भारत विश्व गुरु बनेगा या मोदी महागुरु कहलाएंगे?

नोवल कोरोना वायरस कोविड-19 का कहर पूरे विश्व में फैला हुआ है। भारत भी इसकी चपेट में है। अगर शुरू से ही इस पर निगरानी रखी जाती तो देश की अर्थव्यवस्था का बंटाढार होने से बचा जा सकता था।

विश्व स्वास्थ्य संगठन को 31 दिसंबर 2019 को इस बीमारी की सूचना मिल चुकी थी। चीन के वुहान शहर से इसका फैलाव हुआ। इसे नोवल कोरोना वायरस नाम दिया गया।

सूचनाओं के अनुसार 13 जनवरी को थाईलैंड, 20 जनवरी को दक्षिण कोरिया, 21 जनवरी को ताइवान और संयुक्त राज्य अमेरिका, 22 जनवरी को हांगकांग और मकाउ, 23 जनवरी को सिंगापुर, 24 जनवरी को फ्रांस, नेपाल और वियतनाम, 25 जनवरी को आस्ट्रेलिया और मलेशिया, 26 जनवरी को कनाडा, 27 जनवरी को कंबोडिया, 28 जनवरी को जर्मनी, 29 जनवरी को फिनलैंड, श्रीलंका, संयुक्त अरब अमीरात, 30 जनवरी को भारत, इटली, फिलीपींस और 31 जनवरी को ब्रिटेन, रूस, स्वीडन, स्पेन में इस वायरस के फैलने की खबर मिली। 

11 जनवरी 2020 को इससे वुहान में पहली मौत हुई। 23 जनवरी को पहली बार वुहान शहर लॉकडाउन किया गया और आठ अप्रैल को वहां लॉकडाउन खत्म हो गया। 30 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) ने मेडिकल इमरजेंसी घोषित की।

इसी दिन भारत के राज्य केरल में चीन से लौटे एक छात्र में कोरोना संक्रमण की पुष्टि हुई। 22 फरवरी को इटली में इससे पहली मौत हुई। इसके बाद वहां सोशल डिस्टेंसिंग लागू हुई। वहां लोग मरने लगे। यह यूरोप और अमेरिका में फैलने लगा। 11 मार्च को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस को महामारी घोषित कर दिया।

अब तक पूरे विश्व में कोरोना वायरस से करीब एक लाख लोग मर चुके हैं और 16 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हैं। सबसे ज्यादा संक्रमित लोग अमेरिका में हैं, जबकि इटली में सबसे ज्यादा मौतें हो चुकी हैं।

कोरोना से संक्रमित होने वाले व्यक्ति में निमोनिया जैसे लक्षण दिखते हैं। इसे सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोना वायरस 2 (सार्स कोरोना वायरस-2) कहा जाता है।

डबल्यूएचओ के अनुसार कोरोना से संक्रमित 80 फीसदी लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं। संक्रमित छह में से एक व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार होता है और वह सांस लेने में तकलीफ होने की स्थिति तक पहुंचता है।

संक्रमण की चार श्रेणियां हैं।

  • पहली श्रेणी में संक्रमित व्यक्ति में कोई लक्षण नहीं दिखते।
  • दूसरी श्रेणी में सांस संबंधी समस्या होती है और बुखार, खांसी, सिरदर्द या कंजक्टीवाइटिस (आंख की बीमारी) के लक्षण दिखाई देते हैं। ये लोग संक्रमण फैलाते हैं।
  • तीसरी श्रेणी में निमोनिया के लक्षण वाले कोविड-19 पाजिटिव लोग होते हैं, जिन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है।
  • चौथी श्रेणी के मरीजों में निमोनिया जैसी गंभीर बीमारी दिखाई देती है।

केरल में 30 जनवरी को कोरोना संक्रमण का मामला सामने आने के बाद केरल सरकार ने तत्काल एहतियाती उपाय शुरू कर दिए थे। इसके साथ ही गोवा भी सतर्क हो गया था।

गोवा सरकार ने भी राज्य में इसके संक्रमण को रोक दिया।

छत्तीसगढ़ सरकार ने भी सराहनीय तरीके से रोकथाम कर ली।

उसी समय भारत सरकार भी उचित कदम उठा सकती थी। हवाई अड्डों पर निगरानी होती। सम्मेलन जैसे आयोजन रोके जाते। संदिग्ध लोगों को क्वारंटाइन किया जाता। इस तरह भारत सरकार के पास कोरोना संक्रमण फैलने की संभावनाओं को समाप्त करने के पर्याप्त अवसर थे। 

मोदी सरकार लापरवाह रही या उसका रवैया टालमटोल वाला रहा या उसे राजनीतिक बढ़त लेनी थी, कुछ भी हो, कोरोना आज देश के लिए बहुत बड़ी मुसीबत के रूप में प्रचारित हो रहा है।

कोरोना पर नियंत्रण करने की बजाय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भव्य स्वागत समारोह जरूरी था और  मध्य प्रदेश में सरकार बदलना भी जरूरी लगा। साथ ही दिल्ली में 14-15 मार्च को तब्लीगी जमात के कार्यक्रम की अनुमति देने में भी केंद्रीय गृह मंत्रालय ने तत्परता दिखाई। जब विश्व में कोरोना का फैलाव हो रहा था, तब समय रहते विदेशियों को भारत आने से नहीं रोका गया। तब तक पश्चिमी देशों से कोरोना के कारण बड़ी संख्या में लोगों के मरने की खबरें आने लगी थी। कोरोना की भीषणता का प्रचार होने लगा था।

यह सब हो जाने के बाद आदरणीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुनिया के सामने अपनी नेतृत्व क्षमता का प्रदर्शन करने का अवसर खोजा। कोरोना से लड़ने के लिए 22 मार्च को एक दिन का जनता कर्फ्यू लगाने की अपील की और उस दिन शाम तो ताली, थाली, घंटी आदि बजाने का आह्वान किया। लोगों का समर्थन मिला तो 24 मार्च की शाम को आठ बजे उन्होंने बगैर किसी से सलाह-मशविरा किए 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा कर दी।

लॉकडाउन के दौरान जम कर प्रचार हुआ कि तबलीगी जमात के लोगों ने देश में कोरोना वायरस फैलाया। अब लॉकडाउन की अवधि खत्म होने वाली है और मोदी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से सलाह मशविरा कर रहे हैं कि लॉकडाउन कैसे हटाया जाए? हटाया जाए या बढ़ाया जाए।

विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भी लॉकडाउन के दौरान लोगों को भयभीत देखकर अपनी ताकत दिखाने का मौका मिल गया। तरह-तरह के फरमान जारी होने लगे। अपीलें होने लगी। निजी स्तर पर काम धंधा करने वालों ने अपने कर्मचारियों को निकाल दिया। एक झटके में लाखों लोग सड़क पर आ गए और उनका भविष्य अनिश्चित हो गया।

इस बीच कोरोना से निबटने के लिए चंदा उगाही का सिलसिला भी शुरू हुआ। प्रधानमंत्री ने एक अलग कोष बनाया, मुख्यमंत्रियों ने भी अपने कोषों का वजन बढ़ाने का मौका देखा, कर्मचारियों का वेतन तक काट लेने की घोषणाएं हुई। मास्क लगाना जरूरी बताया गया। उसका नया कारोबार स्थापित हुआ। कुछेक अखबारों के मालिकों ने भी कोरोना संकट के मद्देनजर चंदा इकट्ठा किया।

अब पूरे देश के सामने पहाड़ जैसी मुसीबत है। लॉकडाउन की परिस्थिति आगे भी रहने के पूरे आसार हैं। जन साधारण का जीवन मुश्किलों में फंस गया है। खेतों में फसलों की कटाई होनी है। मजदूर पलायन कर गए हैं। अपने गांव-घर जाने के लिए निकल पड़े लोग रास्तों में अटके हुए हैं।

टीवी चैनलों पर कोरोना का हंगामा है और अखबारों में भी कोरोना के अलावा और कोई खबर नहीं है। जब मोदी ने लॉकडाउन की घोषणा की थी, तब तक भारत में कोरोना से दस लोग भी नहीं मरे थे। सख्त लॉकडाउन की घोषणा किए बगैर भी बीमारी जनित विकट परिस्थिति पर काबू पाया जा सकता था।

विदेशों की खबरों के आधार पर भारत में आतंक मचाना और बीमारी के नाम पर सांप्रदायिक भेदभाव की राजनीति शुरू होना देश के किस रास्ते पर चल पड़ने का संकेत है? भारत विश्व गुरु माना जाए या मोदी को महागुरु कहा जाए?

श्रषिकेश राजोरिया

15 अप्रैल 2020

लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। इससे इंडिया क्राईम के संपादक या प्रबंधन का सहमत होना आवश्यक नहीं है – संपादक

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