ज़िंदगी अपनी जब इस हाल में गुज़री ग़ालिब, हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे – मिर्ज़ा ग़ालिब

ग़मे-हस्ती का असद किससे हो जुज़ मर्ग़ इलाज

शम्अ हर रंग में जलती है सहर होने तक

असद यानी मिर्ज़ा ग़ालिब कहते हैं कि जुज़ मर्ग़ यानी मौत के सिवा जिंदगी के दुख-दर्द का इलाज किससे हो सकता है। वे आगे फ़रमाते हैं कि सुबह होने तक शम्मा हर रंग में जलती है ।

ऊपर से देखने में लगता है कि दोनों मिसरों का आपस में कोई रब्त या तालमेल नहीं है। मगर पूरी बात टिकी हुई है ‘हर रंग’ पर।

आप अंधेरी रात में किसी जलते दीपक को या शम्मा को ग़ौर से देखिए। उसकी लो मैं आपको हर रंग नज़र आएंगे। कभी पीला, कभी नीला, कभी लाल, कभी हरा, कभी काला, कभी सफ़ेद।

हमारी परंपरा में हर रंग का एक अर्थ होता है। लाल रंग मुहब्बत का, हरा रंग ख़ुशहाली का, पीला रंग उदासी का, सफ़ेद रंग सुकून का प्रतीक होता है।

शम्मा इन रंगों के साथ सुबह तक जलती है और उजाला होने पर उसकी ज़िंदगी ख़त्म हो जाती है।

ग़ालिब साहब का कहना है कि मौत आने के बाद ही ज़िन्दगी के दुख दर्द से छुटकारा मिलता है। मगर इंसान को चाहिए कि जब तक ज़िन्दगी है वह हर रंग को गले लगा कर शम्मा की तरह जीता रहे।

आपको पता ही होगा कि बहुत कम उम्र में ग़ालिब के सात बच्चों का असामयिक इंतक़ाल हो गया था। किसी मासूम को अपनी गोद में क़ब्र तक ले जाना, इतना बड़ा दुख झेलना सबके बस की बात नहीं है।

ऐसे दुख का सामना करने वाला शायर ही इतनी बड़ी बात कह सकता है और इतनी बड़ी बात कहने वाले शायर को पूरी दुनिया सलाम करती है।

ग़ालिब साहब सादा ज़बान में कोई आसान सा दिखने वाला शेर भी कहते थे, तो उसके भी अर्थ बहुत दूर तक जाते थे। उनका एक शेर है:

मगस को बाग़ में जाने न देना

कि नाहक़ ख़ून परवानों का होगा

इसका सीधा मतलब यही है कि मगस यानी मधुमक्खी को बाग़ में नहीं जाने देना वर्ना परवानों का ख़ून हो जाएगा। इसे सुनने वाला हैरत में पड़ जाता था कि यह कैसे संभव है।

ग़ालिब का तर्क यह है मधुमक्खी बाग़ में शहद का छत्ता बनाएगी। उससे मोम निकलेगा। मोम से मोमबत्ती यानी शम्मा बनाई जाएगी।

जब किसी महफ़िल में शम्मा जलेगी तो उस पर फ़िदा होकर परवाने अपनी जान दे देंगे। भला इतनी दूर तक ग़ालिब के सिवा कौन सोच सकता है।

ग़ालिब का कहना था कि मैं फ़ारसी का शायर हूं। ज़ायक़ा बदलने के लिए कभी-कभी उर्दू में भी लिख लेता हूं।

एक हसीना को दो लोग चाहते हैं तो वे आपस में रक़ीब यानी प्रतिद्वंदी होते हैं। ग़ालिब का एक शेर है-

ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयां अपना

बन गया रक़ीब आख़िर जो था राज़दां अपना

अब रक़ीब पर ग़ालिब साहब का एक फ़ारसी शेर देखिए:

नक़्शे-नाज़े-बुते-तन्नाज़ बआग़ोशे-रक़ीब

ताऊसे-पए-ख़ाम-ए-मानी मांगे

फ़ारसी के इस शेर का अर्थ यह है कि प्रेमिका बड़े नाज़ से रक़ीब के आगोश़ में बैठी है।

चित्रकार कह रहा है कि इसका चित्र बनाने के लिए मुझे मोर के पैर का क़लम चाहिए। मोर के पैर बदसूरत होते हैं। यानी उससे ऐसा बुरा चित्र बनेगा जिसे देख कर दूसरा प्रेमी ख़ुश हो जाएगा।

जब ग़ालिब साहब किसी महफ़िल में फ़ारसी शेर सुना देते थे तो मत पूछिए कि सुनने वालों का क्या हाल होता होगा।

मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी की ऐसी जटिलताओं को देखकर उस समय के एक शायर हकीम आगाजान ने उन पर एक क़त्आ कहा था:

अगर अपना कहा तुम आपही समझे तो क्या समझे

मज़ा कहने का जब है इक कहे और दूसरा समझे

कलामे-मीर समझे और ज़बाने-मीरज़ा समझे

मगर इनका कहा ये आप समझें या ख़ुदा समझे

मिर्जा ग़ालिब हिंदी में भी शेर कहते थे, यह उन्होंने ख़ुद स्वीकार किया है। जब 1857 का ग़दर हुआ तो उन्हें कई दिनों तक बिना नहाए अपने घर में क़ैद रहना पड़ा।

ग़दर शांत होने पर एक संपादक ने उन्हें ख़त लिखा कि आप मेरी पत्रिका के लिए कुछ ग़ज़लें भेजिए।

ग़ालिब साहब ने जवाब में लिखा कि मियां पिछले दिनों जो कुछ हुआ उसमें मैं भूल गया कि ग़ज़ल क्या होती है। कुछ समय पहले मैंने हिंदी में कुछ ग़ज़लें कही थीं। एक हिंदी ग़ज़ल का एक शेर याद रह गया। जब दिल बहुत मायूस होता है तो मैं उसे गुनगुना लेता हूं। वह शेर यूं है:

ज़िंदगी अपनी जब इस हाल में गुज़री ग़ालिब

हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे

किसी भी शायर की लोकप्रियता में उसके सेंस ऑफ ह्यूमर का बहुत योगदान होता है।

ग़ालिब साहब की बातचीत में, उनके ख़तों में और उनकी शायरी में ये हुनर बार-बार झांकता है।

मिसाल के तौर पर उनका एक शेर देखिए:

अगर लिखवाए कोई उसको ख़त तो हमसे लिखवाए

हुई सुब्ह और घर से कान पर रख कर कलम निकले

मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी में जो आग थी उसकी तपिश आज भी महसूस की जा सकती है।

देवमणि पांडेय

लेखक देश के विख्यात कवि एवं गीतकार हैं।

संपर्क: बी-103, दिव्य स्तुति, कन्यापाड़ा, गोकुलधाम, महाराजा टावर के पास, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव (पू), मुंबई 400063 / +9198210 82126

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