पालघर मॉब लिंचिंग: 3 की निर्मम हत्या, 110 ग्रामीण गिरफ्तार, संदेह के घेरे में पुलिस

दीपक राव

20 अप्रैल 2020, पालघर।

जिले के कासा पुलिस स्टेशन क्षेत्र के गडचिंचले गांव में गुरुवार देर रात ग्रामीणों ने चोर समझ कर तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी। इस घटना ने पूरे देश में सनसनी फैला दी है। सूचना के बाद मौके पर पहुंची कासा पुलिस पर भी ग्रामीणों ने पथराव कर दिया। हमलावरों ने पुलिस वाहनों को भी निशाना बनाया।

110 गिरफ्तार, 9 नाबालिग भी

पुलिस ने 110 लोगों पर हत्या का मामला दर्ज कर हिरासत में लिया है। इनमें 9 नाबालिग हैं। उन्हें सुधार गृह में भेज दिया है।

इस घटनाक्रम के पांच मुख्य आरोपी हैं। सभी को 18 अप्रैल 2020 को अदालत में पुलिस ने पेश किया। उन्हें 30 अप्रैल 2020 तक पुलिस हिरासत में ऱखने के आदेश अदालत ने जारी किए हैं।

कुछ दिनों से ग्रामीणों में अफवाह फैलाई जा रही है कि रात के समय गांवों में चोर आते हैं। इसी फेक न्यूज के कारण तीन दिन पहले सारनी गांव के पास ग्रामीणों ने ठाणे के रहने वाले एक डॉक्टर पर हमला कर दिया था। मौके पर पहुंची कासा पुलिस ने किसी तरह डॉक्टर की जान बचा ली थी। इसके बाद गुस्साए ग्रामीणों ने पुलिसकर्मियों पर ही पत्थराव किया, जिसमें चार पुलिसवाले जख्मी हुए थे।

ग्रामीण भागों में फैल रही फेक न्यूज के कारण हो रहे हत्याकांडों में ये हत्याएं सबसे ताजी हैं।

संत जा रहे थे सूरत

पता चला है कि मुंबई के कांदिवली (पूर्व) निवासी सुशील गिरी महाराज (35), चिकने महाराज कल्पवृक्ष गिरी (70) व कार चालक नीलेश तेलगडे (30) गुरुवार की रात ईको कार से सूरत जा रहे थे। एक संत की मौत पर उनके अंतिम क्रियाकर्म के लिए वे रवाना हुए थे।

इस दौरान कासा पुलिस स्टेशन क्षेत्र के गडचिंचले गांव में कुछ लोगों ने उनकी गाड़ी रोक दी। तीनों गाड़ी में ही बैठे थे कि गांव वालों ने उनकी गाड़ी पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। कुछ लोगों ने उन्हें गाड़ी से बाहर निकाला और डंडे व पत्थरों से पीटने लगे। इतना ही नहीं उनकी गाड़ी को भी पलट दिया गया । गुस्साये ग्रामीणों ने पत्थर और डंडों से पीट पीटकर उनकी हत्या कर दी।

वन विभाग अधिकारी ने दी पुलिस को सूचना

सूत्रों के मुताबिक पुलिस को एक वन विभाग अधिकारी ने हमले की सूचना दी। सूचना पाकर मौके पर पहुंची कासा पुलिस पर भी ग्रामीणों ने पत्थरबाजी की। इससे पुलिस वाहन को भी काफी नुकसान हुआ।

इस दर्दनाक घटना से लोग स्तब्ध हैं। लोगों का कहना है कि पालघर पुलिस बार-बार आह्वान कर रही है कि अफवाहों पर ध्यान न दें। उसके बाद भी लोग ऐसी घटनाएं कर रहे हैं। उस वक्त आह्वान की नहीं, मदद की जरूरत थी, जिसमें पालघर पुलिस पूरी तरह नाकाम रही।

पूरे घटनाक्रम में पुलिस कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

वायरल वीडियो में साफ दिख रहा है कि पुलिस अधिकारी अपना पीछा छुड़ाते हुए साधुओं को अपने से दूर कर रहे हैं।

पुलिसकर्मी ने साधु को किया भीड़ हवाले

एक वायरल वीडियो में यह भी देखा जा सकता है कि पुलिस की गाड़ी में बैठे होने के बावजूद साधुओं को ग्रामीणों ने नहीं बख्शा। इससे साबित होता है कि ग्रामीणों को पुलिस का खौफ ही नहीं था। पुलिस की मौजूदगी में ग्रामीणों ने साधुओं और ड्राइवर को डंडों और पत्थरों से मारना जारी रखा।

दो पुलिस अधिकारी निलंबित

आनन-फानन पुलिस अधीक्षक गौरव सिंह ने दो पुलिस अधिकारी को निलंबित किया है। यह घटना 17 अप्रैल की रात 12 से साढ़े 12 बजे के बीच हुई। आला अफशरान ने अपने अधिकारियों और कर्मचारियों को बचाने के लिए पूरा एक दिन लिया। 19 अप्रैल को दो अधिकारी निलंबित करने का दिखावा किया। वह भी तब, जब देश भर से संतप्त साधु समाज ने महाराष्ट्र कूच की धमकी दे डाली।

मॉब लिंचिंग के बाद दोनों साधुओं के शव इस बेकदरी से पुलिस ने मालवाहक में रखे

सूत्रों के मुताबिक केंद्र ने इस घटना पर गंभीरता दिखाई। उसके बाद ही यह कदम आला अफसरान ने उठाया।

घटना को जातीय रंग देने की कोशिश आरंभ

लोगों का यह भी कहना है कि इस घटना को जातिवाद और धर्म से जोड़ने की कोशिश भी जोर-सोर से हुई। यह संत-पंडित के नाम पर मामले को तुरंत मुस्लिमों द्वारा हमले के जोड़ कर कुछ लोगों ने प्रचार करना शुरू कर दिया। कई लोगों ने इस मौके की तस्वीरों के साथ लिखा कि यह लिंचिंग मुस्लिम समुदाय ने की है। यह झूठा और दिखावे का आक्रोश देश व समाज के लिए खतरा बन चला है।

मामले की नजाकत समझते हुए मुख्यमंत्री, महाराष्ट्र उद्धव ठाकरे मीडिया के सामने आए। उन्होंने लोगों से अपील की कि इस घटना को धार्मिक तरीके से न देखें।

यह घटना साधुओं से जुड़ी थी इसलिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री, उत्तरप्रदेश योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से बात की। उन्होंने आरोपियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।

क्या साजिश थी कोई?

सूत्रों का कहना है कि पूरा घटनाक्रम साजिश की तरफ इशारा दे रहा है। पुलिस का मौके पर पहुंचना और साधुओं को न बचाना, साजिशन भी हो सकता है। क्या ये पुलिस अधिकारी किसी के दबाव में काम कर रहे थे? क्यों पुलिस साधुओं और ड्राइवर को बचाने के बदले धक्का देकर अपने से दूर कर रहे थे? शायद यही कारण रहा होगा, जिसके कारण साधुओं और ड्राइवर को जान से हाथ धोना पड़ा। पुलिस कर्तव्य निभाती तो शायद तीनों लिंचिंग से बच जाते।

एक और अहम बात यह है कि जब इस घटना पर कौसा पुलिस अधिकारियों से बात करने की कोशिश की तो कोई भी जवाब देने को तैयार नहीं हुआ।

घटना के बाद पालघर के जिलाधिकारी कैलाश शिंदे ने ट्वीटर पर लोगों से अपील की। उन्होंने लोगों से शांति बनाए रखने को कहा। पुलिस की तरफ से ठोस कार्रवाई होती नजर नहीं आई।

ऐसा महसूस हो रहा है कि पालघर पुलिस जिम्मेदार पुलिस कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई करने से बच रही है। इस पर सवाल उठना लाजिमी है।

हालात बिगड़ते देख महाराष्ट के गृह राज्य मंत्री अनिल देशमुख ने मीडिया को बताया कि यह सब तब होता है, जब घटना को हुए 48 घंटे से ऊपर हो जाता है। इसका जिम्मेदार कौन है? क्या पुलिस या वे आदिवासी ग्रामीण या फिर कोई और?

सवाल कई हैं लेकिन जवाब मिलने अभी बाकी हैं?

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