रक्तगंध: अंडरवर्ल्ड के रक्तरंजित शब्दचित्र उकेरती किताब

रक्तगंध में कथावस्तु, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, भाषा, शैली और वातावरण विस्तार पर खूब काम हुआ है। हर कहानी के मूल तत्वों की भांती, इन कहानियों के उद्देश्य सहज ही सामने आ जाते हैं। उनकी अर्थपूर्णता और विषयानुकूलता पर भी विवेक अग्रवाल ने खासा ध्यान दिया है। भावबद्ध अथवा अर्थसूचक कहानियों में कथानक की रचना अत्यंत सहज-सरल तरीके से क्रमिक विकास लेती गई हैं।

मौलिकता, संभाव्यता, गठन एवं रोचकता के पैमानों पर इन कहानियों के कथानक पूर्णतः खरे उतरते हैं। कहानियों के सभी विषय एवं पात्र पूरी तरह नवीनता लिए हैं।

रक्तगंध की कहानियों में चरित्र-चित्रण पर विवेक अग्रवाल ने खासा जोर दिया है। कहानियों के पात्र ही कहानी के सजीव संचालक हैं, जिनके जरिए हर कहानी जिवंत बन पड़ी है। इन पात्रों के जरिए आप उनसे जुड़ते जाते हैं। ये पात्र सजीव होकर आंखों में तैरने लगते हैं। उके अपराधी होने के बावजूद, उनके साथ आत्मीयता का प्रकटन होने लगता है।

अपराध जगत के ये पात्र सजीव और स्वाभाविक हैं, जिनका अवतरण लेखक की कल्पना के धरातल से नहीं बल्कि उनके कार्यक्षेत्र से आए हैं। ये सब उनके अंतस में पैठ बनाए रहे हैं, और उनकी आत्मानुभूति के धरातल से एक-एक कर प्रकट होते लगते हैं।

इन कहानियों के सभी पात्र नकारात्मक हैं। वे ही मुख्य पात्र हैं, तो सचरित्र पात्र इनमें सहायक पात्र बन कर सामने आते हैं। इन कहानियों के पात्रों के स्वभाव, व्यक्तित्व और चिंतन प्रणाली बखूबी महसूस किए जाते हैं। ये यथार्थवादी, व्यक्तिवादी, मनोवैज्ञानिक, प्रतीकात्मक, आदर्शवादी वगैरह हैं लेकिन स्वप्नलोक में जीने वाले नहीं हैं। जीवन के कठोर सत्य झेलते हुए विवेक की कहानियों के पात्र सामने आते हैं। इन पात्रों की अनुकूलता, मौलिकता, स्वाभाविकता, सजीवता, यथार्थता, सहृदयता के साथ ही साथ अंर्तद्वंद्, उहापोह या कशाकश भी मुखर होकर दिखती है।

कहानियां अपने अनूठे संवादों के कारण और भी पठनीय हो जाती हैं। सभी कहानियां वातावरण विस्तार के साथ ही संवादों के जरिए भी आगे बढ़ती जाती हैं। हर कहानी अपनी शैली के संवादों के साथ बढ़ती जाती है, जिससे हर कहानी के पात्र मुखर होकर अभिव्यक्त होते हैं। उनका प्रभाव और संवेदनाएं उनके संवादों के जरिए सामने आते जाते हैं।

इन कहानियों में लंबे-चौड़े भाषण या तर्क-वितर्क वाले संवाद नहीं हैं। नाटकीयता के लिए देश-काल, पात्र व परिस्थिति के अनुरुप छोटे-छोटे संवादों का प्रयोग कहानिकार ने किया, जिससे कहानियां प्रभावी लगती हैं। ये रोचक, तर्कयुक्त तथा प्रवाहमय हैं, जिससे कथा आगे बढ़ती जाती है। संवाद से पात्रों के चरित्र खुलते जाते हैं।

इन कहानियों में कथाकार ने मनोविज्ञान पर अधिक बल दिया है। चरित्र चित्रण को अधिक महत्व मिला लगता है। पात्र और उसके संघर्ष कहानी की मूल धुरी बने दिखते हैं। अमूमन हर कहानी में एक ही मुख्य पात्र है। हर कहानी में चरित्र चित्रण को मनोविज्ञान आधार दिया है, जिससे पात्र वास्तविक, सजीव, स्वाभाविक और विश्वसनीय बन चले हैं। पात्रों के चरित्र का आकलन विवेक अग्रवाल ने प्रत्यक्ष (वर्णनात्मक) और परोक्ष (नाट्य) दोनों ही शैलियों में जरूरत के मुताबिक किए हैं।

कहानियां तेज गति से आगे बढ़ती हैं, पात्रों की चारित्रिक विशेषताएं बताते जाती हैं, इलाके और कारोबारी खास भाषा-शैली के साथ चरम पर पहुंचती हैं। इस तरह हर कथा में रस भरती जाती हैं। कहानी की भाषा सरल, स्पष्ट होने के साथ ही साथ कथानक एवं विषय के अनुरूप है।

रक्तगंध की कहानियों के कथानक स्वाभाविक एवं परिस्थिति अनुकूल हैं, जो जबरदस्त जिज्ञासा और कौतूहल पैदा करते हैं। ध्वनियों के जरिए भी विवेक अग्रवाल ने कहानियों को सजीव करने में सफलता हासिल की है।

इन कहानियों की सहज, सरल एवं बोधगम्य भाषा से भावों की अभिव्यक्ति बखूबी हुई है। कथा की मूल संवेदना व्यक्त करते जाती है। भाषा का प्रवाह, आलंकारण, चित्रात्मकता और प्रतीकों के प्रयोगों ने कहानियों को आला दर्जे का बना दिया है।

रक्तगंध की कहानियों को किसी एक शैली में बांधा नहीं जा सकता है। वे नाटकीय भी हैं, संवादात्मक और स्वप्न के साथ भी दिखती हैं। उनमें संस्मरणात्मक शैली या रिपोर्ताज शैली या मनोविश्लेषणात्मक शैली के तत्व भी देखे जाते हैं।

वास्तविक जीवन से निकल कर आई ये कहानियां, आपके आसपास ही बिखरी हैं लेकिन आप इन्हें देख-सुन-पढ़ नहीं पाते हैं क्योंकि ये तो स्याह संसार की हैं। इन अजाने प्रेतों के बीच सामान्य जीवन नहीं हैं, जिसके कारण इस खास देश, काल, खंड, जीवन की सत्-असत् प्रवृत्तियों और परिस्थितियों से सब रूबरू नहीं हो पाते हैं। विवेक अग्रवाल को इनके बीच जीने का मौका मिला है, तो इन्हें ही कलम से कागज पर उकरने लगे हैं। उनके शब्द कागजद पर चित्र की भांति प्रकटन में भरोसा करते हैं। कहानी में भौतिक तथा मानसिक, दोनों प्रकार का वातावरण रचते जाते हैं। इससे उनकी कहानियां यथार्थ के साथ चलती दिखाई देती हैं।

इन कहानियों की रचना का उद्देश्य भी है। रक्तगंध की कहानियां महज मनोरंजन का सामान ही नहीं, गंभीर चिंतन की सामग्री भी परोसती हैं। वे समाज की कठिक समस्याओं को गजब की सहजता के साथ सामने लाती जाती हैं।

विवेक अग्रवाल ने कहानियों में अपनी विचारधारा प्रकट नहीं की बल्कि पात्रों का सच बेहद ईमानदारी से सामने रखते गए। कहानियों के जरिए आदर्श स्थापना या उपदेश देने का काम लेखक ने नहीं किया। उसने तो यथार्थ-एवं समस्या चित्रण के साथ मनोवैज्ञानिक कोण पर अधिक ध्यान दिया है।

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