तानसेन: उपन्यास अंश… दत्तात्रय लॉज: लेखक – विवेक अग्रवाल

अगले दिन भवानी लौटा। आज दत्तात्रय लॉज में रात बिताने नहीं आया है।

उसने चुपचाप तानसेन उठाया। बाबू भाई के पास फ्रंट डेस्क पर पहुंचा। उनके सामने पांच हजार रुपए रख दिए।

“बाबू भाई मेरा हिसाब कर लेना… ये पांच हजार हैं…”

“अरे तुम्हारा इतना हिसाब नहीं बनता… मैंने कल ही देख लिया था… कुल पंद्रह सौ हुए हैं…”

“कल क्यों…”

“जिसकी पावली चल गई, वो सबसे पहले लॉज छोड़ता है…”

“ये भी सही बात है… ठीक है बाकी रोकड़ा मेरे हिसाब में लिख लो…”

“बोले तो बाबू भाई चकरा गए…”

“बाबू भाई आज से मेरा एक खाता आपके पास चलेगा… हर महीने आपके पास कुछ पैसा छोडूंगा… आपको मेरा एक काम करना है… ये पैसा जो मैं आपके पास छोडूंगा, आप उसके कस्टोडियन रहोगे… लॉज में रहने वाले किसी दोस्त को जरूरत पड़े, तो इस पैसे से उसकी मदद कर देना…”

“भवानी तुम…”

“मैं कुछ अजीब लग रहा हूं ना बाबू भाई… जब तक आपके साथ रहा, तब भी ऐसा ही था… अभी भी वैसा ही हूं… कल आपने मुझे असली खुशी दी… आपने मुझे घर भेजा, वहां सब मेरा इंतजार कर रहे थे… लेकिन कोई खुद से आगे नहीं आया… ग्यारह साल से इंतजार कर रहे थे मेरे लौटने का… मेरी मिठाई किसी ने नहीं खाई… मेरे जाने से सबका मुंह मीठा हो गया… पूरी फेमेली आपसे मिलने आई है…”

यह सुन कर बाबू भाई चमत्कृत रह गए।

भवानी के घर से इतने लोग लॉज में आए कि पूरा दालान भर गया। भवानी के तीनों बच्चों ने आकर उनके पांव छुए। माता-पिता ने बाबू भाई को आशीर्वाद दिया। भाई-बहनों ने शुक्रिया कहा।

तानसेन के साथ भवानी लॉज से चला गया। पीछे बाबू भाई के मन में कुछ रीता सा छोड़ गया।

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