सड़क रोको आंदोलन : जनता की जीत या सिस्टम विरोध की यात्रा का आरम्भ?

NRC नागरिकता आंदोलन, JNU या किसान आंदोलन।

आंदोलन कई हुए पर प्रश्न है जनता के कितने बड़े वर्ग में जागरूकता थी या अधिकांश सिर्फ खबरों को पढ़कर अभिमत बनाते रहे? प्रश्न यह उचित है यहां की कोई निर्णय हो प्रत्येक नागरिक को बखूबी पढ़कर, समझकर अपना अप्रभावित अभिमत प्रदान करना चाहिए तब ही देश मे सच्चा लोकतंत्र कायम होगा। पर हकीकत यही हो यह संदिग्ध है।

इन कानूनों का कितनों ने समुचित अध्ययन किया? कितने अखबारों ने इस कानून की प्रति सूक्ष्म स्पष्ट विवेचना सहित छापी थी? क्या अधिकतर नागरिकों ने,किसानों ने पढ़ा भी था इसे? क्या हिंदी राष्ट्रभाषा के देश मे हिंदी अनुवाद आपने देखा भी था इन कानूनों का ? फिर चाहे वो सरकार की तरफ से हो या जनता की।

शौचालय तक के होर्डिंग-पोस्टर विज्ञापन हमें रटवा दिए जाते हैं, पर कानूनों के प्रति जाग्रति,साक्षरता आखिर कब लायी जाएगी इस देश मे?

किसान आंदोलन, NRC या कुछ और हो, हम इन दिनों बिन अध्ययन के निकल तो पड़ते ही है विभिन्न प्रभावों में! बस यही ठीक नही। हमारा अपना निष्कर्ष क्या? वह तो तब हो ना जब सूक्ष्म अध्ययन किया गया हो किसी समस्या का,विषय का,कानून का!

यूनिवर्सिटीज स्तर पर, पत्रकारिता के बीच आखिर कितने वाद विवाद कार्यक्रम हुए जो तर्क पर आधारित हों और किसी निष्कर्ष पर पहुंचे हों? सिर्फ टीवी चैनलों के चीखते कार्यक्रमों पर अपना अभिमत हम कब तक निर्भर करते रहेंगे? हम स्वयं क्यों अध्ययन नहीं करते?हमारे पास कानून की वह प्रति क्यों नही पहुंचती किसी भी पक्ष की ओर से।

यहां स्पष्ट कर लिया जाए कि इस लेख का किसी आंदोलन के पक्ष – विपक्ष से सम्बन्ध फ़िलहाल नही है! पर क्या आज भी आप कॉन्फिडेंट हैं कि आप उस विवाद को सम्पूर्ण गहराई से जानते है? जिस पर आप अभिमत दे रहे हैं।

हम किसान आंदोलन व एनआरसी की एक सौ से अधिक मुख्य खबरें दो साल में पढ़ सुन चुके। किसी में वह पेज नम्बर, नियम या धारा का क्रमांक नहीं! ना उस पेज की फोटो जहां आपत्तिजनक वाक्य लिखे हैं। ना उसे अंडरलाइन किया गया जैसा आप महत्वहीन पोस्ट तक पर व्हाट्सएप में करते है, वह भी नहीं।

स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आइए कोर्ट में हम बहस करते है, न्याय का विश्वास दिलाते हैं! पर हमने सड़क पर संसद को उतार दिया! हमने संसद में पारित एक कानून को सड़क पर “निपटा दिया”। बस यही नही होना चाहिए। हमारे पास सुप्रीम कोर्ट सी उत्तम व्यवस्था है।

यह सड़क रोको व्यवस्था किसी नए नेता का उदय तो करती है पर किसी स्थापित सिस्टम को तबाह भी। तो क्या यह “सड़क सरकार ” सी नई व्यवस्था की शुरुआत है! क्या यह संसद के प्रति अवाम आक्रोश ही है या कुछ और! शरीयत लॉ लागू करने को पाकिस्तान में भी ऐसी ही भीड़ उमड़ती है! अफगानिस्तान में भी! फिर उनमें और गौरवशाली लोकतांत्रिक भारत मे अंतर क्या रहा।

हम किसानों के साथ है इसमें शक नहीं। मैं स्वयम किसान भी हूँ! आंदोलन में देश में सम्पूर्ण स्तर पर तो नही था, पर फिर भी संसद और राजमार्ग रुक गए। NRC पर भी बहुत कम नागरिक सड़क पर थे, तब यह दशा है। यदि 20-30 करोड़ या एक चौथाई आबादी भी सड़क जाम करने लग जाए तो देश तो ठप्प ही हो जाएगा।

प्रश्न आंदोलनों के सही गलत होने का नहीं है। प्रश्न लंबे संघर्ष के बाद हमनें जो आज़ादी का, न्यायालय का रास्ता चुना था उसका है।

आखिर यह अंग्रेजों की नही हमारे अपने सम्पूर्ण राष्ट्र की चुनी हुई सरकार है। हम व्यवस्था भंग कर रहे। उस पर भी 90% ने कानून खुद नही पढ़ा है ना पढ़ाया गया है। तो बिन स्वयं पढ़े इतना लंबा संघर्ष इतनी जानें गईं! यह परंपरा आगे बढ़ती गयी तो भविष्य क्या होगा? बिन गहराई जाने भेड़चाल से निर्णय होंगे!

संसद में बने कानूनों की यह “मॉब लीचिंग “ही हुई ना! जिसमे अदालत का उपयोग ही नही किया गया।

तो असली प्रश्न है उस कानून का अधिकांश नागरिकों द्वारा अध्ययन किया जाना या समझा जाना! पर उन्होंने टीवी चैनलों को जैसे इस ड्यूटी पर लगा रखा था।

यहां सरकार की भी चूक दुखद है कि वे स्वयम भी जनता तक नही पहुंचा पाए कि आखिर कौन सा हिस्सा है, उसमें क्या सही या गलत है? ना मीडिया ने उसका कोई पिनपॉइंट प्रकाशन किया था। सरकार रहस्यमयी बन गयी थी।

हममें से कई पत्रकार बन्धु स्वयं किसान भी हैं। हम खिलाफ नही, साथ हैं किसानों के। बल्कि हम किसान भी है।

हमारा अपने ही देशवासियों से बस इतना निवेदन है कि यह साक्षरता बहुत जरूरी है, इसका अब वक्त आ गया। जिसे कानूनी साक्षरता कहते है।

अपना निर्णय स्वयम लीजिए भविष्य में चाहे कोई मसला हो। कुछ उपाय कीजिये पर स्वयम समझिए और जानिए भी।

यही तो लोकतंत्र है।

सरकार भी चाहती तो मोबाइल वोटिंग द्वारा जनजन के मन को,मत को टटोल सकती थी पर सरकार स्वयम, तिलस्मी अंधेरी गुफा सी बनी रही। वार्ताए चलती रहीं देश तोते सा ताकता रहा कि सीक्रेट मीटिंगों में आखिर क्या हुआ भीतर!

यह कैसा प्रतिनिधित्व भाई? जनता को न तब पता था न अब है! निर्णय हो गया। सरकार स्वयम कम्युनिकेशन नही कर पाई इसलिए ऐसे सड़क आंदोलन जन्मते हैं जो रोजमर्रा के जीवन की राह रोकते है।

आगे भी मसलों पर यदि ऐसे ही व्यवहार करते रहे, तो पुनः यही होना तय है। कम्युनिकेशन नही करेंगे तो यही तो होगा।

नोटबन्दी जनता समझी तो तकलीफों में भी साथ दिया, GST, धारा 370, कोविड लोकडॉउन तक मे कितना समर्थन दिया क्योंकि उसे ठीक से समझा गया। किसान कानून क्या उतना ही समझ सकी जनता? क्या हर बैठक,चौपाल पर हुई चर्चा कानूनों की? नही, चर्चा नही शोर था वह भी कानून का नहीं आंदोलन का।

इस मामले में गाँधीजी बहुत सफल, व्यवहारिक थे कि नमक कानून,अवज्ञा, विदेशी वस्तु बहिष्कार या अहिंसा आंदोलन वे अच्छे से समझा सके। आज भी लोगों से पूछ लीजिए वे इसे समझते है। तो गांधी जी की बौद्धिक चतुराई व सामर्थ्य के आगे विश्व के अग्रणी राष्ट्र की इतनी बड़ी सरकार के नुमाइंदे हार गए! इतनी बड़ी मिशनरी थक गई। शायद इसलिए महात्मा गांधी को विश्व मे इतना सम्मान मिला।

कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म के छात्रों को यह विषय अध्ययन करना चाहिए कि कैसे एक साधनविहीन व्यक्ति “गांधी” ने पूरे देश से कम्युनिकेट किया, वह भी तब जब कोई सोशल मीडिया, टीवी चैनल नही था!

सरलता और स्पष्टता! यह दो गुण निजी जीवन मे भी सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।  यही गांधी के वे गुण हैं,जिनका आदर विरोधी भी करते थे।

अंत में हर राष्ट्र निर्माता को नमन! हर नागरिक से कानून साक्षर होने की अपील!

मनोज शर्मा गांधी

लेखक देश के प्रतिष्ठित लेखक-संपादक, मीडिया कंसलटेंट, निर्वाचन मीडिया प्रभारी, वृत्तचित्र निर्माता, अभिनेता, एवं यूनिवर्सिटी मीडिया फेकल्टी हैं। देश, समाज, नागरिकों, व्यवस्था के प्रति चिंतन और चिंता, उनकी लेखनी में सदा परिलक्षित होती है।

(लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। इससे इंडिया क्राईम के संपादक या प्रबंधन का सहमत होना आवश्यक नहीं है – संपादक)

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