टीवी की बीमारी लाइलाज होती गई, तो आपका नंबर भी आएगा

मेहुल चौकसी ने ठगी की, क्या चौकसी सरनेम वाले तमाम लोगों से उसका हिसाब लिया गया?

नीरव मोदी, ललित मोदी या अलाना फलाना मोदी के लिए देश के किसी और मोदी को शर्मिंदा किया गया?

क्या हर्षद मेहता की वजह से कोई और मेहता शर्मिंदगी महसूस करता है?

क्या परेश बरूआ की वजह से किसी बरूआ की गर्दन आज तक दबोची गई?

क्या ब्रह्मेश्वर सिंह, श्री प्रकाश शुक्ला, कोबाड गांधी, सतवंत सिंह, बेअंत सिंह के कर्म के लिए उनकी बिरादरी, गांव या परिवार के लोगों को किसी से माफी मांगनी पड़ी?

नहीं न?

फिर भारत के मुसलमान हर गधे, घोड़े, कुत्ते पिल्ले, ऐरे गै़रे़, नत्थू खै़रे का हिसाब देने, सफाई देने या शर्मिंदा होने क्यों निकल पड़ते हैं?

गीता कहती है, “गहना कर्मणो गति:” यानि कर्मो की गति बहुत तेज़ होती है, और जिसने बुरा कर्म किया है, यहीं उसके सामने आ जाएगा।

क़ुरान में सुराह मुदस्सिर देखिए, लिखा है, “कुल्लो नफसिन बिमा कसबत राहिनातुन…” यानि हर आत्मा अपने कर्म की खुद जिम्मेदार है।

दुनिया में कहीं नहीं लिखा कि दूसरे के कर्म के लिए आप ज़िम्मेदार हैं।

यहां तक कि बेटा हत्या कर दे तो बाप को फांसी नहीं होती। किस मुंह से फिर दूसरों के लिए शर्मिंदा हों और किस-किस के कर्मो का बोझ अपने सिर पर उठाएं?

किसी दूसरे के अच्छे कर्म का क्रेडिट देने कोई आता है?

इसलिए खुद के सुधरने पर ध्यान दीजिए।

मैं अपने कर्मों के लिए नर्क में जाऊं तो क्या आप अपने हिस्से के स्वर्ग से उसे बदलने आयेंगे?

नहीं न?

तो भाई ज़िम्मेदार नागरिक बनें, दुनिया जहान के ज़िम्मेदार नहीं।

एक-एक व्यक्ति के लिए अगर हिसाब-किताब देने लगें, तो शर्म से पाताल में चले जाएंगे और धरती तुम्हारे बोझ से मंगल के पार जा बसेगी।

अपनी ग़ैरत को सही मौक़े के लिए बचाकर रखिए।

यही माहौल रहा और टीवी की बीमारी ऐसे ही लाइलाज होती गई, तो एक दिन आपका अपना नंबर भी आयेगा।

उस रोज़ दिल भर कर शरमा लेना।

ज़ैग़म मुर्तजा

पत्रकार व लेखक

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लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। इससे इंडिया क्राईम के संपादक या प्रबंधन का सहमत होना आवश्यक नहीं है – संपादक

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