Books: खेल खल्लास: रक्त पीने वाला सुपारी किलर बाबा अजीज रेड्डी

अब तक जितने क्रूरकर्मियों पर कलम चलीं, इसके मुकाबले का उनमें कोई न था। अब तक जितने भी गुंडे-हत्यारे किसी पुलिस वाले ने अपने जीवन में देखे थे, वह उन सबसे अलग था। अब तक जितने ‘भाई लोक’ के साथ उन गुंडों ने दिन गुजारे थे, उतना भयभीत कभी न हुए, जितना इस एक से। कैसे… क्यों… क्या कारण था? कभी किसी कलमनवीस ने ऐसा जीवित किरदार न देखा-न सुना। पुलिसकर्मी भी दो-चार की संख्या में उससे भिड़ने का खयाल नहीं लाते थे। गुंडे उसके साथ हिरासत खाने की एक ही कोठरी में रहने के नाम मात्र से सिहरते थे। यह है काकूलवारापू वेंकट रेड्डी उर्फ वेंकटेश बग्गा रेड्डी उर्फ बाबा रेड्डी उर्फ माइकल फर्नांडो उर्फ अजीज रेड्डी।

राजन गिरोह का सुपारी हत्यारा…

20 से अधिक हत्याएं कर चुका हत्यारा…

रक्त पीने व कच्चा मांस खाने वाला हत्यारा…

वेंकटेश बग्गा रेड्डी को जानने वाले एक पुलिस अधिकारी कहते हैं कि वह सच्चे अर्थों में मानव शरीर में छुपा कोई ‘ड्रैकुला’ था। वह सचमुच रक्त पीता और कच्चा मांस खाता है। रक्त पीने का एक खास अंदाज और तरीका रेड्डी ने अपना ही ईजाद किया है। वह भात में दाल की तरह जानवरों का खून मिला कर खाता रहा है।

वेंकटेश खुद को ‘काली माता’ का परम भक्त कहता रहा है। पीने के लिए कभी पशु रक्त न मिले तो वेंकटेश अपने हाथ की नसें काट कर रक्त हासिल करता था। यह रक्त भी वह चावल में मिला कर खा जाता था। वह जानवरों का कच्चा मांस भी इस तरह खाता, जिस तरह से हिंसक जानवर खाते हैं।

एक अधिकारी कहते हैं, ‘वह बाकियों जैसा नहीं था। अन्य अपराधी धार्मिक तो बहुत होते है लेकिन वे दिखावा नहीं करते हैं। आमतौर पर अपराधी खुद को ‘कट्टर धार्मिक’ दिखाने-जताने से परहेज करते हैं लेकिन रेड्डी उनसे बिल्कुल ही अलग था। वह खुलेआम खुद को कट्टर हिंदू व काली भक्त बताता है। उसे स्वयंभू धर्मांध बने रहने और पुकारे जाने से भी कभी परहेज नहीं रहा।’

26 जुलाई 1998 को रेड्डी अपने 5 साथियों समेत कुर्ला से पकड़ा गया। तब वह मात्र 28 साल का था। इस छोटी सी उम्र में भी इस कदर दुर्दांत अपराधी बन चुका था कि पुलिस वालो के भी उसके नाम पर कान गरम हो जाते थे। इस भारी-भरकम और भयावह काया के राक्षसी प्रकृति वाले गुंडे से विरोधी ही नहीं, पुलिस वाले भी बुरी तरह भय खाते हैं। उसकी गिरफ्तारी हेतु विशेष कार्रवाई दस्ते (एसओएस) को लगाना पड़ा था, जिसमें एके-47 चलाने में माहिर कमांडो तथा विशेष प्रशिक्षण प्राप्त पुलिसकर्मी रहे हैं।

मुंबई पुलिस की अपराध शाखा मानती है कि 20 से अधिक हत्याओं में रेड्डी हाथ रहा है। वे मानते रहे हैं कि रेड्डी के खिलाफ कम से कम 6 मामलों में इतने पक्के सबूत रहे हैं, जिनमें उसे पक्के तौर पर सजा मिलने की संभावना बनती थी।

रेड्डी के खिलाफ काशीमीरा में बिल्डर पटेल बंधुओं में से एक अजमत पटेल की हत्या का आरोप भी था…

मंचेकर गिरोह के हफ्ताखोर और वाडिया अस्पताल के वॉर्ड बॉय अशोक परदेसी की ठाणे में…

स्कैंडल शूज के मालिक प्रबंधक निदेशक हाजी कपाड़िया की बांद्रा में…

शिवसेना नेता मनोहर झिंगाड़े की लोअर परेल में…

छोटा शकील के फौजदार बाबू दाढ़ी की परेल में…

एक कॉलेज छात्र भूषण पाटिल की ठाणे में…

राजनीतिक परशुराम चव्हाण की वडाला में…

हत्याओं के लिए भी रेड्डी के खिलाफ पक्के सबूत होने का दावा पुलिस करती रही है।

अजीज के बारे में यह जानकारी मिलती है कि वह नालगोड़ा जिले के मर्रिगुडम मंडल के थिरीगंडलपल्ली गांव का मूल निवासी था। जब उसके पिता की मौत हो गई तो वह मुर्शिदाबाद चला गया था। वहां पारसीगट्टा में रहता था। रेड्डी ने 9वीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है। उसने बीच में ही शिक्षा छोड़ी और कमाई का चक्कर चलाने लगा। मुर्शीदाबाद में वह ट्रांसफॉर्मर की वेल्डिंग करके आजीविका चलाने लगा। उसे जानने वाले यह भी कहते हैं कि मुर्शीदाबाद आईटीआई से उसने पढ़ाई की थी लेकिन मुंबई पुलिस के रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है।

पढ़ाई के दौरान ही उसकी दोस्ती कुछ लोगों से हुई थी। ये आपराधिक प्रवृत्ति के युवक मोहम्मद नसीर उर्फ अत्तू, मोहम्मद आसिफ और अब्दुल रहीम थे। उनके साथ मिल कर ही वह उटपटांग हरकतें करता था। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि उनकी सोहबत में ही रेड्डी ने इस्लाम कबूल कर नया नाम अब्दुल अजीज रख लिया था। 1990 के दंगो के दौरान वह अपने दोस्तों के साथ शामिल हुआ और 20 फरवरी 1990 को उसने इंदिरानगर में एक हत्या की। मुर्शिदाबाद थाने में इसके कारण उसके खिलाफ टाडा के तहत मामला भी दर्ज हुआ।

इस मामले में गिरफ्तारी के बाद जमानत हासिल करके वह मोहम्मद फारुख के नकली पासपोर्ट से सऊदी चला गया। तीन महीने वहां बिता कर वापस हैदराबाद लौटा। यहां उसने फिर अवैध कारनामे जारी रखे।

एक दिन उस पर मुंबई के होटल मालिक हाजी भाई की निगाह पड़ी। शक्ल-सूरत से ही क्रूरकर्मा दिखने वाले रेड्डी को वह 1989 में बतौर अंगरक्षक अपने साथ मुंबई ले आया। मुलुंड के एक बीयर बार में उसे हाजी भाई ने नौकरी पर लगा दिया। पता चलता है कि रेड्डी शिवसेना के एक मजदूर नेता गुरूनाथ कोथ का अंगरक्षक भी बनाया था।

इसके बाद तो बीयर बारों में काम करना ही रेड्डी की नीयती बन गई। उस समय वह चेंबूर के एक बार में काम कर रहा था कि उसकी मुलाकात डिंपल दादा से हुई। डिंपल दादा को लगा कि ये लड़का बड़े काम का है। वह अपराधी सरगना उसकी भीमकाय और भयावह काया से खासा प्रभावित हुआ। अब तक गुंडों की खातिरदारी और मुजरे में झुके रहने वाले रेड्डी का सिर और कमर तन गई। आखिरकार वह वह भी ‘भाई’ बन। यह अंधियाले संसार में रेड्डी का प्रवेश द्वार बना।

डिंपल गिरोह ने उसे पहला काम सौंपा। उसे एक बड़े उद्योगपति के बेटे का अपहरण बांद्रा स्थित स्कूल से करना था। इस काम के लिए उसकी मजदूरी तय हुई एक लाख रुपए क्योंकि अपहरण के बाद फिरौती से भारी-भरकम रकम की वसूली का सपना डिंपल दादा संजोए था। यह पैसा उसे काम पूरा होने के बाद मिलने वाला था। अपराध कर्म से कोसों दूर रेड्डी नहीं जानता था कि अपहरण कैसे करना है। लिहाजा इस काम में वह असफल रहा। उसकी योजना असफल रही तो रेड्डी बुरी तरह डर गया। पुलिस के डर से वह हैदराबाद भाग गया। वह कुछ समय तक अज्ञातवास में ही रहा।

मुंबई पुलिस का दावा है कि 1992-93 के जातीय दंगे के दौरान रेड्डी हैदराबाद में था। वहां उसने मुस्लिम समुदाय के अनेक लोगों की हत्या भी की थी। जितने लोगों को उसने तब मारा था, उससे कहीं अधिक को उसने बुरी तरह घायल किया था। दंगे के कारण वह हैदराबाद में गिरफ्तार भी हुआ। सितंबर 93 में रेड्डी जमानत पर रिहा हो गया। जब यहां भी उसकी दाल न गली तो फिर से मुंबई आ गया।

बेकार-बेदर रेड्डी को क्षुधाग्नि बुझाने के लिए पैसों की जरूरत थी। उसे तो डांस बार में काम करने के अलावा कुछ आता नहीं था। वह काम की तलाश में फिर अंधियाले संसार के चमकते-दमकते ‘सिंह द्वारों’ के प्रतीक बीयर बारों के चक्कर लगाने लगा।

मुलुंड के बदनाम बीयर बार चांदनी बार के मालिक धनंजय शेट्टी का अंगरक्षक भी बना। अब उसका पेट भरने और सिर छुपाने का जरिया स्थापित हो गया। कहते हैं कि इस बीयर बार में रोजाना छोटा राजन गिरोह के काफी गुंडों का जमघट लगता था। नाना कंपनी के संजय घाटी और वीजू शेट्टी भी वहां नियमित आते थे। यहीं उसकी मुलाकात संजय घाटी से हुई। वह छोटा राजन गिरोह का सुपारी हत्यारा था। उन्होंने इस कद्दावर पिशाच प्रकृति के युवक को अपना प्यादा बनाने में देर न की। अब रेड्डी भी काली दुनिया के गुरूओं का गंडाबंद शागिर्द बन गया। वह जल्द ही उसके गिरोह का खास सदस्य बन गया।

एक बार पुलिस ने जब उसे 1998 में गिरफ्तार किया था, तब यह स्वीकार भी किया था कि मुंबई में कुल 17 हत्याएं कर चुका है। वह तीन सालों तक आर्थर रोड जेल में रहा।

सन 2001 में वह जमानत पर रिहा हुआ। यहां से हैदराबाद चला गया और अनपे पुराने दोस्त फारुख से नकली पासपोर्ट हासिल किया। उसने कोलकाता जाकर बैंकॉक की उड़ान पकड़ी और वहीं से नाना कंपनी के लिए काम करने लगा। वहां से कुछ समय के लिए वह कंबोडिया चला गया। फिर सिंगापुर जाकर भी रहा।

सिंगापुर में उसने माइकल फर्नांडो नाम का नकली पासपोर्ट हासिल किया था। इस पासपोर्ट पर उसने इंडोनेशिया, वियतनाम, फिलिप्पींस के अलावा कुछ युरोपीय देशों में जाकर भी पनाह ली थी। वह इंडोनेशिया के बथान शहर में स्थित नाना कंपनी की मैंड्रेक्स बनाने वाले एक गोपनीय कारखाने की देखभाल करने लगा था।

कहा जाता है कि रेड्डी की संतोष शेट्टी से भी दोस्ती थी। संतोष के साथ मिल कर जकार्ता में उसने इंडियन मंत्रा नामक एक होटल बनाया था। इसमें उनके 20 करोड़ रुपए खर्च हुए थे।

उसी दौरान वह हैदराबाद के कारोबारियों से हफ्तावसूली भी करता था। उसने सुरेश अग्रवाल से 5 लाख और राजू से 10 लाख रुपए का हफ्ता भी वसूला था। ये दोनों क्रिकेट बुकी हैं। गोलकुंडा सिगरेट कारखाने के मालिक से भी उसके द्वारा सात लाख रुपए की हफ्तावसूली के बारे में हैदराबाद पुलिस जानकारी देती है।

रेड्डी जब जकार्ता में रहता था, उसी दौरान संतोष शेट्टी के साथ मिल कर बैंकॉक के गिरोह सरगना और हथियारों के अंतरराष्ट्रीय तस्कर इयान से 70 हथियारों की एक खेप खरीदी। इसमें से 50 हथियार तो नाना कंपनी के लिए थे, जबकि 20 संतोष ने अपने गिरोह के लिए रख लिए थे।

नाना कंपनी और संतोष के बीच पैसों के बंटवारे और लेन-देन पर कुछ मनमुटाव हुए तो रेड्डी ने बैंकॉक छोड़ना उचित समझा। वह भारत लौट आया।

भारत आकर रेड्डी ने राजेश मदरासी, आनंद प्रेम, बाला, संजय मेंटल, प्रेम उर्प पंडित, नीलेश उर्फ शैलेश को लेकर नया गिरोह स्थापित किया। वह वाराणसी जाकर सुभाष सिंह ठाकुर से भी मिला। उससे रेड्डी आर्थर रोड जेल प्रवास के दौरान पहले भी मिल ही चुका था।

वह दिसंबर 2002 के बाद कुछ समय तक उत्तरप्रदेश में भी रहा है। यहां उसने एसटी के साथ मिल कर हत्या समेत कई अपराध किए थे। कुछ समय बाद वह एसटी कंपनी के लिए ही काम करने के इपरादे से मुंबई वापस लौटा था।

पुलिस अधिकारियों का यह भी कहना है कि रेड्डी ने मनीषा कोईराला के सचिव देवानी की हत्या में शामिल नरेंद्र और भावेंद्र की हत्याएं भी की थीं।

कहा जाता है कि अप्रैल 2004 में हैदराबाद में रेड्डी ने मुंबई माफिया की तर्ज पर ही बी-कंपनी की स्थापना की थी। उसमें पुराने साथियों आसिफ, छपाला श्रीनू जैसे तमाम अपराधियों को रखा। हैदराबाद में उसने भी मांडवली करनी शुरू कीं। वह लोगों के बीच पैसों और जमीनों के विवाद सुलटाने लगा, जिसके एवज में मोटी रकम वसूलता था।

हैदराबाद में बी कंपनी बनाने के बाद उसे माछा बोलारम इलाके के अड्डे से पुलिस ने छापा मार कर गिरफ्तार किया था। उससे पुलिस को इजराईल की बनी एक ऊजी सब मशीनगन और नौ मिमी की तीन स्वचालित पिस्तौलों समेत कुल पांच अत्याधुनिक हथियार के साथ ढेरों गोलियां मिले थे।  हैदराबाद में रेड्डी के खिलाफ हत्या और हफ्ताखोरी के आठ मामले दर्ज थे।

रेड्डी और उसके साथियों पर पुलिस ने आंध्रप्रदेश कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाईज्ड क्राईम एक्ट के तहत भी मामले दर्ज किए थे। हर मामले में वह इसलिए बरी होता रहा क्योंकि गवाह पलट जाते थे।

वह डी-कंपनी के नाम से बड़ा प्रभावित था। उसे लगता था कि इसी तरह से अपना गिरोह बी-कंपनी के रूप में स्थापित कर हैदराबाद का सबसे बड़ा डॉन बन जाएगा। अब तक हैदराबाद, मुंबई और उत्तरप्रदेश मिला कर उस पर लगभग दो दर्जन मामले दर्ज हो चुके थे। यह बताते हैं कि अब तक वह इतनी माया जोड़ चुका था कि जकार्ता में एक होटल का मालिक बन चुका था।

हैदराबाद के बंजारा हिल्स इलाके में एक दिन बैदराबाद पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स के अफसरान ने एक बंगले पर छापा मार कर भारी मात्रा में हथियार जब्त कर उसे कुछ साथियों समेत गिरफ्तार किया। यह बी कंपनी की पहली गिरफ्तारी और बरामदगी थी। वह 14 जून 2004 का दिन था, जब हैदराबाद पुलिस ने रेड्डी को आसिफ उर्फ दानिश मर्चेंट, जावेद, वीएस क्रृष्नम राजू, बी मारुथी सावंथ, आनंद श्रवण भावर, के गोपाल के साथ गिरफ्तार किया। उनसे दो मैगजीन के साथ उजी पिस्तौल, 38 कैलीबर की कोल्ट रिवॉल्वर भी मिले थे। तीन खंजर, 9 मिमी की 3 पिस्तौलों के साथ 115 गोलियों का जखीरा भी बरामद हुआ। ये सबी हथियार विदेश से कोचीन एक कंटेनर में भर कर पहुंचे थे। तेल के ड्रमों में भर कर ये हथियार पहले कोचिन बंदरगाह आए, वहां से हैदराबाद पहुंचे थे।

तत्कालीन पुलिस आयुक्त आरपी सिंह ने पत्रकारों को बताया कि अजीज रेड्डी हैदराबाद के सट्टा बुकियों से भारी हफ्ता उगाही कर रहा था। ये सभी फिल्म नगर गोलीबारी में शामिल थे। पुलिस के मुताबिक अजीज का खास साथी श्रीनू इस मामले में फरार था। वह मुर्शीदाबाद का मूल निवासी है। वह पहले फिल्मों में अभिनय करता था। इस मामले में वह साफ बरी हो गया। इस दौरान मुंबई पुलिस भी उसे प्रोडक्शन वारंट पर कुछ मामलों के लिए अदालत लाई थी। बाद में उसे यहां जमानत मिली तो रिहा हो गया।

पुलिस अधिकारियों के मुताबिक रेड्डी दिसंबर 2007 में हैदराबाद लौट आया। उसने फिर से हफ्ताखोरी और मांडवली का धंधा शुरू कर दिया।

2008 में एक दिन बंजारा हिल्स थाने में फिल्म निर्माता निखिल रेड्डी ने शिकायत दर्ज करवाई कि उसे अजीज रेड्डी ने एक करोड़ रुपए का हफ्ता चुकाने के लिए धमकाया है। निखिल रेड्डी ने फिल्म अंग्रेज का निर्माण व निर्देशन किया था।

रक्तपिपासु रेड्डी के लिए खून करना बांए हाथ का खेल था। सुपारी हत्या में इस जिंदा प्रेत ने बड़ा नाम कमाया। रेड्डी अपने वक्त में सबसे अधिक मेहनताना पाने वाला सुपारी हत्यारा था। 1994-95 के दौर में रेड्डी को प्रति हत्या 30 से 50 हजार रुपए तक बड़े मजे से मिल जाती थी। अतिरिक्त आय के लिए वह अपने नाम के आतंक का इस्तेमाल भी हफ्तावसूली के लिए करता था। वह सारी रकम खुद ही रख लेता था। हफ्ते में आई रकम की एक फूटी कौड़ी भी वह गिरोह को नहीं देता था।

अब तक एक सनकी निर्लज्ज हत्यारा बन चुका रेड्डी खुद को भगवत भक्ति के मामले में भी सबसे ऊपर स्थापित करता था। उसका मन सदा अशांत बना रहता था। वह अपने गुनाह बख्शवाने के लिए दिन-रात मंदिरों के चक्कर लगाता था लेकिन ‘काम’ भी उसने छोड़ा नहीं।

माहिम का सीतला देवी मंदिर उसकी खास पसंद था। वह नियमित रूप से वहां जाता था। फरवरी 1998 में एक दिन जब रेड्डी मंदिर से बाहर आ रहा था कि थमक कर खड़ा हो गया। सामने ही उसके सपनों की मलिका खड़ी थी। एक लड़की उसे दिखी जो अपने में खोई हुई सी चली जा रही थी। रेड्डी उसके प्रति आकर्षित हो गया। वह लड़की यूं ही चलती हुई माहिम स्थित मख्दूम शाह बाबा की दरगाह तक जा पहुंची। रेड्डी भी उसके पीछे-पीछे वहां जा पहुंचा।

वह लड़की तो उसके पूरे वजूद पर जैसे छा सी गई। उसने लड़की के बारे में जानकारियां निकालीं। पता चला कि वह मुस्लिम है। नाम है शहनाज।

काफी समय तक वह शहनाज के पीछे पड़ा रहा। मार्च महीना आते-आते तो वह शहनाज का दीवाना हो चुका था। उसने शहनाज के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। शहनाज ने शर्त रखी कि अगर रेड्डी इस्लाम ग्रहण करके मुस्लिम बन जाएगा तो ही शादी करेगी। इश्क में अंधे रेड्डी ने तुरंत हामी भर दी। पहले उसका धर्म परिवर्तन हुआ। उसका नया नाम रखा गया ‘अजीज’। उसके बाद हुआ निकाह।

रेड्डी से संपर्क में आए पुलिस अधिकारी कहते हैं कि वह बड़ा ही धोखेबाज किस्म का लेकिन कमजोर इंसान था। ठीक उसी तरह जैसे अन्य छुटभैय्ये गुंडे होते हैं। खुद को कट्टर हिंदू कहलाने में गर्व महसूस करने वाला रेड्डी एक लड़की के लिए तुरंत इस्लाम ग्रहण करने को तैयार हो गया। इसका मतलब था कि वह अपने फायदे के लिए ही कट्टर हिंदू होने का छद्म आवरण ओढ़े था। वह कभी भी वैसा खतरनाक नहीं रहा, जैसा लोग उसके बारे में कहते हैं, वह तो दिखता भर खूंखार और भयानक था।

वह भले ही कैसा हो, पुलिस वाले भी उसे खुश व शांत रखने के लिए अपराध शाखा की हिरासतखाने में भी खाने के लिए कच्चा मांस ला देते थे। मांस के इन लोथड़ों को रेड्डी पहले चूसता था ताकी उसे कच्चा खून मिल सके। उसके बाद मांस चबा-चबा कर खाता था। उसकी ये हरकतें देख कर उसी की कोठरी में बंद क्रूरकर्मा अपराधी भी सिहर जाते थे। वे तुरंत अपनी कोठरी बदलने की मांग पुलिस वालों से करते। उन्हें डर लगता था कि यह भयानक रक्तपिपासु कहीं उन्हें सोते में मार कर उनका मांस न खा जाए। दूसरे कैदी इस कदर कोहराम मचाते कि इस ‘लहू पीने वाले प्रेत’ को अंततः पुलिस सबसे अलग रखने पर मजबूर हो गई।

हैदराबाद के पॉश इलाके जुबली हिल्स में रेड्डी की 30 अप्रैल 2008 की देर रात पुलिस से मुठभेड़ में मारे जाने की खबर आई। हैदराबाद के तत्कालीन पुलिस आयुक्त बी प्रसाद राव के मुताबिक एक सूचना के आधार पर रेड्डी को उसके दो स्थियों समेत एक दस्ते ने घेरा था। यह पता चला था कि वे जमीन के एक मामले में मांडवली कर पैसे वसूलने जा रहे हैं।

हैदराबाद पुलिस की टास्क फोर्स के दो दस्तों ने उसकी खोज इलाके में शुरू की। दो घंटों की तलाश के बाद पुलिस को एक कार से उतरते रेड्डी और उसके साथी दिखे। जब पुलिस अधिकारी उनके पास जाने लगे तो सबी भागने लगे। पुलिस दल ने उन्हें समर्पण के लिए कहा तो रेड्डी ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं। जवाबी कार्रवाई में रेड्डी मारा गया। उसके दोनों साथी फरार हो गए।

वह जब तक जेल की सलाखों के पीछे रहा, सभी उससे भयभीत रहते। जब वह छूट कर बाहर निकला, तब भी वह कत्लोगारत में ही लगा रहा। मुंबई से चेन्नई तक वह कहर ढाता रहा। उसे लेकर मुंबई पुलिस के अधिकारी सदा आशंकित रहे। उन्हें लगता था कि रेड्डी को रोकना सिर्फ मृत्यु के देवता यमराज के हाथों में ही है, उसे कानून कभी रोक नहीं पाएगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही था। उसे एक दिन काल का गाल ग्रस गया। यह यमदूत भी एक दिन अंततः यमराज बन कर आ पुलिस दस्ते की गोलियों का शिकार होकर मारा गया। और इस तरह खून से प्यास बुझाने वाले इस खूनी खिलाड़ी का भी हो गया खेल खल्लास।

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