नपुंसकता सिर्फ शारीरिक ही नहीं होती!

अपने सपनों के देश के कानून, नियमों और भविष्य की धज्जियां उड़ते चुपचाप देखते रहना भी नपुंसकता है। महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, आज़ाद, बिस्मिल भी यदि चुप रहते तो क्या होते आज हम?

हमें तो प्राण भी नही बलिदान करना है, बस एक याचिका दाखिल करनी है, आवाज़ उठानी है। सामूहिक आवाज़! साथ देना है एक स्वर में किसी व्हिसलब्लोअर का! बस! अखबार जैसा विराट आईना आपको रोज मुंह दिखाता है।

समस्याएं क्या गिनाऊँ? आप स्वयं चर्चा करते हैं उनकी हर दिन! आप खुद व्यथित हैं उनसे कि ये हो क्या रहा है… जमाना किधर जा रहा?! प्रशासन बेबस दिख रहा!

बस वही सब समस्याएं जो एक व्यवस्था को आदर्श बनने से रोकती हैं, वही जो अराजकता चाहती है, वही जो उछृंखल हैं, वही जो उत्पाती हैं।

वही जो अनुशासन को सख्त नापसन्द करती है, और मनमर्जी की तालिबानी सोच थोपना चाहती है।

वही जो सोचती है कि, सारी कायनात सिर्फ उनके उपभोग के लिए बनी है। नहीं!

कायनात, सिस्टम, देश, तंत्र, सबके लिए बने है। लोकतंत्र है यह। सबको नियम पालन करने होंगे।

अनुचित लगे तो भी आवाज़ “नियमानुसार” ही उठानी होगी । एक व्यक्ति भी जब नियम तोड़ने की शुरुआत करता है, तो रक्तबीज की तरह हजारो पैदा करता है, जो उसे देखकर, जानकर फिर वही कृत्य दोहराते है। दोहराव सख्ती से वर्जित करना होगा।

नियमों को ईश्वरीय पूजन की तरह मान देना होगा, संविधान को, नियमोँ को ‘मस्तक मुकुट’ समझना होगा, तो व्यवस्था गौरवशाली बनेगी। इसे ढहाना…. या इसे आदर्श बनाना हमारे ही ऊपर निर्भर है।

व्यवस्था तो एक निर्जीव शब्द है, उसका क्या दोष, प्राण उसके हम ही है। तो व्यवस्था चाहने वाले ही नही। व्यवस्था को सुशासित रखने वाले बनना है हमें । सबका है देश। सब खिलाएं इसे, तब तो देश हुआ!

परदेस की तरह “समय गुजारती” जीवात्माएं बनकर अनमोल जीवन को गवांए नहीं। अपना घर, परिवार जैसा, वैसा देश भी अपना प्रिय हो। उतना ही प्रिय।

मीडिया की आलोचना भी स्वीकार है। ये वही लोग है जो स्पंदित है जो किसी अन्याय पर आंदोलित होते हैं। जो बर्दाश्त नही कर पाते अनुचित को! जिससे उनका व्यक्तिगत सम्बन्ध नही उस अन्याय को भी दिल में रखकर लड़ते है। भिड़ते है। कोई बचाव नहीं है कोई निजी सेना या हथियार नही, लाठी तक नही पास। पर दुर्गा सी असीम आंतरिक शक्ति प्रकट होती है उनमें और बस उसी के सहारे बाहुबलियों से भिड़ते। विधायक मंत्री पुत्र के दुष्कर्म, बाहुबली को जेल भिजवाना या फर्जी अंकोउन्टर की पोल खोलना या उत्तरप्रदेश बिहार मप्र के खतरनाक खनन माफिया की खबर देना, व्यापमं या नीट की सेटिंग, नकली आईएएस या सरकार से भिड़ना सब खतरे मोल लेकर काम करना। जबकि

अधिकांश कर्मी बेहद सामान्य परिस्थितियों के बाशिंदे है। पर वे विराट युद्ध करते हैं।

अपने घर देर रात को लौटते है तो घर मे वही सब समस्याओं को पाते है जो दूसरों की है। सुबह इस स्वीट होम को भूलकर फिर मैदान में डटे रहते है, यह सोचकर कि सबके घरों की खातिर निकल चलो ड्यूटी पर। वरना नकली दूध, दवाइयों के फार्मूले उसे भी ज्ञात है, शॉर्टकट से धन के ढेर कैसे खड़े होते है पता है फार्मूले सब। हर खबर की खबर उसका रूटीन है पर नही, वह स्वार्थी नही इसलिए तो यह क्षेत्र चुना। इसलिए तो आवाज़ बना सबकी, सब जो बोलने से हिचकते है सब जो खुद को निर्बल मान बैठे उन्ही की आवाज़ उन्ही की चौकीदारी उन्ही की लड़ाई। तो उन्हें ही जगा रहा मीडिया कर्मी की जागो, मेरा बोझ कुछ तो कम करो। मनोरंजन नही है अखबार!यह आज है तुम्हारा, यह कल है तुम्हारा।

मीडिया ही जो हर पल प्रमाणित कर रहा कि देश उसे परिवार की तरह प्रिय है। अगण्य से बुराई मोल ले रहा। गालियां झेल रहा, पर योद्धा बन डटा हुआ है।

धन इसमें नही है, यह तो एक मिथ्या आरोप ही है, सेना पर लगे आरोप की तरह, लज्जाजनक व्यवहार है यह देशभक्ति के प्रति। सच तो यह है कि सबसे असुरक्षित, क्षीण आर्थिक परिस्थितियों में जारी कर्मक्षेत्र है मीडिया का यह धर्मक्षेत्र।

तो सगर्व जारी रखिये यह युद्ध।

अमेरिका या ब्रिटेन या फ्रांस, सिर्फ अच्छी सड़कों से नही मित्र बल्कि, खुले तार्किक, वैचारिक स्वतंत्रता पूर्ण, लोकतांत्रिक व्यवस्था से शीर्ष पर विराजित है। वहां के देशवासी अपने नियमों के पालन के लिए सदैव सगर्व समर्पित, तत्पर रहते है।

मनोज शर्मा गांधी

लेखक देश के प्रतिष्ठित लेखक-संपादक, मीडिया कंसलटेंट, निर्वाचन मीडिया प्रभारी, वृत्तचित्र निर्माता, अभिनेता, एवं यूनिवर्सिटी मीडिया फेकल्टी हैं। देश, समाज, नागरिकों, व्यवस्था के प्रति चिंतन और चिंता, उनकी लेखनी में सदा परिलक्षित होती है।

(लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। इससे इंडिया क्राईम के संपादक या प्रबंधन का सहमत होना आवश्यक नहीं है – संपादक)

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