गैरजिम्मेदारों के कारण कमजोर होती एक लड़ाई

महामारी कोरोना के खिलाफ़ देश एक बड़ी जंग लड़ रहा है। इस जंग के पहले मोर्चे पर हमारा पूरा प्रशासकीय महकमा है, मेडिकल टीमें हैं, नर्स और डॉक्टर हैं। अफ़सर हैं, मीडिया के योद्धा हैं। सभी अपनी जान जोखिम में डाल कर अपने-अपने स्तर पर योगदान दे रहे हैं। बहुत से समाजसेवी भी प्रशासन की मदद कर रहे हैं।

पीएम मोदी के संबोंधन के आईने में देखें तो कोरोना के खिलाफ़ लॉकडाउन में पूरे देश ने बड़ी समझदारी दिखाई है। सहयोग दिया है। बेशक हम और आप जानते हैं कि देश के 90 फीसदी से ज़्यादा लोग तो हालात की गंभीरता समझ रहे हैं, अपना योगदान दे रहे हैं।

दिल्ली, इंदौर, बैंगलोर, मंगलोर, सोलापुर, फरीदाबाद, पटना या पंजाब के कई हिस्सों से ऐसे दृश्य और घटनाएं सामने आईं हैं, जिन्होंने इस अभियान को चोट पहुंचाई है। हम सभी में गुस्सा पैदा किया है।

हम इंदौर की बात करें तो यहां टाटपट्टी बाखल या सिलावटपुरा जैसे मुस्लिमबहुल इलाकों में जो कुछ हुआ, उसने पूरे समाज को शर्मसार किया है। आज सभी इन करतूतों की कड़ी निंदा कर रहे हैं। ऐसे लोगों के खिलाफ़ खड़ें हैं।

इंदौर में कोरोना मरीज़ों की जो सूची सामने आई है, उसमें सबसे ज़्यादा मुस्लिम समाज के लोग हैं। जो यह बताने के लिये काफी है कि वे और उनके इलाके अब किस कदर ख़तरे में हैं। उनका प्रशासन को सहयोग देना कितना ज़रूरी हैं। उनकी वजह से शहर के दूसरे लोग भी बड़े खतरे में आ सकते हैं।

क्या ऐसे गैर ज़िम्मेदार लोगों की वजह से कोरोना के खिलाफ़ जंग को लड़ना बंद करना या इसे भावनात्मक ज्वार से कमज़ोर करना ठीक होगा?

लड़ाई कठिन है, लंबी है और चुनौती पूर्ण भी। हमारे सामने इस लड़ाई को कमज़ोर करने वाले अंधी मानसिकता के अशिक्षित लोग हैं। उनमें जागरूकता की बेहद कमी है। इनमें से बहुत से लोगों को अफवाह फैला कर भड़काया गया है। प्रतिक्रिया में अपना और समाज, दोनों का ही वे नुकसान कर रहे हैं।

देश के कुछ और शहरों में भी लोगों ने रूकावटें पैदा कीं, कर्फ्यू का उल्लंघन किया। बड़े लक्ष्य पाने के लिए इन रूकावटों में ही उलझ कर रह जाना ठीक नहीं होगा। चाहे इंदौर के मामले हों या दिल्ली मरकज़ काट यह सब बेहद शर्मनाक और निंदनीय है।

क़ानून ऐसे मामलों में सख्ती से अपना काम कर रहा है। एफआईआर से लेकर एनएसए लगा है। गुनहगारों को उनकी सज़ा भी मिलेगी, मिलना चाहिए। इसका मतलब यह भी नहीं कि हम चंद लोगों के लिए खुद की शक्ति और एकजुटता की ताक़त को कमज़ोर कर दें। ऐसे में हमारी लड़ाई बीच में ही उलझ कर रह जाएगी।

यह ठीक वैसा ही है, जैसे किसी पहाड़ के शिखर पर जाते वक्त चंद लोगों के बैठ जाने पर सभी पर्वतारोही चोटी पर जाने का इरादा ही छोड़ दें।

चंद सिरफिरे या मान लें करीब 10 फीसद लोगों ने कुछ ग़लत किया है, तो अभी भी 90 फीसद लोगों की एकजुटता और ताकत बाकी है। इनमें सभी समुदायों के लोग हैं, बेशक मुस्लिम समाज के लोग भी हैं। सबकी मंशा चंद सिरफिरों की तरह नहीं है। सबके योगदान से यह जंग लड़ना ज़रूरी है। अपने-अपने स्तर पर सबकी शक्ति का सही सदुपयोग करना ज़रूरी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वीडियो संबोधन का मर्म समझें तो कोरोना से उत्पन्न अंधकार को मिटाने के लिए सबको मिल कर एक साथ रोशन होना ज़रूरी है। सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दोनों ही स्तरों पर।

असल में लॉक़डाऊन और पीएम मोदी की अपील के बाद ही भारत में बहुत से लोगों को कोरोना (कोविड-19) जैसी महामारी के बारे में पता चला। जब तक वे पूरी तरह से इसके बारे में समझ पाते, जागरूक हो पाते, वे सड़कों से लेकर घरों में क़ैद हो गए। इस बीमारी से ज़्यादा अपने हालात और पुरानी रूढ़ियों से घिर गए। ऐसे में ही अफवाहों ने अपना काम किया।

देश भर में श्रमिक लाखों की संख्या में अपने घरों की ओर पैदल ही निकल पड़े। सरकारी अपीलें भी काम नहीं आईं। सामाजिक दूरी बनाए रखना चुनौती बन गया। लोगों ने कोरोना के खिलाफ़ जुलूस तक निकाल डाले। दकियानूसी समाज को ग़ैरज़िम्मेदार धर्मगुरुओं और मौलानाओं ने और भी दुष्कर बना दिया। ऐसे में कोरोना से निपटने से पहले ही अज्ञानता के अंधेरे और हालात की बेचैनी ने लोगों को घेर लिया।

यह बीमारी ऐसी है कि जिसके बारे में वैज्ञानिक रोज़ सीख और समझ रहे हैं। शोध कर रहे हैं। वैक्सीन और तेज गति से टेस्ट करने के तरीके खोज रहे हैं।

रोज़ाना कोविड-19 को लेकर नए और चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। चुनौती बढ़ती जा रही है।

चीन ने नई जानकारी दी है कि वुहान में 1,500 से ज़्यादा ऐसे मरीज़ मिले, जिनमें बीमारी के लक्षण नहीं दिख नहीं रहे थे। बड़े-बड़े देश और बड़े-बड़े लोग इस बीमारी के प्रति उचित सोच और व्यवहार अपनाने से चूक गये।

अमरिका के राष्ट्रपति जो बात एक हफ्ते पहले कह रहे थे, आज उनका स्वर बदल चुका है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री खुद कोरोना पॉजिटिव मिले हैं। सिर्फ हमारे देश के दकियानूसी और गैरजिम्मेदार लोग ही नहीं, दुनिया के सभी देशों में इस तरह के मामले सामने आए हैं। बस उनका स्वरूप अलग है।

सोचिये, हम और आपको भी इस बीमारी के बारे में चंद रोज़ पहले तक बहुत कम जानकारी थी। लोग सामाजिक दूरी या कर्प्यू का महत्व नहीं समझ रहे थे। कई लोगों ने सम्मेलन किए, कार्यक्रम किए, पार्टियां की। मेल-मुलाकातों में डूबे रहे। आराम से घूमते-फिरते रहे। लोगों को खतरे में डाला। इतना ही नहीं बड़े स्तर पर भी विश्व स्वास्थय संगठन की चेतावनी की अनदेखी हुई। अब हालात पूरी तरह सामने हैं।

यह संभलने का समय है। डरने का समय है। सजग और सावधान रहने का है।

अब तो सबसे पहले खुद को और अपने परिवार को रोज़ाना शिक्षित और अपडेट करने की ज़रूरत है। इसके बाद हमारे रिश्तोदारों-दोस्तों और समाज को। वे लोग, जो नासमझ हैं, मज़हब समझे बिना, अपने समाज को ख़तरे में डाल रहे हैं, उन्हें तुरंत संभलने की ज़रूरत है।

इस वायरस ने छोटे-बड़े देश, अमीर-गरीब, ऊंच-नीच, जाति-धर्म का फर्क भी खत्म कर दिया है। सबको समान रूप से शिकार बनाया है। इसकी वजह से चंद दिनों में ही हमारे जीवन में कई-कई बदलाव आ गए हैं। आचार-व्यवहार, तौर-तरीके बदल गए हैं।

इस वायरस ने हमें सच्चा आईना भी दिखा दिया। यह वायरस बता रहा है कि हमारे लिए अस्पताल, डॉक्टर, वैज्ञानिक, विकास, शिक्षा, स्वच्छता जैसी बातें कितनी जरूरी है। पुरानी रूढ़ियां, धर्मभीरू मानसिकता, धर्म-जाति के भेद और बड़ा-छोटा कितने छोटे हैं। अर्थहीन हैं। सत्य केवल मानवता है। इंसानियत है।

वैसे भी हम कई तरह की सामजिक बुराइयों और कुरीतियों से लड़ कर आज यहां तक पहुंचे हैं। अब भी लड़ रहे हैं। हर जाति, धर्म, समाज या समुदाय में बदलाव हुए हैं।

करोना वायरस भी यही तो कर रहा है। बार-बार हाथ धोने के बीच हमें मानसिक तौर पर सेनेटाइज़ कर रहा है। अपने और प्रकृति के प्रति हमारे फर्ज को याद दिला रहा है।

शकील अख्तर की फेसबुक वॉल से साभार

10 अप्रैल 2020

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लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। इससे इंडिया क्राईम के संपादक या प्रबंधन का सहमत होना आवश्यक नहीं है – संपादक

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