हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना – निदा फ़ाज़ली

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए

निदा साहब ने यह शेर पाकिस्तान के एक मुशायरे में सुनाया तो इस शेर पर एतराज़ हुआ। मंच से उतरे तो कुछ दाढ़ी-टोपी वालों ने उन्हें घेर लिया।

वह डिक्टेटरशिप का ज़माना था। धर्म के नाम पर जनता के भोलेपन का शोषण किया जा रहा था।

निदा साहब के शेर पर यह एतराज़ हुआ कि उन्होंने अल्लाह के घर मस्जिद और बच्चे की हँसी की तुलना करने का अधर्म किया है।

निदा साहब का जवाब था, “बच्चे को ख़ुदा बनाता है और मस्जिद को इंसान। मैंने ख़ुदा की बनाई चीज़ को महत्व देकर कोई अधर्म नहीं किया है।”

दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजै रिश्ता

दिल मिले या ना मिले हाथ मिलाते रहिए

जब मैं मुंबई आया था तो निदा फ़ाज़ली साहब का यह शेर बेहद लोकप्रिय था। मैं इसे अपने संचालन में अक्सर कोट करता था।

सन् 1987 में “समन्वय” संस्था ने गोरेगांव के केशव गोरे हाल में “इंद्रधनुषी गीत संध्या” का आयोजन किया। इसमें मुंबई महानगर के सात चुनिंदा गीतकारों को आमंत्रित किया गया।

संस्थाध्यक्ष अनिरुद्ध पांडेय ने संचालन की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी। हम वरिष्ठ गीतकार वीरेंद्र मिश्र के पास गए। उनसे निवेदन किया कि वे कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वीकार करें।

उन्होंने सुझाव दिया कि इसमें बतौर मुख्य अतिथि शायर निदा फ़ाज़ली को आमंत्रित किया जाए।

कार्यक्रम में निदा साहब अपने दोस्त कवि-कथाकार-चित्रकार कमल शुक्ल के साथ पधारे। आगे चल कर कमल शुक्ल हमारी दोस्ती के सबसे बड़े सेतु साबित हुए।

निदा साहब कवि सम्मेलन और मुशायरों में कभी अपने गीत नहीं सुनाते थे। सिर्फ़ ग़ज़लें पढ़ते थे। गीत के इस आयोजन में उन्होंने भी गीत सुनाया:

धूप भरी छत पर बरस गया पानी

आंगन में आके, अंगीठी बुझा के,

नागिन-सा लहरा के डस गया पानी

धूप भरी छत पर बरस गया पानी

उनके इस गीत पर ज़ोरदार तालियां बजीं और वंस मोर की आवाज़ें बुलंद हुईं। उन्होंने एक गीत और सुनाया:

सुन रे पीपल तेरे पत्ते शोर मचाते हैं

जब वह आते हैं

पहला पहला प्यार हमारा

हम डर जाते हैं

कुल मिला कर गीतकार वीरेंद्र मिश्र और निदा साहब की मौजूदगी ने आयोजन को यादगार बना दिया। निदा साहब से दोस्ती का रिश्ता कायम हो गया।

निदा साहब की आदत थी कि ग़ज़ल सुनाने से पहले वह कुछ ऐसे जुमले दोहराते थे, जिस पर तालियां बज जाती थीं। वही जुमले, वे अगले आयोजन में भी दोहराते थे।

सांध्य दैनिक संझा जनसत्ता में मैं साप्ताहिक स्तंभ लिखता था “साहित्यनामचा”। मैंने इसमें एक ऐसे कार्यक्रम की पूर्व सूचना दी, जिसमें निदा फ़ाज़ली साहब मुख्य अतिथि थे।

मैंने यह भी जोड़ दिया कि निदा साहब जब माइक पर आएंगे, तो वही जुमले सुनाएंगे जो हर जगह सुनाते हैं:

जब कहीं कोई फूल मुस्कुराता है

जब कहीं कोई बच्चा खिलखिलाता है

जब कहीं जगजीत सिंह ग़ज़ल गुनगुनाता है

तो मेरा भरोसा इंसानियत पर बढ़ जाता है

उस कार्यक्रम में निदा साहब जब माइक पर आए तो सचमुच उन्होंने वही किया जो मैंने लिखा था। उन्होंने जैसे ही पहला जुमला बोला, “जब कहीं कोई बच्चा मुस्कुराता है…”

इस पर सभागार में एक ज़बरदस्त ठहाका लगा। निदा साहब ने हैरत से मेरी तरफ़ देखा। संचालन मैं ही कर रहा था। मैंने कहा, “आप जारी रखिए, आपकी तक़रीर में सबको लुत्फ़ आ रहा है।”

इसी तरह निदा साहब ने ग़ज़ल के पूरे इतिहास को चंद मिसरों में बड़ी ख़ूबसूरती के साथ बाँध दिया था। वो ताउम्र उसे मुशायरों में दोहराते रहे:

“ग़ज़ल अरब के रेगिस्तान में इठलाई, ईरान के बाग़ों में खिलखिलाई। वहाँ से चल कर जब निज़ामुद्दीन औलिया और अमीर ख़ुसरो के मुल्क हिन्दुस्तान में आई, तो उसके माथे पर जरस्थुर का नूर था, उसके एक हाथ में गीता थी, दूसरे में क़ुरआन था, और उसका नाम सेकुलर हिंदुस्तान था।”

उनके इन जुमलों पर ख़ूब तालियां बजतीं थीं।

शायर निदा फ़ाज़ली ने ये स्वीकार किया कि वे कबीर, सूर और मीरा से बहुत प्रभावित हैं।

सूरदास का एक पद है: “ऊधो मन न भए दस-बीस”।

निदा साहब ने स्वीकार किया कि उन्होंने इसी से प्रभावित होकर यह शेर लिखा था:

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी

जिसको भी देखना हो कई बार देखना

निदा फ़ाज़ली अक्सर कहते थे कि ग़ज़ल लिखना मीनाकारी का काम है। ग़ज़ल बेहद नाज़ुक विधा है। वह हमेशा धीमे सुरों में बात करती है। ग़ज़ल के इसी लहजे में बड़ी से बड़ी बात भी कही जा सकती है।

निदा साहब का मानना था कि कविता जब मंच पर पढ़ी जाती है तो वह परफॉर्मिंग आर्ट हो जाती है। इसी कारण उसे पेश करने में स्वर के उतार-चढ़ाव और बॉडी लैंग्वेज की ज़बर्दस्त भूमिका होती है। कविता जब मंच पर पेश की जाए तो रंगमंच और सिनेमा की तरह श्रोताओं का उससे मनोरंजन होना चाहिए।

बतौर निदा फ़ाज़ली कविता मंच के ज़रिए या किसी पत्र-पत्रिका में प्रकाशित होकर समाज में जाती है, तो वह समाज की हो जाती है। तब समाज का हक़ होता है कि वह आपकी कविता को अच्छी कविता का तोहफ़ा दे या बुरी कविता का प्रमाण पत्र। आपको आलोचना बर्दाश्त करने का शऊर होना चाहिए।

मुंबई में सन् 1993 में जब दंगे हुए तो उन्हें भी यातना से गुज़रना पड़ा। इसका उनके दिल में मलाल नहीं था इसलिए उन्होंने वह ग़ज़ल लिखी, जिसे काव्यप्रेमियों ने बहुत सराहा:

उठ के कपड़े बदल, घर से बाहर निकल, जो हुआ सो हुआ,

रात के बाद दिन, आज के बाद कल, जो हुआ सो हुआ,

ख़ून से तरबतर, करके हर रहगुज़र, थक चुके जानवर,

लकड़ियों की तरह, फिर से चूल्हे में जल, जो हुआ सो हुआ

जो मरा क्यों मरा, जो लुटा क्यों लुटा, जो जला क्यों जला

मुद्दतों से हैं गुम, इन सवालों के हल, जो हुआ सो हुआ

मंदिरों में भजन, मस्जिदों में अजां, आदमी है कहां

आदमी के लिए, एक ताज़ा ग़ज़ल, जो हुआ सो हुआ,

जब तलक सांस है, भूख है प्यास है, यही इतिहास है,

रख के कांधे पे हल, खेत की ओर चल, जो हुआ सो हुआ,

निदा साहब के कई गीत फिल्मों में भी लोकप्रिय हुए। ये गीत आम कमर्शियल स्टाइल के न होते हुए भी सुनने वालों को पसंद आए। उनमें से कुछ ये हैं:

1. तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है।

2. कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता।

3. तुम्हारी पलकों की चिलमनों में ये क्या छुपा है सितारे जैसा।

4. तेरे लिए पलकों की झालर बुनूँ।

5. होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है।

मुंबई में निदा फ़ाज़ली साहब की याद में विश्व हिंदी अकादमी की ओर से 3 मार्च 2019 को एक यादगार आयोजन हुआ।

उनकी जीवन संगिनी मालती जोशी फ़ाज़ली और बेटी तहरीर की मौजूदगी में उनके साथियों ने जिस मुहब्बत के साथ उन्हें याद किया, वह अपने-आप में बेमिसाल है।

देवमणि पांडेय

लेखक देश के विख्यात कवि एवं गीतकार हैं।

संपर्क: बी-103, दिव्य स्तुति, कन्यापाड़ा, गोकुलधाम, महाराजा टावर के पास, फिल्मसिटी रोड, गोरेगांव (पू), मुंबई 400063 / +9198210 82126

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