क्या गांजा, भांग, चरस को लेकर भी राजनीति होगी?

केंद्र सरकार की एजेंसी इस समय शाहरुख खान के बेटे आर्यन के पीछे पड़ी हुई है कि वह मौज मस्ती करने जहाज पर क्यों गया और नशा क्यों किया? पिछले साल सुशांत सिंह राजपूत की मौत के समय वही एजेंसी एक अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के पीछे पड़ी थी और टीवी के समाचार चैनलों ने आसमान सिर पर उठा लिया था। इस बार भी ऐसा करने की कोशिश हो रही है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे बहुत हैं, इसलिए यह मामला उस तरह तूल नहीं पकड़ पा रहा है। इस कार्रवाई का उद्देश्य आखिर क्या है? सरकार का दावा है कि देश में कानून को सख्ती से लागू किया जा रहा है।

रिया चक्रवर्ती को जेल भेजा गया और अब आर्यन खान, अरबाज खान शिकंजे में हैं। ले देकर बात आकर टिकती है गांजा, भांग और चरस पर। इन वस्तुओं का उपयोग रोकने के लिए नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की स्थापना राजीव गांधी की सरकार ने 17 मार्च 1986 को की थी। कारण यह कि देश में नशे के लिए इन वस्तुओं का बहुतायत से उपयोग किया जाता है। यह कानून बनने के बाद गांजे की बिक्री बंद हो गई थी। महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में भांग की बिक्री भी बंद हो गई थी। चरस तो सरकारी बिक्री के दायरे में कभी थी ही नहीं।

नशा करने वालों की संख्या कम नहीं है। लोग तरह-तरह के नशे करते हैं। बचपन से लेकर जवानी तक, बुढ़ापे तक लोग कई तरह के नशों का अनुभव करते हैं। खुद करते हैं या दूसरों को नशा करते हुए देखते हैं। और यह आज की बात नहीं है। सदियों से यह सिलसिला जारी है। नशा करने के कई उद्देश्य होते हैं। पश्चिमी आर्थिक ताकतें दुनिया में जो जीवनशैली थोपना चाहती है, उसका लक्ष्य यह है कि नशे के लिए लोग सिर्फ शराब पिएं। इसके अलावा और कोई नशा नहीं करें। बड़ी-बड़ी शराब कंपनियों के इशारे पर सरकारों के माध्यम से यह काम होता है। शराब में अल्कोहल होता है, जो नशा करता है। शराब के आदी लोगों को अल्कोहलिक कहा जाता है।

अगर गांजा, भांग, चरस के नाम पर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो कार्य करता है तो इससे लगता है कि उसके अधिकारी इन वस्तुओं के बारे में कुछ जानते ही नहीं। तमाम साधु चिलम फूंकते हुए दिखते हैं, वह क्या है? ये तीनों एक ही पौधे के उत्पाद हैं और उत्तर भारत में कई जगह उगते हुए देखे जा सकते हैं। खास तौर से हिमालय की तलहटी वाले इलाकों में इनकी उपज बहुतायत से होती है। इन दिनों उत्तराखंड की पुलिस आपराधिक गतिविधियों की रोकथाम करने की बजाय भांग के पौधों को उखाड़ने में लगी हुई है।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की कार्रवाई का यही मतलब है कि केंद्र में भाजपा की और महाराष्ट्र में शिवसेना-राकांपा-कांग्रेस की सरकार है। मुंबई इन वस्तुओं के अवैध कारोबार का विशाल केंद्र है। यह डिमांड एंड सप्लाई के कारण है। मुंबई में भांग की बिक्री बंद है, लेकिन मिल जाती है। गांजे की बिक्री सरकार ने पच्चीस साल पहले रोक दी, लेकिन उपलब्ध है। चरस की भी यही स्थिति है। इन वस्तुओं का जो कारोबार होता है, उसमें सरकारी एजेंसी बमुश्किल 10 फीसदी की धरपकड़ कर पाती है। परदे के पीछे की बात यह कि इससे कमाई भी बहुत होती है। क्या कार्रवाई के पीछे कमाई का एंगल है?

नशीले पदार्थों के उपयोग के आरोप कई फिल्मी सितारों पर लगे हैं और इससे उनकी हैसियत में कोई कमी नहीं आई है। संजय दत्त अभी भी टॉप स्टार है। अटल बिहारी वाजपेयी के बारे में सभी जानते हैं कि भांग खाते थे। वे प्रधानमंत्री बने। और भी कई बड़े-बड़े लोग हैं, जो गांजा-चरस भरी सिगरेट पीते हैं। अगर लोग शराब की बजाय गांजा, भांग, चरस का उपयोग करते हैं, तो इसमें किसी को तकलीफ क्या है? शराब से जो नुकसान होते हैं, वे इन पदार्थों से नहीं होते हैं। शराब वनस्पतियों को सड़ाकर बनाई जाती है। गांजा, भांग, चरस सीधे पौधों से प्राप्त होते हैं।

लगातार मानसिक श्रम करने वाले या एक जैसा काम करने वाले निरंतरता बनाए रखने के लिए इस तरह के नशे करते हैं। किसी को दुकान पर लगातार बैठना पड़ता है। किसी को लंबी यात्रा करनी होती है। कोई शारीरिक आनंद चाहता है। कई कारण हैं, जो समाज में नशीले पदार्थों की डिमांड बनाए रखते हैं। अगर इस बात पर हायतौबा मचती है कि फिल्म स्टार गांजा पी रहा था तो यह बहुत बड़े मजाक के अलावा कुछ नहीं है। अगर कोई दारू नहीं पीता है, इन वस्तुओं का उपयोग करता है तो वह देश का, समाज का कोई नुकसान नहीं करता। शराब पीकर उपद्रव करने की घटनाएं आम तौर पर होती रहती हैं, लेकिन ऐसी खबरें नहीं मिलती कि किसी ने भांग खाकर, या गांजा पीकर दंगा किया हो।

टीवी के जो समाचार चैनल शाहरुख खान के बेटे को निशाने पर लेकर जगह-जगह छापेमारी करने वाले नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अफसरों के पराक्रम का बखान कर रहे हैं, उन्हें अपने आसपास ही देख लेना चाहिए कि उनकी टीम में शामिल कोई व्यक्ति इन वस्तुओं का इस्तेमाल तो नहीं कर रहा है। बीड़ी, सिगरेट और तंबाकू तो आम है। तंबाकू से आगे गुटखा चल गया है, जिसके विज्ञापन भी होते हैं और जिसकी बिक्री को रोकने का नाटक भी साथ ही चलता है।

नशे के बारे में नीतियां बनाते समय सरकार को स्वदेशी और विदेशी का भी ध्यान रखना चाहिए। चाय स्वदेशी नहीं है, लेकिन प्रचलन में आने के करीब एक सदी के बाद यह हर घर में अनिवार्य रूप से पी जाती है। लगता है इसी तरह शराब का प्रचलन बढ़ाने का प्रयास हो रहा है। इसका एक ही तरीका हो सकता है कि गांजा, भांग, चरस जैसे प्रकृति प्रदत्त बहुतायत में उपलब्ध वस्तुओं पर सख्ती से रोक लगाई जाए। जो किया जा रहा है और कह सकते हैं कि यह स्वदेशी की भावना के खिलाफ है। भारत में हिंदू भांग के बगैर होली और शिवरात्रि जैसे त्योहारों की कल्पना नहीं कर सकते। लोग भांग को महादेव प्रसाद भी मानते हैं।

गांजा, भांग, चरस के अलावा अफीम ऐसा उत्पाद है जो औषधि और नशीले पदार्थ दोनों बनाने में काम आता है। इसका उत्पादन सीमित कर दिया गया है। अफीम से निकलने वाले डोडा पोस्त का उपयोग रेगिस्तानी इलाकों में बहुत किया जाता है। कई रीति-रिवाजों में अमल (अफीम) का पानी प्रसाद के रूप में दिया जाता है। यहां तक तो ठीक है, लेकिन अफीम से बनने वाली स्मैक और हेरोइन बहुत खतरनाक है, जो मनुष्य के जीवन का सत्यानाश कर देती है। सरकार को गांजा, भांग, चरस के पीछे पड़ने की बजाए ऐसे पदार्थों पर रोक लगानी चाहिए जो संश्लेषित करके रासायनिक प्रक्रिया से बनाए जाते हैं।

बहरहाल कुछ होना जाना नहीं है। वेश्विक ताकतें दुनिया पर राज कर रही ही हैं और भारत दुनिया से अलग नहीं है। यहां सरकार वही नीतियां लागू करती हैं, जो वैश्विक ताकतों के अनुकूल हो। भारतीयता से किसी को क्या लेना-देना? जब तक इस देश को पूरी तरह अमेरिका, यूरोप का डुप्लीकेट नहीं बना दिया जाता, तब तक लगता है यह सिलसिला चलता रहेगा।

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