खुद ही खंड-खंड, तो भारत को कैसे करेंगे अखंड?

निरुक्त भार्गव, वरिष्ठ पत्रकार, उज्जैन

भोपाल में चर्चित वेब सीरिज़ ‘आश्रम’ की शूटिंग के दौरान प्रख्यात निर्माता-निर्देशक प्रकाश झा पर नीली स्याही फेंक दी गई और मुख्य किरदार बॉबी देओल को भी कथित रूप से पीटा गया! उज्जैन में ‘ओह माय गॉड’ फिल्म श्रृंखला के लिए महाकालेश्वर मंदिर को कथित रूप से एक करोड़ का दान लेकर शूटिंग करने की इजाज़त देने का मामला भी तूल पकड़ रहा है! ऐसे में जब ‘अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद्’ में दो फाड़ होने की सूचना आती है, तो भला कौन यकीन करेगा कि राष्ट्र की-सनातन धर्म की और भारतीय संस्कृति की रक्षा और उनका संवर्धन कौन करेगा?

अखाड़ा परिषद् के खेल तो अजब ही हैं! इसमें धीरे-धीरे करके 13 अखाड़ों का प्रतिनिधित्व हुआ है और कई अखाड़े लाइन में हैं. सन्यासियों यानी शैव संप्रदाय के 7, वैष्णव संप्रदाय के 3 और उदासीन परम्परा के 3 अखाड़े इसमें सम्मिलित हैं. परिषद् में यों तो कई पदों का प्रावधान है, लेकिन मोटे तौर पर अध्यक्ष और महामंत्री के पद महत्वपूर्ण माने जाते हैं.

भारतवर्ष में जिन चार स्थानों-प्रयागराज अथवा इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश), हरिद्वार (उत्तराखंड), नासिक (महाराष्ट्र) और उज्जैन (मध्य प्रदेश) पर हर 12 वर्ष में क्रम से महाकुम्भ (सिंहस्थ) होते हैं, वहां उक्त दोनों पदाधिकारी मानों भगवान हो जाते हैं! उन्हें संबंधित राज्य सरकारें सदैव ‘स्टेट गेस्ट’ का दर्जा देती हैं और नेताओं की कृपा से उन्हें भारी-भरकम सुरक्षा भी प्रदान की जाती है! अपने-अपने मठों/आश्रमों/अखाड़ों के तो वे सरताज होते ही हैं!

सितम्बर 2021 के अंतिम सप्ताह में इसी अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष महंत नरेन्द्र गिरी ने बेहद संदेहास्पद परिस्थितियों में प्रयागराज स्थित अपने बागम्बरी मठ में कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी! इस प्रकरण की सीबीआई जांच चल रही है. उनका षोडशी भंडारा (सरल भाषा में तेरहंवी) 5 अक्टूबर को था, मगर राजनीति की शुरुवात वहीँ से होने लगी! बताया जाता है कि भिन्न-भिन्न प्रकार के विवादों का हवाला देते हुए, कतिपय अखाड़ों के प्रतिनिधियों ने उक्त कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया!

बाद में 20 अक्टूबर को कनखल, हरिद्वार स्थित महानिर्वाणी (शैव) अखाड़ा में महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव महंत रविन्द्रपुरी को अखाड़ा परिषद् का अध्यक्ष और निर्मोही अणि अखाड़े के अध्यक्ष श्रीमहंत राजेंद्र दास को महामंत्री चुन लिया गया. दावा किया गया कि निर्वाचन बैठक में कुल सात अखाड़ों के अधिकृत प्रतिनिधि शामिल हुए. इन अखाड़ों के नाम महानिर्वाणी, अटल, निर्मल, बड़ा उदासीन, निर्मोही, निर्वाणी और दिगंबर अणि बताए गए!

उधर, 25 अक्टूबर को अखाड़ा परिषद् की प्रयागराज स्थित निरंजनी (शैव) अखाड़ा में एक अन्य बैठक हुई. दावा किया गया कि इसमें कुल आठ यथा-जूना, आवाहन, अग्नि, निरंजनी, आनंद, नया उदासीन, निर्मल और निर्मोही अणि अखाड़े के प्रतिनिधि शरीक हुए! जग-जाहिर करने की कोशिश हुई कि निरंजनी अखाड़ा के सचिव रविन्द्रपुरी को नया अध्यक्ष और वर्तमान महामंत्री व जूना अखाड़े के हरि गिरी को दोबारा चुन लिया गया!

ये 7-6 विरुद्ध 8-5 के क्या खेल हैं, ये वो सब जानें जो इन चित्रों में दिखाई दे रहे हैं! हालांकि निर्मल अखाड़े की तरफ से 26 अक्टूबर को स्पष्टीकरण आ गया कि जैसा कि दावा किया जा रहा है, उनके अखाड़े का कोई भी प्रतिनिधि 25 अक्टूबर की बैठक में शामिल नहीं था और उक्त बैठक पूर्णत: अवैध होकर उसका कोई-भी निर्वाचन स्वीकार करने योग्य नहीं है. कुछ इसी तरह का स्पष्टीकरण निर्मोही अणि अखाड़े की तरफ से भी आने की सूचना है.

सामान्य तौर पर अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद् के निर्वाचन में अध्यक्ष और महामंत्री के पद या तो शैव अखाड़े अथवा वैष्णव अखाड़े के प्रतिनिधि के खाते में जाते हैं. दोनों पदों को उल्टा-पुल्टा कर समान प्रतिनिधित्व देने की भी परम्परा रही है! लेकिन, एक महाशय ने तो इस परिषद् का सौ फीसदी राजनीतिकरण और फिर व्यवसायीकरण ही कर दिया है!

चर्चा भी है और आरोप भी कि इन ‘भगवा चोला’ ओढ़े ‘गृहस्थ’ सन्यासी ने पद-मोह के चक्कर में न सिर्फ खुद के अखाड़े में और अखाड़ा परिषद् में बल्कि साधु-संतों-महात्माओं के डेरों में भी खूब आतंक मचा रखा है!!!

ये चर्चा फिर इस चौराहे पर आकर खड़ी हो गई है कि जो अन्यान्य कारणों से इस तरह के चोले ओढ़कर सामान्य जीवन के व्यवहारों को तहस-नहस करने मिल में संलिप्त हैं, वो भला किसका और क्या भला करेंगे?

यदि हमारे मानदंडों से धीरेन्द्र ब्रह्मचारी, चंद्रास्वामी, आसाराम, राम-रहीम वगैरह-वगैरह पैदा हो रहे हैं और ये सिलसिला थमेगा कि नहीं जैसे विचार सबके मन में आ रहे हैं, तो बताइए किस निष्कर्ष पर पहुंचना उचित रहेगा?

प्रतिक्रिया बनती है: पाखंडवाद को क्या सबक सिखाया जाए?

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लेखक उज्जैन के वरिष्ठ पत्रकार हैं। विगत तीन दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। संप्रति – ब्यूरो प्रमुख, फ्री प्रेस जर्नल, उज्जैन

(उक्त लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। संपादक मंडल का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

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