राक्षस: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

वीरान हवेली की दो महीने में शूटिंग पूरी हो गई। अगले छह महीनों में एडिटिंग भी पूरी हो गई। फिल्म पर्दे पर आ गई।

इसके बाद तो अनुपम के पास डकैतों, गुंडों, भूतों, राक्षसों के रोल करने के प्रस्ताव सामने से आने लगे। कल तक फिल्मों में काम हासिल करने की जद्दोजहद में लगा खूबसूरत अनुपम आम लोगों के बीच राक्षस के रूप में पहचाना जाने लगा।

अनुपम को इसका दुख तो होता कि उसके साथ हीरोइन के नाच-गाने वाली सीक्वेंस नहीं होते लेकिन इतना तो हुआ कि फिल्मों में काम करने की इच्छा पूरी हो गई।

वीरान हवेली की पहली शूटिंग के बाद अनुपम को बुरी तरह मनोवैज्ञानिक झटका लगा। फिल्मों में काम करने की खुशी के नीचे यह मनोदशा दब गई।

अनुपम को काम मिला, तो चंद महीनों में उसके पास इतना पैसा हो गया कि किराए का मकान लेकर दत्तात्रय लॉज से किनारा कर लिया।

यह बात और है कि जब अकेलापन महसूस होता, वह दत्तात्रय लॉज चला आता। रशीद और फूल सिंह अभी भी स्ट्रगल कर रहे हैं। जब और जहां मौका मिलता, अनुपम उन्हें काम दिलाने की भरपूर कोशिश करता।

यूं ही दिन बीतते रहे। कल का अनुपम, आज राक्षस के रूप में पहचान बना चुका है।

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