मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया – मजरूह सुल्तानपुरी

बे तेशा-ए-नज़र न चलो राह-ए-रफ़्तगां

हर नक्श़-ए-पा बुलंद है दीवार की तरह

‘तेशा’ यानी पत्थर काटने का हथियार। ‘राह-ए-रफ़्तगां’ यानी वह रास्ता जहां से पहले भी लोग गुज़र चुके हैं।

रास्ते पर गुज़रने वालों के पांव के निशान दीवार की तरह ऊंचे हैं।

आप इस राह पर चलना चाहते हैं तो आपके पास नज़र का तेशा होना चाहिए।

सवाल यह है कि ‘नक्श़-ए-पा’ यानी पांव का निशान दीवार की तरह बुलंद कैसे हो सकता है?

आपका रिश्ता अगर गांव से है, तो आप इस बात को जल्दी समझ सकते हैं।

सुबह खेत की सिंचाई होती थी और शाम को अचानक कोई भैंस खेत के बीच से गुज़र जाती थी।

मिट्टी नरम होने के कारण उसके पैर के नीचे एक-एक फीट के गड्ढे हो जाते थे।

गड्ढे के चारों तरफ़ मिट्टी दीवार की तरह खड़ी हो जाती थी।

सुबह किसान आता था। किनारे की मिट्टी यानी दीवार को खुरपे या कुदाली से काट कर गड्ढे में डाल कर गड्ढे को समतल बना देता था।

मजरूह साहब का कहना यही है कि साहित्य और विभिन्न कलाओं के जो रास्ते हैं उन पर गुज़र चुके लोगों के पैरों के गहरे निशान मौजूद हैं।

आपको अगर उस रास्ते पर चलना है तो सबसे पहले आपको अपनी नज़र के तेशे से दीवार को काटकर रास्ते को समतल बनाना होगा, तभी आप अपने निशान छोड़ पाएंगे, तभी आप पहचाने जाएंगे।

उदाहरण के लिए जब दुष्यंत कुमार ने ग़ज़ल का रास्ता पकड़ा तो उस रास्ते पर मिर्ज़ा गालिब जैसे महान शायरों के नक्श़-ए-पा मौजूद थे। दुष्यंत कुमार ने अपने नज़रिए से अपने लिए एक समतल ज़मीन बनाई और उस पर अपने पैरों के निशान छोड़ने में कामयाब हुए।

मजरूह साहब की जिस ग़ज़ल का यह शेर है वह एक फ़िल्म में शामिल हो चुकी है। उसका मतला और एक शेर देखिए:

हम हैं मताए कूचाओ बाज़ार की तरह

उठती है हर निगाह ख़रीदार की तरह

मजरूह लिख रहे हैं वो अहले-वफ़ा का नाम

हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह

मजरूह साहब का एक ही ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित हुआ। उनके मेयार का अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि उनकी ग़ज़लें हिंदुस्तान और पाकिस्तान के एमए के पाठ्यक्रम में शामिल की गईं।

मुंबई आने पर मजरूह साहब सन् 1945 में प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ गए। उस वक्त़ इस संगठन ने फ़रमान जारी किया कि हमारे नौजवान शायरों को चाहिए कि वे ग़ज़लें लिखना बंद कर दें और नज़्में लिखें क्योंकि इस वक्त़ के जो अहम् मसाईल हैं, वे ग़ज़ल में नहीं ढाले जा सकते।

मजरूह साहब ने इसका विरोध किया। उन्होंने कई ऐसे शेर लिखकर साबित किया कि ग़ज़ल में भी अपने वक्त़ के बड़े-बड़े सवालों को सामने रखा जा सकता है। उनके चंद शेर देखिए:

सर पे हवाएं-ज़ुल्म चलें सौ जतन के साथ

अपनी कुलाह कज है उसी बांकपन के साथ

देख ज़िंदां से परे रंगे-चमन जोशे-बहार

रक़्स करना है तो फिर पांव की ज़ंजीर न देख

हम भी हमेशा क़त्ल हुए हैं तुमने भी देखा दूर से लेकिन

ये न समझना हमको हुआ है जान का नुक्सां तुमसे ज़ियादा

मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर

लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया

सन् 1989 में जनसत्ता अख़बार के लिए मैंने मजरूह सुल्तानपुरी का इंटरव्यू किया तो उनके साथ मिलने जुलने का सिलसिला शुरु हो गया।

मजरूह साहब व्यवहार में बड़े शालीन मगर साफ़-साफ़ बोलने वाले इंसान थे।

उनको फ़िल्म जगत में बहुत कामयाबी, शोहरत और इज़्ज़त मिली।

मजरूह साहब ने जब तक काम किया ख़ुद्दारी के साथ काम किया। उन्होंने ऐसा कोई समझौता नहीं किया जिससे बाद में अफ़सोस हो।

उन्होंने जो कुछ रचा है वह एक कालजयी सृजन है। भले ही वह सिनेमा जगत की जरूरतों के हिसाब से रचा गया है लेकिन उसमें साहित्य की सृजनशीलता भी शामिल है। एक हस्सास शायर की संवेदना शामिल है।

उनके गीत हमेशा हमारे हमसफ़र बने रहेंगे। ज़िंदगी की धूप छांव में हमारे साथी बन कर खड़े रहेंगे।

देवमणि पांडेय

लेखक देश के विख्यात कवि एवं गीतकार हैं।

संपर्क: बी-103, दिव्य स्तुति, कन्यापाड़ा, गोकुलधाम, महाराजा टावर के पास, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव (पू), मुंबई 400063 / +9198210 82126

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