क्या देश में सिर्फ दो ही नेता रह गए? लोकतंत्र कैसे बचेगा?

जैसी कि उम्मीद थी, तालाबंदी 17 मई तक और बढ़ा दिया गया। इस बार आदरणीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बजाय गृहमंत्री अमित शाह ने तालाबंदी बढ़ाने की घोषणा की। इसका मतलब यह हुआ कि मोदी ने जो करना था, वह कर दिया, अब आगे की स्थिति अमित शाह संभालेंगे। इन दोनों ने जो कुछ भी गुजरात में किया था, वह अब पूरे देश के साथ कर रहे हैं। यह सही है या गलत, यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन जनता का धैर्य अब समाप्त होने वाला है। अमित शाह के निर्देशन में जनसाधारण की कुटाई शुरू होगी। पुलिस जनता के साथ उसी तरह पेश आएगी, जैसी अंग्रेजों की गुलामी के दौर में जनता के साथ करती थी।

अब देश स्वतंत्र है। चुनी हुई सरकार है। मोदी और शाह की सरकार जो कुछ कर रही है, वह पर्याप्त बहुमत मिलने के बाद कर रही है। देशहित और देशभक्ति से इन दोनों महानुभावों का कोई लेना-देना नहीं है। यह नोटबंदी के बाद ही लोगों को समझ लेना था। नोटबंदी लोगों ने झेल ली। भारतीय बन चुकी एक इटैलियन महिला और उनके पुत्र के हाथों में देश की बागडोर नहीं चली जाए, इसका खतरा दिखाते हुए मोदी और शाह ने दुबारा लोकसभा चुनाव जीतने के लिए प्रचार किया और जनता ने फिर से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को बहुमत से चुना।

मोदी और शाह ने बहुमत जुटाने के लिए जो भी तिकड़में भिड़ाई, जैसे सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक, आतंकवाद का खात्मा, पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध की तैयारी आदि बातों को लोगों ने मान लिया। अब क्या हो रहा है, सामने दिखाई दे रहा है। जनता बुरी तरह इन दोनों खलनायकों के झांसे में आ चुकी है और अब उसके पास मोदी-शाह की जुगलबंदी से चल रहे अत्याचारी शासन से निबटने का कोई उपाय नहीं है। इन दोनों नेताओं के स्वर हैं- जिसको जो करना हो कर लो, हम तो वही करेंगे, जो हमारे दिमाग में है। कोरोना तो एक बहाना है, हमें तो पूरी तरह संघ का एजेंडा चलाना है।

चालीस दिन के तालाबंदी में पूरे देश में किसानों, मजदूरों और गरीबों की ऐसी-तैसी हो चुकी है। इनमें से कोई भी कोरोना से पीडि़त नहीं है। कोरोना नामक महामारी से कोई नहीं मर रहा है। मीडिया जिस तरह महामारी का प्रचार कर रहा है, वह एक भयानक भ्रम है। लोगों को समझाने की निरर्थक कोशिश है कि सरकार कोरोना के प्रकोप से देश को बचा रही है। कोरोना के नाम पर अब देश को तोड़ने की साजिश चल रही है। जीना-मरना किसी के हाथ में नहीं है। अपने जीवन की रक्षा करना प्राणी मात्र का धर्म है, जो मनुष्य भी करता है। कोई जी लेता है, कोई मर जाता है। लेकिन एक बीमारी के नाम पर अगर कोई दुष्ट शासक अपनी ही प्रजा को जीते जी मार देने का इंतजाम करने लगे तो वह ठीक नहीं है।

कोरोना या कोविड-19 का प्रकोप कहां से फैला। दुनिया में कहां कितने लोग मर गए। अमेरिका, स्पेन, इटली, जर्मनी आदि-इत्यादि देशों की क्या हालत है। कौन कैसे महामारी से निबट रहा है। इन सब बातों का अब कोई मतलब नहीं रह गया है। अब सवाल भारत के लोकतंत्र को बचाने का है। देश बहुत बड़ा है। इसमें 28 राज्य हैं और नौ केंद्र शासित प्रदेश हैं। कुल जनसंख्या 130 करोड़ से ज्यादा है। यहां विश्व की कुल जनसंख्या के 17 फीसदी से ज्यादा लोग रहते हैं। अगर किसी महामारी से इस देश के दो-चार लाख लोग मर भी गए, तो देश की सेहत पर ज्यादा असर होने वाला नहीं है।

ताजा आंकड़ों के मुताबिक कोरोना वायरस संक्रमित लोगों की संख्या पूरे देश में 20 हजार तक पहुंच रही है और करीब 1500 लोगों की मौत हो चुकी है। संक्रमितों की संख्या बढ़ेगी और मरने वालों की संख्या भी बढ़ेगी।

इन आंकड़ों के आधार पर किसी भी सरकार को देश की जनता के जीवन के साथ खिलवाड़ करने का अधिकार नहीं होना चाहिए, जो कि मोदी और शाह ने स्वयंभू तरीके से हासिल कर लिया है। ये दोनों नेता जनता को बीमारी से बचाने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। जो करना है, वह राज्य सरकारें कर रही हैं। ये दोनों नेता सिर्फ आदेश जारी कर रहे हैं और जनता में भय पैदा कर रहे हैं, जिसमें मीडिया भी इनका साथ दे रहा है। पुलिस को अपना इकबाल बुलंद करने का सुनहरा मौका मिल गया है। हकीकत यह है कि पुलिस किसी को बीमारी से नहीं बचा सकती है।

कोरोना के अलावा भी कई बीमारियां हैं। कैंसर, दिल की बीमारी, सर्दी-जुकाम, खांसी, पेटदर्द जैसी और भी कई सामान्य बीमारियां हैं, जिनसे हर महीने करीब छह लाख लोग मर जाते हैं। इन सभी बीमारियों का इलाज तमाम सरकारी अस्पतालों में स्थगित है। सिर्फ कोरोना से संक्रमित लोगों को खोजा जा रहा है। उन्हीं की खबरें मीडिया में आ रही हैं। कोरोना का भय दिखाकर समस्त देशवासियों को नजरबंद कर दिया गया है। क्या इस देश के सभी पुरुष नपुंसक हो चुके हैं, जो कुछ नहीं कर सकते? क्या मोदी और शाह के अलावा उनके मंत्रिमंडल के बाकी सदस्यों और भाजपा के तमाम सांसदों की बुद्धि को पाला पड़ गया है? क्या विपक्ष के नेता लोकतंत्र को बचाने के लिए कुछ नहीं कर सकते? क्या सिर्फ दो नेता ही देश में बचे हैं, जिन्होंने देश के साथ कुछ भी करने की जिम्मेदारी संभाल ली है?

यह देश के सामने एक गंभीर संकट है, जिसके लिए लोगों को तत्काल प्रभाव से जागरूक होने की जरूरत है, नहीं भारतीय लोकतंत्र को मजाक का विषय बनते देर नहीं लगेगी।

ऋषिकेश राजोरिया

लेखक देश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। देश, समाज, नागरिकों, व्यवस्था के प्रति चिंतन और चिंता, उनकी लेखनी में सदा परिलक्षित होती है।

(लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। इससे इंडिया क्राईम के संपादक या प्रबंधन का सहमत होना आवश्यक नहीं है – संपादक)

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