ये जो आसमान पे नफ़रत के बादल छाये हैं

ये सब नकली हैं, किसी खुदग़र्ज़ की खुदग़र्ज़ी ने इन्हें बनाये हैं, इसे अमृत वर्षा समझ कर आप जो इसमें

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राक्षस: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

वीरान हवेली की दो महीने में शूटिंग पूरी हो गई। अगले छह महीनों में एडिटिंग भी पूरी हो गई। फिल्म

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डंक: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

हाईवे पर पहुंचने के बाद संजय ने मुस्कुरा कर आगे बैठे टोनी पर नजर डाली, “क्या हाल है रौनक भाई…

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रात का राजा: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

रज्जू भैया से आज फिर राजा भाई की बातें चल रही है। मुद्दा है वही कि कौन चुनाव जीतेगा –

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लॉज की यारी…: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

देव कुमार अब डायरेक्टर हो गया। रहा वही मीठा और चीठा। सारे जहान को सेट पर बुला-बुला कर दिखाने लगा

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गांधारी का अर्धसत्य: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

“मंझा सूंतने से क्या मतलब…” “मंझा किस काम का… निठल्लों का काम है पतंग उड़ाना… जब-तब मंझा उनके ही हाथ

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लाश: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

“हो रे बाबा, ये पटकन।” बाबू भाई ने शांत भाव से दांत कुरेदते हुए फोन रखा। कुर्सी से उठ कर

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लॉकडाऊन रहेगा याद!

लॉकडाऊन की बातें याद बनकर रह जाएंगीएक समय के बाद ये कहानियां बन जाएंगी कभी भी खाना और कभी भी

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500 की खाट: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

“कोई काम हो तो दीजिए…” बाबू भाई ने मरी आवाज में कहा। “क्या कर सकते हैं…” गुप्ताजी सीधे मुद्दे पर

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शांतिप्रिय जंगलाधीश

जंगलाधीश अपने आसन पर मुखमंडल पर निर्मल मुस्कान लिये ध्यान में लीन थे, शिकार के विरोध में जंगल में कबूतरों

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अब हिंदी और उर्दू को लड़ाने की साजिश

नीचे दी पोस्ट का लेखक भाषा के नाम पर भारत के जनमानस को बांटने की घृणित एवं असफल कोशिश करता

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