ये जो आसमान पे नफ़रत के बादल छाये हैं

ये सब नकली हैं, किसी खुदग़र्ज़ की खुदग़र्ज़ी ने इन्हें बनाये हैं, इसे अमृत वर्षा समझ कर आप जो इसमें

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लॉकडाऊन रहेगा याद!

लॉकडाऊन की बातें याद बनकर रह जाएंगीएक समय के बाद ये कहानियां बन जाएंगी कभी भी खाना और कभी भी

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दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है, हम भी पागल हो जाएंगे ऐसा लगता है – क़ैसर उल जाफ़री

रस्ते भर रो–रोकर पूछा हमसे पांव के छालों ने बस्ती कितनी दूर बसा ली दिल में बसने वालों ने यह

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पीछे बँधे हैं हाथ मगर शर्त है सफ़र, किससे कहें कि पाँव के काँटे निकाल दे – ताज भोपाली

वो हाथ तो क़िस्मत में मेरी है नहीं शायद आ बर्गे-हिना तुझको ही आंखों से लगा लूं यह शेर उस

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शांतिप्रिय जंगलाधीश

जंगलाधीश अपने आसन पर मुखमंडल पर निर्मल मुस्कान लिये ध्यान में लीन थे, शिकार के विरोध में जंगल में कबूतरों

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मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया – मजरूह सुल्तानपुरी

बे तेशा-ए-नज़र न चलो राह-ए-रफ़्तगां हर नक्श़-ए-पा बुलंद है दीवार की तरह ‘तेशा’ यानी पत्थर काटने का हथियार। ‘राह-ए-रफ़्तगां’ यानी

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चांद को छूने वाले इंसां देख तमाशा लकड़ी का – ज़फ़र गोरखपुरी

किसी मासूम बच्चे के तबस्सुम में उतर जाओ, तो शायद ये समझ पाओ, ख़ुदा ऐसा भी होता है. शायर ज़फ़र

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हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना – निदा फ़ाज़ली

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए निदा साहब ने

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हमने क्या पा लिया हिंदू या मुसलमां होकर, क्यों न इंसां से मुहब्बत करें इंसां होकर – नक़्श लायलपुरी

पलट कर देख लेना जब सदा दिल की सुनाई दे मेरी आवाज़ में शायद मेरा चेहरा दिखाई दे हिंदुस्तानी सिनेमा

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ज़िंदगी अपनी जब इस हाल में गुज़री ग़ालिब, हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे – मिर्ज़ा ग़ालिब

ग़मे-हस्ती का असद किससे हो जुज़ मर्ग़ इलाज शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक असद यानी मिर्ज़ा

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नहीं मिले तो नहीं मिले, मिले तो अदबदाकर मिले – फ़िराक़ गोरखपुरी

रात भी, नींद भी, कहानी भी हाय, क्या चीज़ है जवानी भी मरहूम शायर ज़फ़र गोरखपुरी ने एक गपशप में

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ग़ज़ल यानी दूसरों की ज़मीन पर अपनी खेती

ग़ज़ल दूसरों की ज़मीन पर अपनी खेती है। बतौर शायर आप भले ही दावा करें कि आपने नई ज़मीन ईजाद

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हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं, हमसे ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं – जिगर मुरादाबादबादी

उनका जो काम है वो अहले सियासत जानें, अपना पैग़ाम मुहब्बत है जहां तक पहुंचे जिगर मुरादाबादी का यह शेर

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फ़िल्मों में गीत लेखन की चुनौतियां

बॉलीवुड का संगीत जगत एक अभेद्य किले की तरह है। इसमें प्रवेश करना कोई आसान काम नहीं है। जगह-जगह खाइयां

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