BOOK REVIEW: व्हाईट टाईगर जैसी खोजपरक किताबें समाज के हक़ में बेहद ज़रूरी हैं – पवन कुमार
बोलता हूँ, बोलूंगा
बोले बिन न मरूंगा;
अपने राह-ए-हक़ से,
मैं न कभी टरूंगा।
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झूठ और सच देखो
गुत्थमगुत्था दांव में;
झूठ का हाफ़िज़ देखो
बैठा कैसे ताव में!
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सत्ता की गलियों में
साजिशें हैं पलतीं;
हक़ और हुक़ूक़ पे
आरियाँ हैं चलतीं;
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इमां इक बेवा सी
हरदम हाथ मलती;
जाने किस रस्ते से
रब होता कल्टी;
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दम-ए-रफ़्तन भी
दम भर लड़ूंगा;
ताक़त का तकब्बुर
लड़ के मैं तोड़ूंगा;
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बोलता हूँ, बोलूंगा
बोले बिन न मरूंगा;
अपने राह-ए-हक़ से,
मैं न कभी टरूंगा।
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पापियों के पचपन
पक्के वाले चेले हैं;
अच्छाई की राहों के
राही अकेले हैं;
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रईसों ने महल में
सौ सौ सुख पाले हैं;
ग़रीबों को इक इक
रोटी के भी लाले हैं;
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पंखों को कतरने वाले
व्याध वो सयाने हैं;
उनके सारे वायदे
झूठ की खदानें हैं;
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पिद्दी हूँ पर ज़िद्दी हूँ
अचल हो मैं अड़ूंगा;
तीर क्या तुफ़ंग क्या
किसी से न डरूँगा।
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बोलता हूँ, बोलूंगा
बोले बिन न मरूंगा;
अपने राह-ए-हक़ से,
मैं न कभी टरूंगा।
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मैं न कभी डरूंगा।
मैं न कभी डरूंगा।
– पवन कुमार
(दम-ए-रफ़्तन: at the time of dying)
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कुछ ऐसे ही हैं लेखक द्वय विवेक अग्रवाल और इंद्रजीत गुप्ता।
रघुवीर सहाय ने ऐसे ही निर्भीक लेखकों की किरदार-निगारी करते हुए कहा था –
‘कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा।
न टूटे, न टूटे तिलिस्म सत्ता का,
मेरे अंदर एक कायर टूटेगा। ’
मैं चूंकि लेखक विवेक अग्रवाल और इंद्रजीत को निजी तौर पर जानता हूँ। मैं उनकी रचना को ही नहीं, उनकी रचना प्रक्रिया को भी जानता हूँ और इसलिए आज मैं केवल उनकी रचना नहीं, उनकी रचना प्रक्रिया की भी समीक्षा करना चाहूंगा।
मैं जानता हूँ कि जैसे ही कोई जरायम पेशा अपने मन की बाखली से अपनी बदनीयती का पगहा खोलता है, इनके कान चौकन्ने हो जाते हैं।
मैं जानता हूँ कि जब विवेक और इंद्रजीत निकलते हैं, अंधी मख़फ़ी उन गलियों में, जिनकी हर दीवार पर सच्चाई को हदफ़ बनाई शोला-फ़िशाँ बंदूकें छिपी होती हैं, उनकी किताब का एक हर्फ़ बनता है।
और जब ये सत्यभक्षी दानव के पैने जबड़े से सच को बचा कर ले आते हैं तो बनती है ऐसी किताबों की कहानियां।
और जब ये लेखक या ऐसे लेखक ज़िंदा बचे रह जाते हैं तो बनता है ऐसी किताबों का उन्वान – मुंभाई, हाजी मस्तान, व्हाइट टाईगर।
जान का ऐसा ख़तरा रहता है कि ये अपनी रहवास की जगह अपने दोस्तों को भी नहीं बताते… छुपते छुपाते गाड़ी, रास्ता बदलबदल कर अपने ध्येयित गंतव्य को जाते हैं।
मैं जानता हूँ कि जब तक ये घर नहीं लौटते, इनके घर की दहलीज़ पर दिल में इज़्तिराब और मन में दुआ या ख़ैर लिए इनके बीबी बच्चे इनकी राह तकते रहते हैं।
सच को टक्कर झूठ को शक्कर देने वाली इस उलटबांसी दुनिया में ऐसी किताब का मुकम्मल होना, झब्बे भर सांसों का मुकम्मल होना है।
कहने को यह लुगदी से बनी दो सौ छियत्तर पृष्ठों की आम सी किताब है पर आपको इस किताब की एक लाइन को मिटाने के लिए कई ऐसे दशक मिटाने पड़ जाएंगे जिसमें क़ाज़ी साहब जैसा एक ईमानदार अधिकारी ज़र्रा ज़र्रा बारूद भर अपने मन को आतिशरेज़ा बना रहा है।
जिसमें विवेक अग्रवाल और इंद्रजीत जैसे साहसी लेखक अपनी कलम में क़तरा कतरा रोशनाई भर रहे हैं उस तमस तंत्र से लोहा लेने के लिए जो आलमताब उम्मीदों को गोल गप्पे की तरह निगला जा रहा है।
अंग्रेज़ी में कथा के charismatic नायकों के लिए एक शाब्दिक बंदोबस्ती है – “Blaze Stallion”…पर चूंकि इस किताब के नायक एक शेरदिल इंसान हैं मैं उस कहावत को इस किताब के संदर्भ में rephrase करते हुए कहना चाहूंगा कि इस किताब के “Tiger of the Book” हैं क़ाज़ी क़मर साहब, जिनकी बहादुरी का पृष्ठांकन किताब के पहले ही पृष्ठ पर हो जाता है, लेखक की कलम से नहीं, एक अपराधी के मुंह से।
जब एक दुर्दांत criminal, crime buster की, अपने ही tormenter की शेरदिली की क़समें खाने लगे, तो समझ जाइए कि क़मर साहब की बहादुरी किस दर्जे की रही होगी।
अपने चरित्र की तरह कस्टम्स की सफ़ेद शफ़्फ़ाफ़ यूनिफॉर्म में मलबूस शेर क़ाज़ी क़मर – उनकी सरगुज़श्त को जगह देती किताब के लिए लेखक द्वय ने बहुत ही मुफ़ीद टाइटल चुना है – White Tiger.
जनाब क़ाज़ी क़मर तब कस्टम अधिकारी थे, जब मस्तान, करीम लाला, यूसुफ पटेल, दाऊद, टाईगर मेमन जैसे डॉन की अथाह कमाई smuggling पर टिकी होती थी और smuggling टिकी होती थी कस्टम के आला अधिकारियों और देश के ताकतवर सियासतदानों की कृपा पर।
तस्दीक़-पज़ीरी के तौर पर विवेक जी और इंद्रजीत जी की किताब व्हाइट टाईगर का यह गद्यांश –
“क़ाज़ी क़मर ने 60 और 70 के दशक में, जब सोना, चांदी, घड़ियों, कपड़ों की तस्करी चरम पर थी, तस्करों की नाक में नकेल डालने के लिए न केवल ख़ुद बल्कि अपने दो अबोध बेटों का जीवन भी ख़तरे में डाला है। महाराष्ट्र के कोंकण इलाके में बसे सुदूर गाँव आचरा से मुंबई आकर गृहस्थी बसाई, परिवार बनाया, दोस्ती और दुश्मनी कमाई। दर्जनों ऐसे नामचीन तस्करों को जेल की सलाखों के पीछे पहुँचाया, जिनके नाम से उस दौर में पुलिस वाले भी कांपते थे। यह क़ाज़ी और टीम का ही कमाल था कि टाईगर मेमन जैसा ख़तरनाक गिरोहबाज़ और तस्कर एक बार मुंबई से भागा तो बरास्ता दुबई, पाकिस्तान के शहर कराची पहुंचा, कभी लौटा नहीं। ”
“शहर की सड़कों से – समंदर की लहरों तक, सफेद वर्दी में बाघ की मानिंद क़ाज़ी क़मर तस्करों के काल बने घूमते रहे। ”
क़ाज़ी क़मर सिर्फ़ तस्करों की राह का रोड़ा, या यूं कहिए पहाड़ नहीं थे, वे तस्करों के सरपरस्तों की भी आँखों की किरकिरी थे। ऐसी हिमाक़त करने के बावजूद, वे अगर बसंत के बयानवे फेरे देख पा रहे हैं, तो समझ जाइए कि क़ाज़ी क़मर साहब किस मिट्टी के बने हैं। मुझे तो लगता है मिट्टी के बने भी नहीं हैं, लोहे के बने हैं शायद, कोई उनसे हाथ मिलाएगा तो टन की आवाज़ आएगी…नहीं आएगी…हाँ इसके लिए हाथ मिलाने वाले का भी लोहा का बना होना ज़रूरी है।

लेखक द्वय की इस किताब में क़ाज़ी क़मर उस रोशनदान सरीखे हैं, जिनसे होकर कई युगों तक झांका जा सकता है – इस रोशनदान से देखा जा सकता है अंग्रेज़ी हुकूमत के उस निरंकुश युग को जब अंग्रेज़ शासित हिंदुस्तान में निसंतान राजा महाराजाओं को वारिस गोद लेने की इजाज़त नहीं थी। जब इस धूर्ततायुक्त नियम के बहाने ब्रिटिश गवर्नमेंट उनकी सारी संपत्तियां हड़प लिया करतीं थीं। जब इस तुगलकी नियम के ख़िलाफ़ लंदन जाकर क़ाज़ी साहब के अज्दाद ने जीत हासिल की थी।
इस रोशनदान से देखा जा सकता है अंडरवर्ल्ड के उस तमस युग को जब भारत में तालिब ने तस्करी की नींव रखी थी, जब मस्तान ने बिखरे छितरे इस क्राइम को संगठित कर एक powerful और organised सिंडिकेट की शक्ल दे दी थी।
यही किताब बताती है कि कैसे क़ाज़ी क़मर अपने जुनून के ख़राद में खेल जगत के हीरे चमकाया करते थे।
कैसे वे कोयले के ढेर से तस्करों के छिपाए चांदी और शरीफ़ों के ढेर से smuggled सोना बरामद किया करते थे। उनकी गिरफ़्त से न अपराध बच पाता था न अपराधी।
उस दौर में अपराधी को पकड़ना अगर मुश्किल था तो उसे सज़ा दिलवाना उससे भी ज़्यादा मुश्किल था, ख़ास कर तब जब राम जेठमलानी जैसे कद्दावर वकीलों ने अपराधियों की बेगुनाही साबित करने का पेशेवर ठेका ले रक्खा हो, पर क़ाज़ी डटे रहते थे और जीतते भी रहते थे। क़ानून-परस्त ऐसे कि उन्होंने शो मैन राजकपूर की पेशानी का पसीना भी एड़ी तक चुव्वा दिया था
इसी तसलसुल में white tiger का यह गद्यांश-
“फाइनेंस मिनिस्टर मोरारजी देसाई के बेटे कांती देसाई का एयरपोर्ट पर केस हुआ था। एयरपोर्ट पर क़ाज़ी साहब के सीनियर कमिश्नर वाधवान को कहीं से टिप मिली कि कोलाबा के मुजरा डांस वाले होटल लावेला का मालिक लंदन से एयर इंडिया की उड़ान से महंगे कैमरे मंगा रहा है, जो राज कपूर के हैं। ये कैमरे फिल्म शूटिंग में इस्तेमाल होते थे। एक कस्टम्स अफसर सरदार जीत सिंह ये कैमरे बिना ड्यूटी चुकाए बाहर निकालने में उसकी मदद करेगा। कांती देसाई कैमरे लाने में मददगार है। बाद में होटल लावेला के मालिक को कैमरे सौंपे जाएंगे। वो कैमरे आगे राज कपूर तक पहुंचाएगा। ”
आगे स्पॉइलर नहीं दूंगा। बस teaser… और जानना है तो किताब लेनी होगी। किताब जो ऐसे कई हैरतअंगेज़ वाक़ि’आत से भरी पड़ी है। जिसे पढ़कर हैरानी भी होती है और शादमानी भी… पर यह हैरानी और शादमानी बाद में होती है, पहले होता है यह संशयात्मक सवाल कि एक बेरानवे साल के बुजुर्ग के मन को मथ कर, उससे अतीत की यात्रा करवा कर, उससे उसके भोगे जा चुके सुख दुख पर हाथ फेरवा कर या किसी अपराधी के निपट चुके अपकर्म की कुंडी खड़का कर लेखक को अपने पाठकों के लिए क्या मिलने वाला है?
किताब पूरी पढ़ी तो ये चंद जवाब ईमेल के ऑटो रिप्लाई की तरह ज़ेहन में पॉपअप हुए:
अपराधियों का psychological insight मिला,
उसकी सोच का पैटर्न मिला,
उसके क्राइम के तरीके मिले,
अपराध के ज़हरीले अमरबेल के फैलने से रोकने में अक्षम तंत्र की नपुंसकता का आभास मिला और इन सबके संयोजन से बनी वह rationality मिली जो मुझ जैसे पाठकों को ऐसी भावी विसंगतियों से जूझने का माद्दा देती रहेगी।
अंग्रेज़ी की कहावत में इन पंक्तियों ने ऐसे नहीं जगह पाई है – “Shadows of sin recoiled before the light of your knowing.”
ऐसी खोजपरक किताबें हमारे समाज के हक़ में बेहद ज़रूरी हैं क्योंकि ऐसी किताबें अपराध, अपराधी और अपराधियों के modus operandi को बेनक़ाब तो करती ही हैं, उन्हें प्रश्रय देने वाली उस ओट को भी ध्वस्त करती हैं जिसे कई सफ़ेदपोशों ने अपनी बेइमानी के ईंट गारे से बनाया होता है।
किताबें और ख़ास कर ऐसी किताबें समाज की व्यवस्था का ऐसा दस्तावेजीकरण हैस जो सालों साल के लिए मुंजमिद हो जाती है। जिसमें न्याय का निनाद होता रहता है और अन्याय और अन्यायियों की मलामत होती रहती है।
देखा जाए तो अख़बार भी बासी होकर किसी खोमचेवाले का ठोंगा बनती है और किताब भी, पर किताब उस बिगड़े वजूद में भी किताब की हैसियत से ही ठोंगा पकड़ने वालों की आंखों की पुतलियों से राह रस्म करने से चूकती नहीं।
अख़बार में आविष्ट ख़बरें या किसी क़िस्म के सत्य का प्रकटीकरण तारीख़ की करवटों के साथ शायद अपनी तासीर खो सकते हैं पर किताबों की अनुगूँज बनी रहती है और कभी किसी दिन वो अनुगूंज चीखता सवाल बन तमस तंत्र को और हमारी उदासीनता को फिर से कठघरे में खड़ा कर देती है। और तब होता है हर उस अपराध और अपराधी का हिसाब किताब जो रसूख की ओट में बचता रहा था।
जाते जाते एक स्वीकारोक्ति – मैं समीक्षक की अपनी हैसियत को justify करने के लिए किताब पर नुक्ता-चीनी करने के मौके खंगाल कर आया हूँ पर अफ़सोस मेरे हाथ कुछ नहीं आया, सिवा इसके कि किताब के कुछ शब्दों से नुक़्ता नदारद हैं…. पर नुक़्ता की यह गैरहाज़िरी भी modern typographical हाउस स्टाइल से हम-आहंग (गुंथा हुआ) है।
वैसे भी शब्दों के अपभ्रंश से ज़्यादा ख़राब है आदमी के चरित्र का अपभ्रंश।
‘भूख’ में दीर्घ ऊकार की जगह
दीर्घ डकार हो तो ज़्यादा अच्छा;
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आजकल ‘अहम’ में हलन्त नहीं लगता, कोई बात नहीं।
उससे ज़्यादा ज़रूरी है मैं’ के अहंकारी मार्ग में
चेतना का एक अड़ंगा लगना;
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‘दुःख’ का ‘दुख’ बन जाना अपभ्रंश नहीं है,
दुख में उम्मीद का मर जाना अपभ्रंश है;
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‘जुबान’ में नुक़्ता के न होने से
ज़्यादा फ़िक्र-अंगेज़ है,
‘ज़मीर’ में नुक़्ता का न होना;
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शुक्र है कि इंद्रजीत जी और विवेक अग्रवाल जी के ज़मीर में उन्हीं का बिठाया नुक़्ता है, साबितो सालिम।
तो लुब्ब-ए-लुबाब यह है कि किताब भी उम्दा है और कातिब भी कमाल और किताब और कातिब से मंसूब शख़्सियत क़ाज़ी क़मर साहब का तो कहना ही क्या।
Happy reading White Tiger
(पवन कुमार देश के विख्यात सिने निर्देशक, लेखक, कवि, संगीतकार हैं।)
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