गांधारी का अर्धसत्य: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

“मंझा सूंतने से क्या मतलब…”

“मंझा किस काम का… निठल्लों का काम है पतंग उड़ाना… जब-तब मंझा उनके ही हाथ और अंगुलियां भी काटता है… राह चलते लोगों के गले और पंछियों के पंख भी काटता है ये मंझा… समझा…”

“तो क्या पूजा-नमाज बेकार हैं…”

“नहीं… बेकार नहीं हैं… ये ऐसी नेमत हैं जो इंसानियत कायम रखने में मदद देती हैं…”

“अब तेरा वो विद्रोही तेवर कहां है…”

“वो विद्रोह नहीं है… प्रैक्टिकल थिंकिंग है…” नूरा ने यह सुना तो और उलझ गया। देवेश ने उसे समझाया, “मैं भगवान या खुदा से विद्रोह नहीं करता… उनके प्रति मेरी आस्था है… लेकिन मेरी आडंबर और ढोंग में कोई आस्था नहीं है… ये सब मेरे बाप के कारण हुआ है… उसने परिवार के किसी इंसान को भगवान का भेजा समझा ही नहीं… उसके लिए तो पत्थर की प्रतिमाएं ही सब कुछ थीं… सर्दी आई नहीं कि भगवान की मूर्ती के लिए स्वेटर तैयार… गर्मी आई नहीं कि कूलर खरीद कर प्रतिमा के पास लगवा आए… भंडारा हुआ नहीं कि पांच हजार रुपए की रसीद कटा आए… पंडित और उसके पूरे परिवार को हर साल दो बार नए कपड़ों की सौगात… और पूरा परिवार दो वक्त ठीक खाने और साल में एक जोड़ी अच्छे कपड़े और चप्पल के लिए तरस जाता… बस, तभी ये भावना भर गई कि जो मंदिर में है… मेरे बाप का ही है… फिर चाहे किसी भी शहर का कोई भी मंदिर हो…”

“और तुने ये खेल चालू कर दिया…”

“हां… शनिवार को हनुमान मंदिर… गुरुवार को साईं मंदिर… जब जिस देवी-देवता का दिन हो… मंदिर पहुंचो… उस दिन खूब चढ़ावा होता है… उनकी तिजोरियां भरती हैं… मेरी जेब भी थोड़ी सी भरती है… कुछ दिन का खर्च निकल आता है…”

“ये सारे खंभे और मटन कीमा उसी रास्ते से हैं…”

“ये सब ही नहीं… बाकी सब कुछ भी…”

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