किताब: नरक सरहद पार: पाक की वहशी जेलों से जिंदा लौटे जासूस की सच्ची दास्तां

नरक सरहद पार: पाक की वहशी जेलों से जिंदा लौटे जासूस की सच्ची दास्तां
पृष्ठ – 444 / अध्याय – 12

सेना का जवान शहीद हो तो आंसुओं का सैलाब आ जाता है, शवयात्रा किलोमीटर भर लंबी होती है, अंतिम संस्कार पर लोग उमड़ आते हैं, परिवार को लाखों रुपए की सरकारी मदद मिलती है…

सिपाही घायल हो जाए तो सेना जिंदगी भर पेंशन देती है, इलाज करवाती है, परिवार का खयाल रखती है… भारतीय जासूस पाकिस्तान की गिरफ्त में आते हैं, तो उन्हें पहचानने से इंकार कर देते हैं, कोई उनके लिए आंसू नहीं बहाता, वापसी पर सरकार उनके लिए कुछ नहीं करती…. न कोई गाजा-बाजा… न कोई सम्मान… वे जान जोखिम में डाल फौजी महत्व की ढेरों सूचनाएं लाते हैं… बावजूद इसके कोई पदक या पुरस्कार नहीं… वे घायल लौटें तो 5-10 रुपए के इंजेक्शन के लिए तरसते हैं… मरते हैं तो लाश लावारिस जलती हैं।

एक ही राष्ट्र के दो सपूतों से ऐसा भेदभाव क्यों है?

क्या इसका जवाब कभी मिलेगा?

इस किताब का मकसद उन गुमनाम देशभक्तों के अधिकारों के प्रति सरकार और लोगों को जागरूक करना है, जिन्होंने देश सेवा में जीवन लगा दिया। परिवारों से बरसों दूर रहे। भयावह प्रताड़ना झेली। हम बात कर रहे हैं, उन जासूसों की, जो दुश्मन देशों में यह जोखिम भरा काम बखूबी करते हैं।

यह किताब पाकिस्तान गए भारतीय एजंट विनोद साहनी की असली, हैरअंगेज, दर्दभरी कहानी है। उनकी जुबान से, उनके दर्द का बयान है।

इसका मकसद देशहित को नुकसान पहुंचाना नहीं, मानव अधिकारों पर सरकार और हुक्मरानों का ध्यान खींचने की कोशिश है।

द इंडिया इंक से प्रकाशित।

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