अंटालिया विस्फोटक कांड: कितने-कितने झूठ

विवेक अग्रवाल

मुंबई, 13 अगस्त 2021।

देश के भामाशाह मकेश अंबानी के कथित घर अंटालिया के बाहर तथाकथित ‘बम भरी’ कार रखने रखने के मामले में कई पेंच रहे हैं, जो एक-एक करके सामने आते जा रहे हैं। यह भी साफ होने लगा है कि अंटालिया कभी किसी का निशाना नहीं रही। तो यह झूठा प्रचार किसने और क्यों किया?

इसके पीछे राजनीतिक मंशा है, यह भी अब खुल कर सामने आने लगा है। कुछ ऐसी बातें हैं, जिनके जवाब किसी के पास नहीं है। सबसे पहली बात तो ये कि बिना डिटोनेटर की जिलेटिन रॉड्स या छड़ें एक गाड़ी में रख कर कोई क्या साबित करना चाहता होगा? बिना डिटोनेटर विस्फोटक तो उड़ने से रहा। ऐसे में एक कार के अंदर रखा ये निष्क्रिय विस्फोटक मिट्टी के लोंदे से अधिक नहीं।

एकबारगी मान भी लें कि स्कोर्पियो कार में रखे विस्फोटक बतौर बम यहां फटते भी, तो उसका असर मुकेश अंबानी के निवास तक होता ही नहीं।

पहली बात तो यह कि खुद अकेले जिलेटिन की ताकत एक विस्फोटक के रूप में बहुत कम होती है। जब तक उसे अमोनियम नाइट्रेट और डीज़ल के साथ मिला कर, एक मोटे कटेंनर में बंद करके डिटोनेट नहीं करेंगे, तब तक उसके विस्फोट की तीव्रता नुकसानदेह नहीं हो सकती।

दूसरी बात यह कि कथित बम लदी कार अंटालिया से लगभग 700 मीटर दूर खड़ी थी। यदि वहां 22 जिलेटिन छड़ों में विस्फोट होता भी, अंटालिया के कांच भी शायद नहीं फूटते। इतनी दूरी से विस्फोट का असर होना संभव नहीं है।

इस ‘विस्फोटक कार कांड’ में कई नजरिए और तर्क अब तक सामने आए हैं, जिन्हें एक-एक करके देखना और समझना पूरे डिजाईन या ‘क्रोनोलॉजी’ को समझने के लिए जरूरी है।

तर्क 1:

जिलेटिन खुद अंबानी ने प्लांट करवाए क्योंकि उन्हें केंद्र सरकार से जेड प्लस सुरक्षा लेनी थी।

विश्लेषण > यह तर्क इसलिए गले नहीं उतरता है क्योंकि अंबानी को सुरक्षा हासिल करने के लिए ऐसा घटिया प्रपंच करने की जरूरत ही नहीं है। सत्ता के गलियारों से सिंहासन तक, उनके सामने मुजरा करने वालों की संख्या असीमित है। वे इच्छा भर प्रकट कर दें, तो पुलिस या सीआरपीएफ अथवा आइटीबीपी छोड़ें, सेना की पूरी बटालियन उनकी सुरक्षा में तैनात हो सकती है। वे निजी तौर पर इतने सक्षम हैं कि महाराष्ट्र सरकार में बैठे तमाम ताकतवर नेताओं से सीधे चर्चा करके न केवल खुद बल्कि परिवार तथा तमाम संपत्तियों की सुरक्षा के लिए सशस्त्र बलों की मांग कर सकते हैं। सरकार किसी की हो, उन्हें इंकार करने वाला कोई नहीं होगा।

तर्क 2:

जिलेटिन आतंकियों ने प्लांट किए।

विश्लेषण > आतंकियों द्वारा अंबानी परिवार को धमकाने के इरादे से विस्फोटक लदी कार उनके निवास स्थान से 700 मीटर दूर खड़ी करना, किसी हाल में गले के नीचे उतरने वाली बात नहीं है। यह आतंकियों की फितरत और तौर-तरीकों के बिल्कुल अलग है। अपने मकसद का प्रचार करना हो या अंबानी परिवार को धमका कर दुनिया भर में संदेश पहुंचाना हो, तो आतंकी ऐसी ओछी हरकत नहीं करेंगे। जो आतंकी गिरोह 26-11 का भयावह हमला अंजाम दे सकते हैं, वे आखिरकार ऐसी मूर्खतापूर्ण हरकत क्यों करेंगे? आतंकी गिरोह हमेशा अपनी बात दुनिया तक पहुंचाने के लिए निरपराधियों की हत्याएं या बम धमाकों में विश्वास करते हैं। यदि कोई आतंकी गिरोह ऐसा करना चाहे, तो आरडीएक्स या जिलेटिन में अमोनियम नाइट्रेट मिला कर बने बम से लदी कार अंबानी परिवार की इमारत की बाहरी दीवार से टकरा कर जोरदार बम धमाका करता। इससे जो हंगामा खड़ा होता, वह आतंकियों के तौर-तरीकों के मुताबिक होता।

लंबे समय तक आतंकियों का कारनामा करार देकर यही हवा बनाई जाती रही कि मुस्लिम आतंकी ऐसा कर रहे हैं। समाज में हिंदू-मुस्लिम समुदाय के बीच दरार और चौड़ी करने के उद्देश से कुछ लोगों ने विस्फोटक लदी कार का सिलसिला हाईजैक कर लिया। उसका भरपूर इस्तेमाल किया।

तिहाड़ जेल में बैठे आतंकियों द्वारा अंबानी परिवार को वॉट्सएप पर संदेश भेजने की बात भी किसी के गले नहीं उतरती है। देश की सबसे कुख्यात और सुरक्षित तिहाड़ जेल में कठोर निगरानी में रहने वाले आतंकियों के पास सेल फोन पहुंच जाते हैं। वे अंबानी परिवार के निजी नंबर निकाल लेते हैं। उन्हें आतंकित करने वाला कथित संदेश भी भेज देते हैं। यह सब तिहाड़ जेल के अंदर चलता रहा और उसकी सुरक्षा में लगा अमला कानों में तेल डाले सोता रहा। क्यों?

जब एनआईए ने कह दिया कि जेल से ऐसा कोई संदेश नहीं गया था, तो यह सवाल भी उठता है कि यह भ्रामक प्रचार करने वाले बावर्दी अफसरान की शिनाख्त करके उन्हें सजा क्यों नहीं दी? जिसके सेल फोन नंबर से यह झूठा संदेश भेजा था, उसे गिरफ्तार करके क्यों नहीं कानून के कटघरे में खड़ा किया?

तर्क 3:

जिलेटिन पुलिस वालों ने प्लांट किए क्योंकि उन्हें अंबानी से संरक्षण राशि की उगाही करनी थी।

विश्लेषण > यह तर्क सिरे से नकारा जा सकता है क्योंकि अंबानी परिवार को इस तरह धमका कर राज्य की पुलिस कभी भी संरक्षण राशि हासिल नहीं कर सकती। सभी जानते हैं जिस परिवार को पहले से केंद्रीय बलों से उच्चस्तरीय सुरक्षा हासिल है, उसे पुलिस के कुछ भ्रष्ट अधिकारी डरा कर संरक्षण राशि हासिल नहीं कर सकते हैं। यह बहुत दूर की कौड़ी है। ऐसा कोई भी दुस्साहस न केवल उन भ्रष्ट अधिकारियों के गले की फांस बन सकता है बल्कि राज्य सरकार के लिए गंभीर राजनीतिक और संवैधानिक संकट खड़ा कर सकता है।

जो भी यह तर्क पेश कर रहे हैं, वे यह भूल जाते हैं कि राजनीतिक तौर पर भी अंबानी परिवार इतना शक्तिशाली है कि उन्हें ऐसी छोटी-मोटी घटनाओं से धमका कर वसूली नहीं की जा सकती।

तर्क 4:

जिलेटिन विरोधियों ने प्लांट किए क्योंकि शिवसेना-इंका-रांकापा सरकार गिरानी थी।

विश्लेषण > विरोधियों के लिए भी ऐसी हरकत लगभग असंभव है। वर्तमान राजनीति में हालांकि ऐसे कदम उठाना दूर की कौड़ी नहीं मानी जाएगी। बावजूद इसके किसी विरोधी राजनीतिक दल द्वारा ऐसी हरकत करना, न केवल उनके लिए पूरा कैरियर तबाह करने की स्थिति बनाएगा बल्कि उस राजनीतिक दल पर भी पूर्ण प्रतिबंध लगाने जैसे हालात पैदा कर सकता है। जो राजनीतिक दल ऐसी मूर्खतापूर्ण हरकत करेगा, उसके कारण सदा के लिए बदनाम हो जाता। इन हालात में कोई चतुर राजनीतिक ऐसी मूर्खतापूर्ण हरकत नहीं करेगा, यही मान सकते हैं।

तर्क 5:

जिलेटिन एक गलती के चलते उस जगह जा पंहुचा, जहां उसे नहीं होना था।

विश्लेषण > यही सच लगता है। इस तर्क के समर्थन में एक सूत्र का दावा है कि किसी खदान मालिक से 22 लाख रुपयों की वसूली सचिन वझे एंड कंपनी द्वारा की गई। उसकी खदान में रखी अतिरिक्त मात्रा में जिलेटिन रॉड्स का जखीरा सचिन वझे की टीम ने बरामद किया। जब तोड़पानी या टीआर हो गया, रकम का आदान-प्रदान सफलतापूर्व संपन्न हो गया, तो भी वजे कंपनी ने खदान मालिक को 22 जिलेटिन छड़ें वापस नहीं कीं। यह सोच कर ये छड़ें अपने पास रख लीं कि कभी किसी आरोपी से बरामदगी दिखा कर उसे लंबा नापा जा सकता है। ये 22 जिलेटिन छड़ें उस स्कोर्पियो कार में रख कर वझे कंपनी भूल गई, जो मनसुख हीरेन की मिल्कियत थी।

इस सूत्र ने दावा किया कि एक दिन कार चलाते हुए बिगड़ी, तो मनसुख ने रास्ते किनारे खड़ा कर सहायता हासिल करने के लिए कई लोगों को फोन लगाया। जब ऐसे हालात ना बने कि कार खींच कर ले जा पाते, तो मनसुख टैक्सी में घर लौट गए। रास्ते में लावारिस खड़ी स्कॉर्पियो को देख कर किसी चोर या मनचले का मन डगमगाया। उसने हाथ की सफाई दिखाई। कार का दरवाजा खोला और गाड़ी चालू करके भगा ले गया। अगले दिन मनसुख गाड़ी उठाने मौके पर पहुंचे, तो कार वहां न मिली।

यह भी सूत्र का कहना है कि मनसुख हीरेन ने आसपास कार तलाशी लेकिन नाकाम रहे। तभी उन्हें याद आया कि कार में जिलेटिन पड़ी है। उन्होंने फौरन सचिन वझे को सूचित किया। सचिन सझे ने जब यह सुना तो उसके कान खड़े हो गए। सब काम छोड़ कर सचिन वझे तुरंत उस जगह पहुंचे, जहां से कार चोरी हुई थी।

महाराष्ट्र पुलिस के दो ही ऐसे मकहमे हैं, जिन्हें किसी भी जगह का सीसीटीवी फुटेज हासिल करने की इजाजत है। एक मुंबई पुलिस की अपराध शाखा की सेंट्रल इंटेलिजेंस यूनिट (सीआईयू) है। दूसरी महाराष्ट्र एंटी टेरर स्क्वाड (एटीएस) है।

यह भी कहा जा रहा है कि सचिन वजे ने आसपास के तमाम रास्तों में पड़ने वाले सीसीटीवी कैमरों के फुटेज देखे। एक फुटेज में दक्षिण मुंबई की तरफ जाती कार दिखी।

सूत्रों का कहना है कि दक्षिण मुंबई की तरफ के तमाम फुटेज देखते हुए सचिन वझे आगे बढ़ा तो गिरगांव चौपाटी पर स्कॉर्पियो लावारिस खड़ी मिल गई। अब सचिन वझे ने स्कॉर्पियो का दरवाजा खोल कर चालू किया। स्कॉर्पियो चालू हो गई। सचिन वझे उसे लेकर पश्चिमी उपनगरों की तरफ रवाना हुआ। बीच रास्ते पैडर रोड पर एक जगह स्कॉर्पियो ने जवाब दे दिया।

इस सूत्र का दावा है कि यह घटना देर रात लगभग 12 बजे हुई। सचिन वझे ने बहुत कोशिश की लेकिन स्कॉर्पियो चालू न हुई। इसके बाद सचिन वझे ने रात को स्कॉर्पियो खींच कर किसी सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचाने की व्यवस्था करनी शुरू की। यह भी संभव न हुआ। अब तक रात के तीन बज चुके थे।

सचिन वजे के एक सहयोगी सब इंस्पेक्टर ने कहा कि बहुत देर हो चुकी है, अब कुछ होना संभव नहीं इसलिए सुबह नौ बजे ही गाड़ी खिंचवा कर उनके बताए ठिकाने पर पहुंचा देगा। वे चले जाएं। सचिन वझे यह सुन कर घर लौट गया।

वजे कंपनी को यह नहीं पता था कि उनकी तमाम कसरत, पास बनी इमारत के एक फ्लैट में बैठे बुजुर्ग पारसी दंपत्ति देख रहे हैं। उन्होंने कार लावारिस खड़ी देखी तो मुंबई पुलिस कंट्रोल रूम और स्थानीय थाने में सूचना दी। उनके बार-बार फोन करने के बावजूद जब पुलिस अधिकारी नहीं आए, तो भी उन्होंने प्रयास जारी रखे।

परेशान होकर आखिरकार सुबह लगभग छह से सात बजे के बीच एक सब इंस्पेक्टर के साथ तीन-चार पुलिसकर्मी लावारिस स्कॉर्पियो के पास पहुंचे। उन्होंने लावारिस कार खींच कर ले जाने की व्यवस्था की।

तभी एक हवलदार कार के पिछले हिस्से में की तरफ पहुंचा। वह देखता है कि स्कोर्पियो के अगले पहिए उठने के कारण जिलेटिन छड़ें खुल कर दिखने लगी हैं। उसने फौरन अपने सब इंस्पेक्टर से कहा कि पीछे पड़ा सामान देखें।

सब इंस्पेक्टर ने जब देखा कि कार में जिलेटिन छड़े रखी हैं, तो फौरन महाराष्ट्र एटीएस को सूचना दी। महाराष्ट्र एटीएस के अधिकारियों का एक दस्ता गाड़ी के पास पहुंचा। उसमें रखा जिलेटिन देख कर फौरन अपने फायदे के लिए इस मामले को इस्तेमाल करने का आईडिया उनके दिमाग में आया।

एटीएस के इंस्पेक्टर रैंक का एक अधिकारी सचिन वझे से पुरानी अदावत रखता था। उसने फौरन मौके का फायदा उठाया। उसने भी तमाम सीसीटीवी फुटेज हासिल किए। एक महिला आईपीएस अधिकारी तक पहुंचाए, जो विस्फोटक कार कांड में फंस चुकि हैं।

उस महिला आईपीएस अधिकारी ने ये फुटेज वर्तमान सरकार के राजनीतिक विरोधियों तक पहुंचा दिए। राजनीतिक तौर पर इसे लेकर तुरंत बखेड़ा खड़ा हो गया। इसके साथ ही ‘खाकी गैंगवार’ चरम पर जा पहुंचा। साथ ही ‘खादी गैंगवार’ ने भी खून बहाना शुरू कर दिया। उसके बाद जो भी कुछ हुआ सबके सामने है।

गलती से गिरा लड्डू

पूरे मामले में एक बार साफ है कि यह मसला किसी भी तरह न तो अंबानी परिवार को निशाना बनाने का था, न ही इसमें किसी की शरारत भरी हरकत दिखती है। यह तो गलती से झोली में आ गिरे लड्डू जैसा है, जिसका दुरुपयोग राजनीतिक तौर पर फौरन शुरू हो गया।

हंगामा है क्यों बरपा?

कुछ सवाल जो इस हंगामे में गुम हो गए, उन पर नजर डालना जरूरी हो जाता है।

सबसे बड़ा और अहम सवाल यह है कि ये विस्फोटक आया कहां से? किसने ये जिलेटिन कार में रखे? कार में सिर्फ विस्फोटक ही क्यों रखे? उनके साथ डिटोनेटर क्यों नहीं लगाए?

जिलेटिन सप्लाई करने वाले को अभी तक क्यों नहीं तलाशा और दबोचा? क्यों इस दिशा में जांच नही हो रही है कि देश भऱ में जिलेटिन और अमोनियम नाइट्रेट की अवैध खरीद-फरोख्त व तस्करी कैसे धड़ल्ले से चल रही है? इस विस्फोटक माफिया की नाक में नकेल क्यों नहीं डाली जा रही है?

आखिरकार क्यों देश के कुछ हिस्सों में पुलिस अधिकारी इतने ताकतवर हो जाते हैं कि कानून से खुलेआम खिलवाड़ करने लगते हैं और उन्हों कोई रोक क्यों नहीं पाता है?

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