‘जिन्दा’ शहीद…

निरुक्त भार्गव, वरिष्ठ पत्रकार, उज्जैन

देश में इन दिनों नागरिक के स्तर पर, समाज के स्तर पर और राष्टीय स्तर पर भी चिंता और व्यवहार में एक ज्वार-भाटा आया हुआ है! चारों और एक-ही चर्चा दिलचस्पी के साथ सुनी और सुनाई जा रही है. भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद हमें जो व्यवस्था मिली, वो कैसे और क्यों मिली और आम जनता को बीते 70-75 वर्षों में इन सब कवायदों के नतीजे क्या मिले?

एक सशक्त भारतीय नागरिक को केंद्र में रखकर जब उक्त सन्दर्भों में 09 अक्तूबर 2021 को विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के वाग्देवी भवन में एक कार्यक्रम रखा गया, तो ऐसा लगा कि अपन भी जीवन को धन्य कर सकते हैं! उन हस्ताक्षरों से रूबरू होने का मौका मिला जो 1947 से पहले, उसके तुरंत बाद और 75 सालों के सफरनामे के बीच भविष्य का रोडमैप प्रस्तुत करते हैं…

बकौल श्री प्रेम नारायण नागर, जो 96 वर्ष के हैं और जिन्होंने मोहनदास करमचंद गाँधी, राजेंद्र प्रसाद और वल्लभभाई पटेल के साथ अनेकानेक वर्षों तक निकट सहयोगी के रूप में कार्य किया, उनके लिहाज से बहुत-कुछ नया करने की जरूरत है.

वे आज भी पूरी शिद्दत से कहते हैं, “आज़ादी हासिल किए कोई 75 वर्ष हो गए, पर आज लोगो में उत्साह, उमंग और ऊर्जा क्यों नहीं है? क्यों शीर्ष नेता गलतबयानी करते हैं कि देश में कुछ नहीं हुआ, आज़ादी के बाद! हमें जो आज़ादी मिली है, वो खतरों के बाद मिली है! तत्कालीन नेतृत्व को आशंका थी कि कालांतर में कहीं सामाजिक और आर्थिक बिखराव तो नहीं हो जाएगा, हमारे समाज का! आपको देश के हाल जानने हों, तो गांवों की तरफ चलो! भारतीयता को खोजो! गांवों को आबाद करने का वक़्त है! युवाओं पर दायित्व है कि उन्हें देश को बनाना है, तो ग्रामीण संस्कृति को ज़िन्दा करना होगा!“

आप सबने मध्यप्रदेश की राजधानी में स्थापित ‘पंडित माधवराव सप्रे समाचार-पत्र संग्राहालय, भोपाल’ का नाम अवश्य सुना होगा और वहां गए भी होंगे! इस महान अधिष्ठान के पुरोधा पंडित विजयदत्त श्रीधर, जो ‘पद्माश्री’ से अलंकृत हैं, उनकी वरद उपस्थिति से भी सभी श्रोतागण अभिभूत हुए! यहां पढ़िए उनके विचार: “पत्रकार विश्वविद्यालय में तैयार नहीं होते, पत्रकार अनुभव की पाठशाला में तैयार होते हैं…संवेदनशीलता उनका गहना होता है…अनुभूति करने वाले होने चाहिए…समाज से जुड़ाव होना चाहिए…ना तो वे किसी ‘हस्तिनापुर’ से बंधें और ना ही किसी ‘इन्द्रप्रस्थ’ के साथ जुडें! जैसा देखो, वैसे लिखो… यही पत्रकारिता का धर्म है!

हमारी धरा पर ऐसा पवित्र वातावरण कैसे बना? शायद कई लोगों को इसमें दिलचस्पी हो सकती है! मैं गर्व के साथ कह सकता हूं कि छतरपुर के बाशिंदे श्री राजेश बादल ऐसा चाहते थे! उन्होंने एक रिपोर्टर के रूप में अपना कैरियर आरम्भ किया और प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के तमाम माध्यमों में कार्य करते हुए राज्यसभा चैनल (दिल्ली) में सर्वोच्च मुकाम हासिल किया.

ऐसे में उनके उदगार सुनना मन को गुदगुदाता है:  “नई पीढ़ियों को देश की आजादी के बाद की सूरतों का पता नहीं है कि हम कैसे आगे बढ़े? कैसे हम लोगों ने संघर्ष किया है? आज अपनी मातृभूमि की आलोचना करना या अपने देश की आलोचना करना बहुत आसान है, लेकिन किन संघर्षों और कुर्बानियों की बदौलत हमें आज़ादी मिली है, इसको जानना बहुत जरूरी है.”

ऐसे आयोजन जिनमें बबली भैय्या यानी डॉ रामराजेश मिश्र की सन्निधि हो वो ऐतिहासिक बन जाते हैं, सो मैंने ये रिपोर्ताज पेश कर दिया…

लेखक उज्जैन के वरिष्ठ पत्रकार हैं। विगत तीन दशकों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। संप्रति – ब्यूरो प्रमुख, फ्री प्रेस जर्नल, उज्जैन

(उक्त लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। संपादक मंडल का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

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