पाश: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज : लेखक – विवेक अग्रवाल

अफसोस कि इतने जबरदस्त शायर को फिल्म इंडस्ट्री स्वीकार करने के लिए कतई तैयार नहीं।

मुंबईया हिंदी फिल्म उद्योग के बड़े गीतकार समीर शरण के लिए पाश गीत लिखता है। समीर शरण उसे हर गाने के पीछे एक या दो हजार रुपए देते हैं।

यह बात और है कि समीर शरण हर गाने के लिए पांच लाख लेते हैं। यह बात पाश भी जानता है।

“समीर शरण तेरे गाने से पांच लाख कमाता है…” एक बार गुस्से से बाबू भाई ने पाश से कहा।

“छोड़ो बाबू भाई… उसको अपने ब्रांड का पैसा मिलता है… जब हम भी ब्रांड बन जाएंगे… तो हम 10 लाख लेंगे…” पाश उनकी बात लापरवाही से धुंए में उड़ा देता।

“लेकिन है तो ये गलत ना…”

“कुछ गलत नहीं है बाबू भाई… वक्त का फेर है… हम सड़क की टपरी से कटिंग चाय पीते हैं… पांच रुपए देते हैं… ताज होटल में चाय पीते हैं… पांच सौ रुपए देते हैं… सब ब्रांड का खेल है… हलाकान न हों…

तुम गुस्ताख हो, ऊंची आवाज में बात करते हो।

तुम गद्दार हो, हमसे हक की बात करते हो।

चांद दे रहा हूं, तुम रोटियों की बात करते हो।

गजब बेहया हो, हमसे ज़मीर की बात करते हो।

…हमारा वक्त बस आया चाहता है… फिक्र न करें…” पाश ने फिर ठहाका लगाया।

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