MBMC चुनाव 2022: भाजपा और शिवसेना सहित सभी दलों में आपसी कलह चरम पर

श्रवण शर्मा, पत्रकार, भायंदर, मुंबई

मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। सभी राजनीतिक दलों की एक ही मंशा होती रही है कि, यहां की सत्ता उनके हाथों में आ जाए। सभी ने अपने प्रयास और प्रयोग किये हैं। फिलहाल शिवसेना-राष्ट्रवादी कांग्रेस और नेशनल कांग्रेस की गैर अथवा विरोधी विचारधारा की सरकार सत्ता में है! क्योंकि सभी को सत्ता का श्रीखंड चाटना है!

अब बात करता हूँ, मुंबई से सटे मिरा-भाईंदर शहर की। यह शहर भी सोने की खान मानी जाती है क्योंकि यहां जमीनों के भूखंडों का श्रीखंड खानेवाली समस्त बिल्डर लाबी और ठेकेदार राजनेताओं के कब्जे में हैं। वर्तमान समय में भाजपा-शिवसेना और कांग्रेस के जनप्रतिनिधी मनपा की सत्ता में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। भाजपा संख्या बल पर सत्तारूढ़ है।

अब आगामी परिदृश्य यह दिखाई दे रहा है कि, भाजपा और शिवसेना सहित सभी दलों में आपसी कलह चरम पर है! पूर्ववर्ती भाजपा विधायक नरेन्द्र मेहता अपने पदाधिकारियों को ढेंगा दिखा कर अपना वर्चस्व स्थापित रखने का प्रयास और प्रयोग कर रहे हैं। वर्तमान भाजपा जिलाध्यक्ष रवि व्यास आगामी रणनीति बना रहे हैं।

शिवसेना आपसी कलह में उलझी हुई है, क्योंकि अपक्ष उम्मीदवार के रूप में भाजपा से बगावत करके विधायक बनी गीता भरत जैन (जिन्होंने बाद में शिवसेना का दामन थाम लिया था) और शिवसेना के ही विधायक प्रताप सरनाईक के बीच अपने कार्यकर्ताओं के वर्चस्व को लेकर मतभेद साफ दिखाई दे रहा है।

कांग्रेस सिर्फ मुजफ्फर हुसैन की कंपनी बनी हुई है और एक सीमित दायरे में सिमटी हुई है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी आपसी कलह में वर्तमान जिलाध्यक्ष अंकुश मालुसरे और पूर्व जिलाध्यक्ष संतोष पेंडुलकर के बीच अटकी हुई है।

सभी दलों के गुट अपने विरोधी गुट की जीत बर्दाश्त करते दिखाई नहीं दे रहे हैं। अपने ही दल के लोगों को हराने में तत्पर दिखाई दे सकते हैं।

बहुजन विकास अघाडी के लोग भी हाथपैर मार रहे हैं। आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता जमीन से जुडकर काम कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक समीकरण कठिन है, क्योंकि कोई बडा चेहरा नहीं है।

इन सबके बीच विशेष बात यह है कि, मिशन इम्पॉशिबल के बैनर तले भगवान कौशिक शहरवासियों में जागरूकता अभियान चला रखे हैं। लोगों की तालियां और समर्थन भी मिल रहा है लेकिन मतदाताओं का रुझान तो समय आने पर पता चलेगा।

भगवान कौशिक की सबसे बडी समस्या यह है कि, उनके पास न तो धनबल है और न ही बडा प्लेटफार्म। यही परिस्थिति आम आदमी पार्टी के स्थानीय नेताओं की है, इनके पास प्लैटफॉर्म है लेकिन धनबल नहीं।

कुछ दिनों की बात…और आगामी पांच सालों का अपघात! सोचना सभी को है! नेताओं को भी और मतदाताओं को भी!

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विगत तीन दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं।

(लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। संपादक मंडल का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

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