता गुजरा। सैंकड़ों उड़ानें रद्द हुईं। बिजली – पानी सेवा बंद हो गई। वहां की आर्थिक रीढ़ कहलाने वाले तमाम जुआघर बंद करने पड़े। हांगकांग में भी इससे एक बिलियन डॉलर का सीधा नुकसान हुआ।

 

पाखर तूफान ने महज चार दिनों बाद ही आकर सीधा असर डाला। सैंकड़ों पेड़ जड़ों से उखाड़ डाले। बारिश से बाढ़ आ गई और तमाम इलाके जलमग्न हो गए।

2017 की जुलाई के पहले सप्ताह में भारी बारिश के चलते चीन में जनजीवन ठप्प पड़ गया। बाधों पर बनी तमाम पनबिजली योजनाएं बंद करनी पड़ीं ताकी उनके कारण लोगों को नुकसान न हो। यांग्तेज नदी के आसपास के जो तबाही हुई, उससे 56 लोग मारे गए और लगभग चार बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। भारी बारिश से पहाड़ दरकने लगे, कीचड़ ने गांवों-शहरों की हर सड़क पर कब्जा जमा लिया। 11 राज्यों में इसका प्रभाव हुआ और 56 लोग मारे गए, 22 लापता हो रहे। सात लाख 50 हजार हैक्टेयर जमीन की फसल बरबाद हो गई। सीधा नुकसान 25.3 बिलियन युआन याने 3.72 बिलियन डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा।

 

चीन के सरकारी आंकड़ों पर भरोसा करें तो झेजियांग, जिंयाग्सी, हुनान और गुईजोऊ प्रांतों में हालात से निपटने के लिए आपात्कालीन धन के रूप में 700 मिलियन युआन याने 103 मिलियन डॉलर की रकम जारी की।

 

गुईझोऊ में प्राकृतिक गैस पाईप लाईन गाद बहाव के कारण फट गई, जिससे हुए धमाके ने 8 लोगों को मार गिराया, 35 घायल हुए।

 

जुलाई 25, 2017 से चीन में बाढ़ से जो तबाही हुई, उसमें 120 लाख लोगों को घर छोड़ कर शिविरों में जाना पड़ा। चीन के जियांझी प्रांत में ही 430 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। हुनान राज्य में 53 हजार घर नष्ट हो गए।

 

तो सवाल उठता है कि क्या ऐसे हालात में चीन अपनी सेनाओं, धन और नागरिक अधिकारियों की तमाम ताकत भारत के साथ पूर्णकालिक युद्ध में झोंकने की स्थिति में था? क्या वह ऐसा करके अपने लिए नई मुसीबत पैदा कर सकता था? क्या बाढ़ के दौरान नागरिकों के लिए सहायता हाथ बढ़ाने के बदले बंदूकें थमाने की स्थिति थी? क्या विपदाग्रस्त नागरिकों को राशन देने के बदले, सेना के लिए राशन पहुंचाने की स्थिति में चीन था? क्या बाढ़ के कराण तबाह हुई सड़कों, रेलवे और हवाई यातायात के अलावा तमाम गोदियों की बदतर स्थिति में एक से दूसरे स्थान पर सेना और असलाह पहुंचाने में चीन सक्षम था? क्या जो रकम तबाही से निपटने के लिए खर्च करनी है, वह युद्ध के उन्माद पर झोंकने की स्थिति में चीन था?

 

नहीं। तो फिर डोकलाम विवाद से परे हटना उसकी मजबूरी थी, कूटनीतिक या राजनयिक हार बिल्कुल नहीं।

 

यह आशंका जताई जा रही है कि चीनी अर्थव्यवस्था कमजोर होती जा रही है और उसका पूंजी बाजार कभी भी धराशायी हो सकता है। यदि ऐसा होता है तो विश्व भर में भारी आर्थिक संकट पैदा हो सकता है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि चीन का बढ़ता कर्ज, आगामी भारी संकट की ओर इशारा कर रहा है। यह कर्ज तेजी से बढ़ रहा है। दुनिया की सबसे बड़ी दूसरी अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडराते दिख रहे हैं। वित्त बाजार के जानकारों का कहना है कि कर्ज पर ब्याज तक हासिल कनरा दूभर हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि चीन का कर्ज उसकी अर्थव्यवस्था का 257 फीसदी हो चुका है। पिछले 10 सालों में यह लगभग 150 फीसदी बढ़ा है। इसका आकार स्थापित करता है कि चीन पर गहरा आर्थिक खतरा मंडरा रहा है। इशके चलते कुछ ही समय में चीन के बैंकों पर मुसीबत आ सकती है और अर्थव्यवस्था थम सकती है।

 

इन हालात के चलते चीन सरकार अर्थव्यवस्था में सुधार लाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। कई तरह की पाबंदियां लगाई जा रही हैं। उद्योगों और कार्पोरेट जगत से कर्ज वसूली के लिए लगातार कोशिशें हो रही हैं।

 

यह खबर भी उड़ रही है कि चीन की सरकार ने कुछ ऐसे कदम उठाए हैं, जिससे विदेशी मुद्रा बाहर जाने पर रोक लगे। चीन अब इस कोशिश में लगा है कि उसके अधिकारी व नागरिक राष्ट्रीय धन की बरबादी विदेश जाकर न करें। इसके ठीक उलट वे देश के लिए विदेशों से धन कमाने की दिशा में काम करें। चीन ने तय किया है कि अब वह विदेशों में संपत्ति नहीं खरीदेगा, जिससे मोटी रकम बचेगी। इसके अलावा होटलों, खेल क्लबों, मनोरंजन और फिल्म उद्योग पर भी खर्च घटाएगा। वह अब नई सड़कें और कारोबारी इलाके तैयार करने पर जोर देगा, जिससे आसपास के देशों से उसके संबंध प्रगाढ़ हों। उनके साथ कारोबार मजबूत हो। उनके इलाकों में अपना माल बेच कर मोटा मुनाफा कमाए। चीन की एक केंपनी ने लंदन में एक संपत्ति एक बिलियन पाऊंड में खरीदी। दूसरी पर 1.3 बिलियन पाऊंड खर्च किया। चीन की सरकारी और गैरसरकारी कंपनियों ने पूरी दुनिया में संपत्तियों की खरीद का सिलसिला ही शुरू कर दिया था। कई विदेशी कंपनियां भी चीन ने खरीदीं। लॉजीकोर की खरीद पर पर चीन ने 12.3 बिलियन यूरो खर्च किए। जब चीनी सरकार ने देखा कि कई कंपनियां विदेशों में भारी निवेस कर रही हैं तो अपने बैंकों को निर्देश दे दिया कि बिना सरकारी इजाजत किसी कंपनी को विदेशों में बड़ी रकम स्थानांतरित न करने दें।

 

चीनी कंपनियों को विदेशी खरीद-फरोख्त रोकने के पीछे क्या चीन की खस्ता हाल होती जा रही अर्थव्यवस्था माना जा सकता है? जी नहीं, वह अपना विदेशी मुद्रा भंडार बचाना चाहता है ताकी उसका सदुपयोग कर सके। ऐसे समय में जब अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियां चीन के बरखिलाफ हों, चीन यह कोशिश करेगा कि विश्व बिरादरी में उसके खिलाफ माहौल न बने।

 

तो सवाल यह भी उठता है कि इन हालात में क्या चीन एक और युद्ध झेलने की स्थिति में है? ऐसे वक्त में जब चीन के लोग अपनी साम्यवादी सरकार से त्रस्त हो चुके हैं, वित्त बाजार की हालत पतली होने पर वहां क्या हालात बनेंगे, क्या चीनी नेताओं को इसका भान नहीं होगा? क्या एक युद्ध चीन को लंबे समय के लिए आर्थिक तौर पर पूरी दुनिया में पीछे नहीं कर देगा? चीन का विस्तारवादी रवैय्या सब जानते हैं, ऐसे में विश्व बिरादरी उसके तुरंत खिलाफ खड़ी हो जाएगी। पूरी दुनिया में उसके उत्पादों का विरोध शुरू हो गया तो उसकी कथित शानदार अर्थव्यवस्था का कचूमर निकलते क्या देर लगेगी? तो क्या ऐसे में वाकई भारत से युद्ध करके चीन घर में संकट पैदा करना चाहेगा?

 

नहीं। तो फिर डोकलाम विवाद से परे हटना उसकी मजबूरी थी, कूटनीतिक या राजनयिक हार बिल्कुल नहीं।

 

मुद्दा यह नहीं कि कौन इस खेल में जीता, कौन हारा? मुद्दा यह है कि इस मामले में भारतीय नेतृत्व और समाचार माध्यम समझदारी का परिचय नहीं दे रहे हैं। इसे वर्तमान प्रधानमंत्री की एक महान कूटनितिक जीत बता कर जो ढोल-नागेड़े पीटे जा रहे हैं, जो छाती कूट-कूट कर शोर मचाया जा रहा है, उससे चीन जैसे विस्तारवादी और अधिनायकवादी प्रवृत्ति के देश को उकसाया जा रहा है। यह सबको समझना चाहिए कि चीन जैसे ही हालात ठीक कर लेगा, वैसे ही भारत के खिलाफ फिर खड़ा हो जाएगा। कूटनीति और राजनय का तकाजा है कि इस तरह की हार-जीत का ढिंढोरा ना पीटा जाए। क्या कोई सुन रहा है?

(लेख प्रथम प्रकाशित सुबह सबेरे अंक 09 सितंबर 2017)

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