देश अंधी गली में, क्या भारतीय अपनी बुद्धि का इस्तेमाल नहीं कर सकते?

देश एक अंधी गली में प्रवेश कर चुका है। अब यहां के करीब 80 करोड़ लोगों का भविष्य कौन तय करेगा, जो किसान, मजदूर और गरीब की श्रेणी में आते हैं? जनवरी 2020 में कोरोना वायरस का प्रवेश देश में हुआ और अब क्या हालत है, सब देख रहे हैं। लगातार दूसरे साल मार्च से जून के दरमियान कोरोना की दूसरी लहर आ गई और पिछले साल की तरह फिर से प्रशासन और पुलिस ने लोगों को कोरोना से बचाने का जिम्मा संभाला। पिछले साल अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ाई थी और इस साल घुटनों के बल आ गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शेयर बाजार के बढ़ते आंकड़ों के सहारे देश की अर्थव्यवस्था को सही बताने का प्रयास हो रहा है, वहीं देश के भीतर हाहाकार मचा हुआ है।

पहली लहर में करोड़ों लोगों का रोजगार छिना। शहरों से प्रवासी मजदूरों को खदेड़ा गया। गाजे-बाजे के साथ अचानक घोषित की गई लोगबंदी से ऐसी स्थिति बनी, जो पहले कभी नहीं देखी गई थी। कोरोना के नाम पर बहुत से प्रोडक्ट बिके। सेनिटाइजर, पीपीई किट और मास्क। दूसरी लहर में रेमडेसिविर इंजेक्शन की कालाबाजारी, ऑक्सीजन का संकट और देश के चिकित्सा ढांचे की दुर्दशा का साक्षात दर्शन। पिछली बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों को कोरोना से बचाने का जिम्मा संभाला था। इस बार यह जिम्मेदारी राज्यों को सौंप दी गई और वैक्सीन आने के बाद उसमें भी राजनीति हुई। देश के भीतर जल्दी टीकाकरण करने की बजाय विदेशों की चिंता की गई।

इस बार दूसरी बार लाखों की संख्या में स्कूल, कॉलेज बंद होने से विद्यार्थियों के भविष्य को फिर से झटका लगा है और इस वर्ष दसवीं और बारहवीं की महत्वपूर्ण परीक्षाएं रद्द कर दी गई है। जमकर प्रचार किया जा रहा है कि विद्यार्थियों को ऑनलाइन पढ़ना चाहिए। इस बीच तीसरी लहर की भविष्यवाणी पहले से कर दी गई है, जिसके बाद तय मानिए, अगले वर्ष के मार्च से जून तक के महीनों में फिर मुसीबत झेलना पड़ेगा। इससे अर्थ व्यवस्था की जो बची हुई जान है, वह भी निकल जाएगी और फिर कुछ बड़ी कंपनियों का खुला खेल फरक्काबादी चलेगा। मोदी सरकार सार्वजनिक संपत्तियों को बेचने पर आमादा है। आर्थिक भ्रष्टाचार की खबरें आ रही हैं। भाजपा में असंतोष की खबरें आ रही हैं। फिर भी देश ठहरा हुआ है। कोई हलचल नहीं है। सबकुछ इस तरह सरकार के कब्जे में आ गया है कि इस शिकंजे को ढीला कैसा किया जाए, यही इस समय की सबसे बड़ी चुनौती है।

महामारी से संक्रमण और मौतें सामान्य बात है, लेकिन सबसे गंभीर बात है, इलाज की व्यवस्था नहीं होना और पाबंदियों के कारण हर उम्र के लोगों में बढ़ती मानसिक समस्याएं। लॉकडाउन के दौरान घरों के भीतर क्या होता है, इसके बारे में सही आंकड़े उपलब्ध नहीं है, लेकिन मोबाइल फोन पर पोर्नोग्राफी बढ़ रही है। रेप की घटनाओं का ग्राफ बढ़ रहा है। बच्चे तक रेप करने लगे हैं। सोशल मीडिया पर हर एंगल से व्याभिचार की प्रेरणा दी जा रही है। एक तरफ समाज को विकृत करने का प्रयास और दूसरी तरफ सीखने-सिखाने के सिलसिले पर फुल स्टॉप। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सरकार के पक्ष में उपद्रव और फर्जी व्हाट्सएप संदेश देखकर बौराए हुए लोग। किसी को समझ में नहीं आ रहा है कि वे और उनके परिवार के लोग, अगली पीढ़ी के लोग जिंदगी के किस मुकाम पर पहुंच गए हैं।

संपन्न लोग तेजी से देश छोड़ रहे हैं। वे कहीं भी छोटे देश में जाकर बस जाना चाहते हैं, क्योंकि वे यहां सुरक्षित महसूस नहीं करते और व्यवस्था के साथ संघर्ष करने का साहस उनमें नहीं है। जहां सिर्फ मास्क नहीं लगाने वालों से पुलिस करोड़ों रुपए पुलिस वसूल लेती है, वहां के नागरिकों का मानसिक स्तर समझा जा सकता है। लोगों को बीमारी से बचाने का काम पुलिस का नहीं है, फिर से लोगों को करोना से सबसे ज्यादा बचाने का काम पुलिस ने किया। लॉकडाउन की घोषणा और सड़कों पर पुलिस। गजब का सीन। शहरों की हालत खराब और कोरोना की ग्रामीण क्षेत्रों दस्तक। मरने वालों की अधिकृत और वास्तविक संख्या में भारी अंतर। ऊपर से वास्तविकता दिखाने के प्रयासों को रोकने के प्रयास। राजद्रोह के मुकदमे। नक्सली घोषित। जमकर दुष्प्रचार।

इस समय भाजपा के आईटी सेल के लोग सोशल मीडिया पर महंगाई को उचित बताने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। पेट्रोल शतक लगा चुका है। डीजल भी लगा रहा है। रसोई गैस सिलेंडर चार अंकों में पहुंच रहा है। खाने के तेल की कीमत तीन साल में तीन गुना बढ़ गई है। रसोई घरों में लगने वाली जरूरी चीजें बहुत महंगी हो गई है और पूरी सप्लाई चेन को अस्त-व्यस्त किया जा रहा है। इतना सबकुछ होने के बावजूद जनता को सिर्फ यह समझाया जा रहा है कि बीमारी से बचो। बीमारी से बचने में पीढि़यां नष्ट हो जाएं, बच्चों का खेलना-कूदना, पढ़ना-लिखना रुक जाए, वह चलेगा।

देश के लोग यह नहीं समझ रहे हैं कि इस तरह जीना भी क्या जीना है? जिस देश के आधे से ज्यादा लोग अस्पताल नहीं जाते थे। या उसी स्थिति में जाते थे, जब दुर्घटना में हड्डी टूट जाए या कैंसर, हार्ट अटैक जैसी गंभीर बीमारी हो जाए। लगता है ऐसे लोगों से मेडिकल माफिया कोरोना के नाम पर तगड़ी दुश्मनी निकाल रहा है और सरकारें भी उनका साथ दे रही है। इस देश में बहुत से न्यायाधीश हैं, सरकारी अधिकारी हैं, नेता हैं, और भी बड़े-बड़े लोग हैं। क्या वे याद कर सकते हैं कि भारत में जन्म लेने के बाद वे कितनी बार अस्पताल गए या उनका जीवन किसी एमबीबीएस डॉक्टर पर निर्भर रहा?

यह देश अपनी रफ्तार से अपनी सभी विशेषताओं के साथ आगे बढ़ रहा था। जो पढ़े-लिखे, समझदार, नेता, अधिकारी आदि सभी इस बात को जानते हैं। फिर भी देश के भोले-भाले लोगों को कोरोना से इस कदर आतंकित कर दिया गया है कि समझ में नहीं आता आगे का रास्ता क्या है? लोग अपनी परंपराओं के साथ हंसी-खुशी जीवन चलाते आ रहे थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इससे क्या तकलीफ थी? क्या सिर्फ इसलिए लोगों को त्रस्त किया जाएगा कि वे भाजपा के अलावा और किसी अन्य पार्टी को वोट न दें? कोरोना महामारी सिर्फ भारत की ही नहीं, विश्व की समस्या है। क्या भारत को अपने हिसाब से बीमारी से निबटने का अधिकार नहीं है? क्या भारतीयों को यह स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए कि वे खुद अपने दम पर स्वस्थ रह सकें?

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