हर हर महादेव, हर हर मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केदारनाथ पर इवेंट किया और इसकी बड़ी चर्चा शुरू हो गई कि यह क्या हो रहा है। काला चश्मा, शानदार डिजाइनर पोशाक, शूटिंग अरेंजमेंट, विशेष जूते पहन कर लाल कालीन पर परिक्रमा और और पाबंदी के बावजूद गर्भगृह तक कैमरे, सिर्फ इसलिए कि जनता को प्रधानमंत्री महादेव का पूजन करते हुए दिखने चाहिए। लोग समझ लेंगे कि हमारे राजा ने महादेव की पूजा कर ली है, अब हमें उनकी जय बोलना है। अब तक के सबसे महान, सत्यवादी और हिंदू धर्म ध्वजावाहक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने ही समक्ष हर हर महादेव के साथ हर हर मोदी के नारे लगते देख अभिभूत हुए, प्रफुल्लित हुए। समस्त भूमंडल पर इस घटना का सीधा प्रसारण होने दिया। या कहें कि सीधा प्रसारण ही इस भक्तिभाव का मुख्य उद्देश्य था।

यह कोई धार्मिक कार्य नहीं था। प्रजा के हित में कोई यज्ञ या अनुष्ठान नहीं था। सिर्फ एक शूटिंग थी, जैसी फिल्मों की होती है। हीरो सजधजकर अभिनय करता है और फिर उसका चलचित्र लोग आनंदपूर्वक देखकर आह्लादित होते हैं। मोदी ने भी केदारनाथ में ऐसा ही कुछ किया, जिससे कि लोग खुश हों और वे यह न समझें कि प्रधानमंत्री कोई काम नहीं कर रहे हैं। महादेव की आराधना से बड़ा काम और क्या हो सकता है? वह मोदी ने किया। अब लोग कुछ भी कहते रहें। उससे क्या होता है।

मोदी पहली बार केदारनाथ थोड़े ही गए हैं। जबसे वह प्रधानमंत्री बने हैं, तब से उनकी नजर हिमालय पर लगी है। महादेव लगातार उन्हें बुला रहे हैं और उन्होंने ठान रखा है कि उत्तराखंड के समस्त तीर्थ स्थलों को वह पर्यटन स्थल बनाकर मानेंगे। इस दिशा में महती प्रयास के तहत उन्होंने शंकराचार्य की प्रतिमा लगवा दी है और बगैर किसी वास्तविक शंकराचार्य को निमंत्रित किए खुद ही उसका लोकार्पण भी कर दिया है। साथ ही प्रतिमा के सामने कुछ क्षण ध्यानमग्न होने का अभिनय करते हुए तस्वीरें खिंचवाईं। तस्वीरों का एंगल यह है कि मोदी शंकराचार्य की प्रतिमा के सामने श्रद्धावनत भाव में बैठे हुए दिखें।

प्रधानमंत्री ने केदारनाथ मंदिर के सामने माइक लगवाकर टीवी पर राष्ट्र के नाम संदेश दिया। इसका संकेत यह है कि इस देश में वही सर्वशक्तिमान हैं और महादेवजी के कृपापात्र वरदान प्राप्त एकमात्र अवतारी महापुरुष हैं, जिन्होंने भारत भूमि को म्लेच्छों से मुक्त करने का अभियान शुरू कर दिया है। अब भारत पूरी तरह म्लेच्छ-मुक्त और विश्वगुरु बनकर रहेगा। प्रधानमंत्री मोदी विश्वगुरु बनने के लिए पिछले करीब 10 साल से रोजाना धाराप्रवाह औसतन दो तीन चार घंटे बोलने की प्रैक्टिस कर रहे हैं। उनकी जिंदगी में सुनने का कोटा बहुत कम है। उनके मंत्रियों को विशेष रूप से पत्रकारों को बताना पड़ता है कि मोदी मंत्रियों की बात सुनते भी हैं।

लोग केदारनाथ पर मोदी के इवेंट को लेकर तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। अच्छा था, बुरा था, धार्मिक भावनाओं का अपमान किया, जूते पहनकर परिक्रमा की, माइक लगवा दिया, गर्भगृह तक कैमरा पहुंच गया, यह नियमों के खिलाफ है, वगैरह-वगैरह। इससे क्या होता है? उन्होंने सात साल में बहुत रापटरोला कर दिया है। आधी से ज्यादा जनता त्राहिमाम की स्थिति में है। निरंकुश रूप से शासन करने के लिए जनता को त्राहिमाम की स्थिति में बनाए रखना और अज्ञात शक्तियों का भय दिखाते रहना जरूरी है। जो अज्ञात शक्तियों का भय नहीं मानते उन्हें आतंकवादी नामक ज्ञात शक्ति से डराने की कोशिश होती है।

मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करने वाली ताकतें जानती हैं कि जनता को कैसे उलझाए रखा जाए और चुपचाप अपना एजेंडा लागू किया जाए। जांच एजेंसियों को निष्पक्ष मत रहने दो। न्यायाधीशों के पद खाली रहने दो। डूबती अर्थव्यवस्था की तरफ किसी की नजर मत जाने दो। सरकार के किसी भी काम का विरोध करने वालों को राजद्रोही घोषित कर दो। युवा पीढ़ी को ज्ञान से वंचित कर कपोल कल्पित पौराणिक कथाओं की तरफ जबरन धकेलो। लोगों को अपने पैरों पर खड़ा मत होने दो और कमाई के अवसर तो बिलकुल मत रहने दो। सिर्फ कुछ गुजरातियों के पास कमाई करने का विशेष अधिकार है।

यह परिस्थिति लगातार बनी हुई है। देश कहां जाकर रुकेगा, कोई नहीं जानता। छोटे-छोटे पड़ोसी देश भारत से आगे निकल रहे हैं। लेकिन भारत में लोगों को आपस में लड़वाने की तरकीबें भिड़ाई जा रही हैं। आंदोलन मोदी सरकार को सहन नहीं है। मंत्री तक गोली मारों सालों को…. जैसे नारे लगवाते हैं। सांसद गोड़से का गुणगान करते हैं। गांधी की जगह सावरकर को स्थापित करने का प्रयास जारी है। इतिहास बदला जा रहा है। लोगों की जमीन, आजीविका सबकुछ छीन कर उन्हें परजीवी बनाने की साजिश चल रही है।

अगर भारत के लोगों में थोड़ी सी भी बुद्धि है तो वे समझ रहे होंगे कि भयंकर गलती हो गई है। गलत लोगों के हाथ में देश चला गया है। अब उसे वापस लोकतंत्र की पटरी पर लाने के बारे में कई लोग सोच-विचार करने लगे हैं। इसी सोच-विचार को बाधित करने के लिए मोदी जब-तब तमाशा करने केदारनाथ चले जाते हैं। इधर देश निपटता रहता है। उधर मोदी जनता को उलझाए रहते हैं कि देखो देशहित में मैं क्या कर रहा हूं। महादेव की आराधना कर रहा हूं। ध्यान लगा रहा हूं।

…..और लोग बाकी सब बातें भूलकर मोदी की तरफ देखने लगते हैं। इस समय यही भारतीय लोकतंत्र का वास्तविक और भयानक स्वरूप है।

ऋषिकेश राजोरिया

लेखक देश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। देश, समाज, नागरिकों, व्यवस्था के प्रति चिंतन और चिंता, उनकी लेखनी में सदा परिलक्षित होती है।

(लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। इससे इंडिया क्राईम के संपादक या प्रबंधन का सहमत होना आवश्यक नहीं है – संपादक)

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