डंक: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

हाईवे पर पहुंचने के बाद संजय ने मुस्कुरा कर आगे बैठे टोनी पर नजर डाली, “क्या हाल है रौनक भाई… कैसी गुजरी शाम…”

“भाई कैसी गुजरी शाम… यहां तो आम के आम और गुठलियों के दाम… मजा आ गया…” रौनक ने कहा।

“यार पायल ने एक पैकेट दिया है…” वीरू ने कहा।

“वो तुम तीनों का है… शेयर कर लो… खोल कर देख कितना है…” संजय ने कहा।

वीरू ने जेब से लिफाफा निकाल कर नोट गिने। 500 रुपए वाले के 60 नोट हैं।

“भाई ये तो थर्टी हैं…” वीरू ने आंखें चौड़ी कीं। पीछे बैठे दोनों बंदों का मुंह भी खुला रह गया।

“बहुत बढ़िया… लगता है तुमने लड़कियों की खूब सेवा की है… इसलिए मेवा भी अच्छा मिला है… इसमें से सिक्स मुझे दे दो… वैसे तो मैं 40 परसेंट लेता हूं… लेकिन तुम तीनों दोस्त हो… इसलिए 20 परसेंट ही लूंगा… ये मत समझना कि तुमसे कमा रहा हूं… समझ लेना कि इतना पैसा तुमने टैक्सी-दारू में खर्चा किया…” संजय ने सड़क पर ही नजरें गड़ाए हुए कहा।

“भाई, दोस्तों के बीच यह सब नहीं सोचा जाता…” रौनक ने कहा।

संजय के हाथों में वीरू ने 12 नोट रख दिए। उसने भी तुरंत नोट जेब के हवाले दिए।

वीरू ने तुरंत आठ हजार रुपए अलग कर रौनक के हाथों में रखे, उतने ही टोनी को दिए।

चारों दोस्त मस्तियां करते लड़कियों की बातें करते लॉज जा पहुंचे। तीनों को लॉज के बाहर छोड़ संजय अपनी कार में घर चला गया।

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