ArticlesInterviews

विकसित भारत के लिए विकसित पुलिस तंत्र चाहिए – पद्मश्री प्रकाश सिंह, पूर्व पुलिस महानिदेशक

पुलिस समाज की बांह है, जो हमारी सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज हमारी पुलिस खुद ही तमाम समस्याओं से घिरी हैभ्रष्टाचार व अपराध आदि समस्याओं से निपटने के लिए मजबूत नहीं दिखती। समय-समय पर जनहित याचिकाओं पर अदालतों की सख्त टिप्पणियों और मानवाधिकार आयोग की रपट से सवाल उठने लगते हैं कि क्या पुलिस में सुधार की जरूरत है। पुलिस सुधार के सूत्रधार, सुप्रीम कोर्ट में पुलिस सुधार के याचिकाकर्ता, उत्तरप्रदेश व आसाम के पूर्व डीजीपी, बीएसएफ डीजी व इंडिया पुलिस फाउंडेशन के अध्यक्ष रहे पद्मश्री प्रकाश सिंह से पत्रकार अंकित तिवारीने विस्तृत बातचीत कीकुछ अंश:

प्रश्न: पुलिस व्यवस्था में सुधार क्यों जरूरी है?

उत्तर: पुलिस व्यवस्था में सुधार इसलिए जरूरी है क्योंकि वर्तमान में जो व्यवस्था चल रही है, ये ब्रिटिश सरकार ने 1861 में बनाई थी। उसका मुख्य उद्देश्य ऐसी पुलिस व्यवस्था की स्थापना था, जो उनके आदेशानुसार काम करे, उनके साम्राज्य की पकड़ अधिक मजबूत कर सके। जब साम्राज्यवाद को खतरा हो, तो बगावत कुचल सके। अंग्रेजों का जो आदेश हो, सही या गलत हो, जनहित में हो-न हो, पुलिस हर आदेश का पालन करे। वही व्यवस्था, मतलब आजादी के बाद भी आज तक वही चली आ रही है।

बीच में सुप्रीम कोर्ट का कुछ आदेश हुआ है, तो उसके आदेशों पर परिवर्तन लाने का स्वांग रचा गया। मैं जोर देकर कहना चाहूंगा कि परिवर्तन का स्वांग रचा गया। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को दिखाने के लिए स्वांग रचा कि हम आदेश का पालन कर रहे हैं। वास्तव में उनके आदेशों का गहन परीक्षण करें, तो पाएंगे कि वर्तमान व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। कागज पर कुछ खेल करके सुप्रीम कोर्ट को बता दिया कि हम आदेशों का पालन कर रहे हैं, वास्तव में जमीनी स्थिति वही है।

इस ढांचे को बदलना बहुत जरूरी है। विकसित भारत की कल्पना करते हैं, तो विकसित भारत के लिए एक पुलिस भी विकसित करनी पड़ेगी, उसे औपनिवेशिक ढांचा से बाहर निकालना पड़ेगा।

प्रश्न: पुलिस सिस्टम में किस प्रकार के सुधार की जरूरत है?

उत्तर: कुछ तो संस्थागत सुधार की जरूरत है। वर्तमान व्यवस्था में सुधार की सख्त जरूरत है। संस्थागत स्तर पर परिवर्तन मुख्य रूप से तीन हैं, जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है। एक तो यह कि स्टेट सिक्योरिटी कमीशन का गठन हो। स्टेट सिक्योरिटी कमीशन ऐसी बॉडी होगी, जो सुनिश्चित करेगी कि पॉलीटिकल क्लास पुलिस के काम में दखल न दे सके। यह भी सुनिश्चित करेगी कि पुलिस विभाग अपनी तरफ से कानून की सीमा लांघ कर कोई काम ना करे। पुलिस पर भी अंकुश लगाएगी और नेताओं पर भी अंकुश लगाएगी ताकि दोनों अपने-अपने दायरे में रह कर काम करें।

स्टेट सिक्योरिटी कमीशन के अलावा पुलिस एस्टैब्लिश्मेंट बोर्ड स्थापना की बात हुई है। एस्टैब्लिश्मेंट बोर्ड में पुलिस के पर्सनल मैटर्स या कार्मिक मामलों में, स्वायत्तता हो। डिप्टी एसपी रैंक तक के अधिकारियों को पोस्टिंग-ट्रांसफर जहां करना चाहें, कर सकें। कम से कम इंस्पेक्टर रैंक के लिए तो उन्हें पूरा अधिकार हो। डिप्टी एसपी के बारे में भी परिवर्तन कर सकते हैं। एसपी के ऊपर जो हो, एसपी और उनसे ऊपर जो हैं, उसके बारे में यह बॉडी रिकमेंडेशन देगी और कहेगी कि ऐसा करना चाहिए। उसमें परिवर्तन राज्य सरकार कर सकती है। जब परिवर्तन करेगी तो कारण बताएगी कि इस कारण से हम आपकी रिकमेंडेशन में परिवर्तन कर रहे हैं।

तीसरी पुलिस कंप्लेंट अथॉरिटी का गठन होना चाहिए। इसका गठन राज्य और जिला स्तर पर होना चाहिए। राज्य स्तर पर कंप्लेंट अथॉरिटी का चेयरमैन रिटायर्ड हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज हो और जिला स्तर पर रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट सेशन जज हो। उनके सहयोग के लिए दो-तीन आदमी होंगे, जिनकी ख्याति अच्छी होगी, उनका चयन राज्य सरकार करेगी। ये लोग जज की सहायता के लिए रहेंगे। ये तीन संस्थागत परिवर्तन हैं।

इसके अलावा बहुत कुछ हैं, जैसे पुलिस बल की रिक्तियां भरें। आज की तारीख में पूरे हिंदुस्तान भर में करीब छह लाख रिक्तियां हैं। इसके अलावा जो रिक्तियों के लिए सेंक्शन या स्वीकृतियां मिली हैं, किसी की 10 साल पहले हुई, किसी की 20 साल पहले, उन्हें भी दोबारा रिव्यू करने की जरूरत है। पुलिस बल की संख्या में वृद्धि की जरूरत है क्योंकि जनसंख्या बढ़ रही है, औद्योगीकरण बढ़ रहा है, शहरीकरण बढ़ रहा है, गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है। ये सब जब बढ़ रहा है, तो अपराध भी बढ़ेगा। तो कितनी स्वीकृति हो, उसके भी पुनरीक्षण की जरूरत है।

इसी तरह पुलिस में बहुत सारी चीजें हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर है। थानों की स्थिति अच्छी नहीं है। वहां जो उपकरण चाहिए, उपलब्ध नहीं है। गाड़ियों की कमी है। कम्युनिकेशन या संचार व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। फॉरेंसिक लेबोरेटरीज की कमी है। हाऊसिंग की कमी है। इनमें भी बढ़ोत्तरी होनी चाहिए। आज की चुनौतियों के अनुसार और पुलिस बल की संख्या के अनुसार सुविधाएं उपलब्ध होनी चाहिएं।

प्रश्न: इस संबंध में बनीं कमेटियों की सिफारिशों पर अब तक कितनी कार्रवाई सरकार ने की है?

उत्तर: कमेटियां तो बहुत सारी बनी हैं, कुछ अंशकालिक होती हैं, कुछ कॉस्मेटिक होती हैं याने दिखाने के लिए। जो मुख्य जरूरत है कि पुलिस काम करने के लिए स्वायत्त हो। मैं स्वायत्तता शब्द का इस्तेमाल कर रहा हूं, स्वतंत्रता नहीं कह रहा हूं। जितनी स्वायत्तता होनी चाहिए, उतनी नहीं है। पुलिस के रोजमर्सा के काम में राजनेताओं का बहुत दखल होता है, इससे पुलिस को काम करने में बहुत दिक्कत होती है। देखिए थोड़ी बहुत वाहनों की संख्या बढ़ी, थोड़ा पुलिस बल बढ़ा, एकाध लेबोरेटरी खुल गई। ये सब करने में सरकार को दिक्कत नहीं होती है, ये कर देते हैं। जो सबसे बड़ा परिवर्तन होना चाहिए कि पुलिस के कामकाज राजनैतिक दखल से मुक्त हो, वो नहीं हो रहा है। उसके लिए कोई राज्य सरकार सहमत नहीं है।

प्रश्न: क्या पुलिस थानों का स्वरूप बदलने की भी जरूरत है?

उत्तर: थानों का स्वरूप बदलने की जरूरत है। इस मायने में कि थानों के भवन ज्यादातर जर्जर हालत में है। आप कहीं देखें कि बिल्डिंग तो है लेकिन वह कितनी अच्छी है, ये देखने की जरूरत है। आंगतुको के बैठने का कोई कमरा नहीं होगा। अब तो हालत इतने बुरे नहीं हैं। दस-पंद्रह साल पहले तक तो ये हालत थी कि कुछ थानों में हवालात तक नहीं थे। किसी खिड़की की छड़ से मुल्जिम को बांध दिया जाता था। हवालात हैं भी, तो शौचालय ठीक नहीं हैं। शौचालय मतलब उसी हवालात में शौच भी करेगा, उसी में रहेगा भी। ये ठीक नहीं है। शौचालय अलग होना चाहिए।

पुलिस थाने की हालत खराब इसलिए हैं क्योंकि सामंतवादी तरीके से जब बने थे, वही थाने चले आ रहे हैं। कुछ थानों का नवीनीकरण हुआ है, पर बहुत काम करने की जरूरत है। थानों को नए स्तर से बनाना होगा। मॉडल थाने का एक स्ट्रक्चर होना चाहिए। सब थानों में समान सुविधाएं होनी चाहिएं।

एक संस्था कॉमन कॉज की रिपोर्ट आई है, जिसमें स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया बताया है कि कितने थाने ऐसे हैं, जहां आंगतूको को बैठने की जगह नहीं है। कितने थाने ऐसे हैं, जहां टॉयलेट नहीं हैं। कितने थाने ऐसे हैं जहां पीने के पानी की सुविधा नहीं है। ये सब दिक्कतें हैं।

थानों में बहुत परिवर्तन की जरूरत है। सबसे बड़ी बात, थानों के वातावरण में बदलाव की जरूरत है। वहां का वातावरण ऐसा होना चाहिए कि शिकायती पत्र लेकर जो आदमी आए, अपनी तकलीफ में आए, अपनी रिपोर्ट लिखाने आए, तो उसके मन में भय या संकोच नहीं होना चाहिए कि हमारा काम यहां होगा या नहीं। इस आत्मविश्वास के साथ वह थाने में आए कि यहां हमारी सुनवाई होगी। उसकी रिपोर्ट दर्ज की जाएगी, उस पर यथासंभव कार्रवाई होगी।

प्रश्न: क्या पुलिस जांच-पड़ताल के लिए अलग विंग बनाना चाहिए?

उत्तर: जांच-पड़ताल के लिए अलग विंग के बारे में तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि बड़े शहरों में जहां आबादी दस लाख से अधिक है, वहां इन्वेस्टिगेशन और लॉ एंड ऑर्डर के काम अलग होने चाहिएं। आजकल ज्यादातर जिलों में देखा जा रहा है कि रोज कोई ना कोई ऐसी स्थिति बन जाती है कि सारा स्टाफ लॉ एंड ऑर्डर को संभालने में लगा देते है।

अब मान लीजिए जिले में कोई वीआईपी आ गया, मुख्यमंत्री आ गए या मंत्री जी के खास आ गए। जिला छोटा हुआ, तो भैया मंत्री जी का काम पहले देखो, डकैती बाद में देखी जाएगी, हत्या बाद में देखी जाएगी। मंत्री जी जाएं, तब अपना काम करेंगे। दिल्ली जैसे बड़े शहर या लखनऊ-मेरठ जैसे शहर में भी हालात ऐसे हैं कि मालूम हुआ कि चीफ मिनिस्टर आए हैं, तो भाई सारा काम छोड़ो। अब चीफ मिनिस्टर साहब की विजिट ठीक से निकल जाए। मान लें दंगा हो गया, तो दंगा नियंत्रण जरूरी है। इन्वेस्टिगेशन छोड़ो, मुकदमा छोड़ो, चलो सब पहले दंगा नियंत्रण करो। जब गढ़मुक्तेश्वर मेला आ गया, तो मेला सही से निकाल लो।

कहने का मतलब है कि लॉ एंड ऑर्डर की समस्याएं जनपदों में उभरती रहती हैं, और उनसे निपटने के लिए जिले के अधिकारी या डीआईजी रेंज वगैरह को परेशानी रहती है कि हमारे पास पुलिस बल में ऐसे ही कमी है, वैसे में इस समस्या से कैसे निपटें। पहले के मुकाबले दंगे ज्यादा विकराल हो रहे हैं। उनसे निबटना ज्यादा जरूरी है। मुकदमा या तफ्तीश, तो बीस या चालीस दिन लगा देंगे, तो कोई पूछने वाला नहीं है। कुछ हालात में गड़बड़ हो गई, चार-छह आदमी मर गए, तो जवाब-तलब होगा, सस्पेंड होंगे। लिहाजा लॉ एंड ऑर्डर में सारा स्टाफ डाइवर्ट हो जाता है। इन्वेस्टिगेटिव स्टाफ भी लॉ एंड ऑर्डर में लग जाता है। इसलिए जरूरी है कि पुलिस बल की कमियां, आदमियों की कमियां, उसे पूरा किया जाए ताकि लॉ एंड ऑर्डर का काम अलग चलता रहे, इन्वेस्टिगेशन अलग चलती रहे।

प्रश्न: जनता-पुलिस संबंधों में किस तरह सुधार हो सकता है?

उत्तर: जनता और पुलिस के पॉइंट्स ऑफ कांटेक्ट पर पुलिस रिस्पांस अच्छा होना चाहिए। थाने में लोग रिपोर्ट लिखाने जाते हैं, तो बाद में लिखी जाएगी। पहले कम से कम बैठने की जगह हो। कोई आदमी रोता-गाता आ रहा, कोई बहुत थका-दौड़ा-भागा आ रहा है, तो चलो भैया पानी पी लो, चाय पी लो, यह भी तो होना चाहिए। पहले तो उसके प्रति व्यवहार अच्छा हो, फिर उसकी बात सहिष्णुता से, सहृदयता से सुनिए और उसकी रिपोर्ट में जो प्रारंभिक पूछना हो और जांच कर तुरंत उसकी रिपोर्ट दर्ज करें।

आधी जनता तो इसी से परेशान है कि हमारी रिपोर्ट लिखी जाएगी कि नहीं लिखी जाएगी। तो रिपोर्ट अच्छी लिखी जाए। व्यवहार सहृदयता और हमदर्दी का हो, सांत्वना देने का हो। व्यवहार में परिवर्तन चाहिए।

आप बिना मतलब स्कूटर वालों को रोक कर पैसा वसूलते हैं। क्यों पैसा वसूलते हो यार? मोटर वाले को तो रोकते नहीं। बड़े-बड़े शहरों में ऐसा भी होता है। जितनी छोटी गाड़ी है, जितने कम हैसियत का आदमी है, उसकी सबसे ज्यादा चेकिंग होती है, उसी का सबसे ज्यादा चलान भी होता है, पैसे भी वसूले जाते हैं। पैसा क्यों वसूलते हो भाई? करप्शन क्यों, जब तुम्हें अच्छी खासी तनख्वाह मिल रही है? अब तो पुलिस वाले भी नहीं कह सकते कि हमें कब तनख्वाह मिलेगी। सरकार अच्छी-खासी तनख्वाह दे रही है, तो लोगों को प्रताड़ित मत करो। लोगों को ये न लगे कि जबरदस्ती पैसे की उगाही हो रही है।

पब्लिक की अपेक्षाओं पर पुलिस खरी उतरे। इतना ही कर लिया तो अपने-आप पुलिस-जनता संबंधों में सुधार आ जाएगा।

प्रश्न: पुलिस व्यवहार में सुधार कैसे संभव है?

उत्तर: पुलिस व्यवहार में सुधार संभव है। पहली बात तो बड़े अफसर ही उदाहरण प्रस्तुत करें कि हम अप्रोचेबल और एक्सेसिबल हैं। आदमी हमसे मिल सकता है। हमसे शिकायत कर सकता है।

मैंने सोशल मीडिया पर देखा कि कोई रेप पीड़िता को पुलिस वाले डीआईजी साहब से मिलने नहीं दे रहे थे। वह भाग कर डीआईजी साहब तक पहुंच गई, तो सारे पुलिस वाले उसे रोकने गए। पुलिस अधिकारियों को एक्सेसिबल होना चाहिए। उनसे जनता के बीच जो मिलना चाहे, मिल सकते हैं, उनकी बात सुनें। सीनियर अफसर को शानदार व्यवहार प्रस्तुत करना होगा।

पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज में सिपाही, दरोगा और सबको यह सिखाया जाए कि तुम्हें जनता के साथ विनम्र होने की जरूरत है। कैसे तुम अप्रोच करो, कैसे उनसे बात करो, यह सब सिखाया जाए, बजाए इसके कि धौंस दिखाओ, दादागिरी करो और जबरदस्ती वसूलो। उनके सामने उदाहरण प्रस्तुत किए जाने चाहिएं। जो गलत व्यवहार करें, उनको दंडित भी होना चाहिए।

प्रश्न: पुलिस की हरकतों पर निगरानी की कितनी व्यवस्था है? क्या यह पर्याप्त है?

उत्तर: देखिए, व्यवस्था तो पूरी है लेकिन सवाल है कि वो व्यवस्था काम नहीं कर रही है। निगरानी के लिए तो इतने सारे अफसर हैं मतलब विभिन्न स्तरों की व्यवस्था है। सिपाही पर निगरानी के लिए दरोगा है, दरोगा पर इंस्पेक्टर है, इंस्पेक्टर के ऊपर डिप्टी साहब हैं, डिप्टी साहब पर एसपी साहब हैं, एसपी साहब के ऊपर भी आला अफसर हैं। इसका मतलब यह है कि निगरानी की व्यवस्था तो हर स्तर पर है।

सवाल यह है कि क्या ये लोग अपना काम और जिम्मेदारी सही ढंग से निभा रहे हैं? नहीं निभा रहे हैं। इस समय मैं कहूंगा कि पर्यवेक्षण या निगरानी कमजोर है। जिससे नीचे का तबका निरंकुश हो जाता है। अगर सुपरविजन स्ट्रिक्ट हो, और जो सुपवाईजरी ऑफिसर खुद दूसरे के सामने उदाहरण पेश करें कि नहीं, हम गलत काम न करेंगे, न करने देंगे। न हम पैसा लेंगे, न तुम्हें पैसा खाने देंगे। ऐसा एटीट्यूड सीनियर अफसर में आ जाए, तो उसके नीचे वाला तबका अपने-आप ठीक हो जाता है। वो भी सोचेगा कि हमारे सिर पर सवार हैं, ये तो हमें खा जाएंगे। जब यह फीलिंग आती है, तो आदमी डर के मारे सही रास्ते पर आ जाता है।

जब कप्तान साहब खुद ही खा रहे हैं, तो चलो हम भी बहती गंगा में हाथ धोएंगे, या डीजी साहब खुद ही खा रहे हैं, तो बाकी लोग भी खाएंगे ही। यह बड़ी समस्या है। हर लेवल पर सीनियर अफसर को निष्पक्ष होना पड़ेगा, बेदाग होना पड़ेगा, निष्कलंक होना पड़ेगा।

प्रश्न: कमजोर निम्न वर्ग के लिए पुलिस का व्यवहार इतना खराब क्यों होता है?

उत्तर: उनको कोई बोलने वाला नहीं है, कोई सुनने वाला नहीं, उनका कोई, कोई गॉडफादर नहीं है, तो उन्हें जितना चाहे मार लो, पीट लो कोई कुछ नहीं कर सकेगा। अपना नौकरी का फ्रस्टेशन, जो दबी कुंठाएं हैं, वह सब निकाल देते हैं।

अब पुलिस ओवरवर्क्ड है, अंडरस्टाफ है, उसके काम में दखल बहुत है। उस पर जो स्ट्रेस और स्ट्रेन है, उस पर काम का दबाव है, इतना ज्यादा है कि यदाकदा संतुलन खो देता है। उससे संतुलन की अपेक्षा होती है। उससे अच्छे व्यवहार की अपेक्षा होती है। ये बैलेंस तब सबसे ज्यादा खोता है, जब उसके सामने कमजोर आदमी होता है कि हम जो चाहे करें, कोई पूछने वाला नहीं है।

वह तब डरता है कि कहीं ताकतवर या समझदार के साथ कुछ किया, तो पता नहीं कोई वीडियो खींच कर शिकायत भेज देगा, कोई पहुंच से शिकायत कर देगा। जो आदमी कमजोर है, जिसका राजनैतिक दबाव नहीं है, जिसके पास पैसे की ताकत नहीं है, उन पर ताकत दिखाते हैं, दम जमाते हैं, फ्रस्ट्रेशन निकालते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए।

पुलिस की वर्किंग कंडीशंस अच्छी हो, हाऊसिंग अच्छी हो, काम में दखल ना हो, उनकी दिक्कतें समझी जाएं, तो दूसरों के प्रति उसका व्यवहार भी अच्छा होगा। कोविड के दौरान हमने देखा कि पुलिस का व्यवहार जनता के साथ बहुत अच्छा था। इसके मतलब है कि पुलिस में मानवीय दृष्टि और व्यवहार है, उसे मौका मिले, तो हमें अच्छे उदाहरण देखने को मिलते हैं।

पुलिस का मानवीय चेहरा दब जाता है क्योंकि अंडरस्टाफ और ओवरवर्क होने से, बहुत स्ट्रेन और काम के दबाव में पगलाया रहता है सुबह से शाम तक, तो वह गलत बरताव कर जाता है।

प्रश्न: अपराधियों से पुलिस की मिलीभगत पर कैसे काबू संभव है?

उत्तर: ऐसा है कि राजनैतिक मिलीभगत जब होती है, तभी पुलिस की मिलीभगत होती है। आज राजनीति इतनी गंदी हो गई है कि पार्लियामेंट में भी, एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के मुताबिक 44 फीसदी जनप्रतिनिधि अपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। वे जब अपराधिक पृष्ठभूमि के हैं, तो इनकी अपराधियों से सांठगांठ हो गई, और राजनेता की जब अपराधियों सांठगांठ हो गई, तो पुलिस इन सांठगांठ वाले नेता को भी बचाती है, अपराधियों को भी बचाती है।

सांठगांठ की जड़ राजनैतिक है। जब तक देश की व्यवस्था द्वारा अपराधियों को संरक्षण मिलेगा, तब तक पुलिस की भी सांठगांठ होती रहेगी।

प्रश्न: पुलिस में भ्रष्टाचार का नियंत्रण कैसे संभव है?

उत्तर: भ्रष्टाचार नियंत्रण के लिए करप्शन एजेंसी और विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन हैं। ऑर्गनाइजेशन से बढ़ कर मैं कहता हूं कि अफसर ईमानदार हों, तो सब ठीक हो जाएगा। थाने पर एसएचओ ईमानदार हो, सब डिवीजन स्तर पर डिप्टी साहब और डीएसपी ईमानदार हो जाए, जिला स्तर पर एसीपी ईमानदार हो जाए, रेंज स्तर पर डीआईजी ईमानदार हो जाए, जोन पर एडिशनल डीजी या आईजी ईमानदार हो जाए, राज्य स्तर पर डीजी ईमानदार हो जाए, तो मजाल है कि नीचे वाला बेईमानी कर ले।

जो बेईमानी करेगा, दहशत में रहेगा कि कहीं पकड़ा न जाऊं। आज व्यवस्था इतनी दूषित है कि सुपरवाइजरी अफसर चोरी कर रहा है, तो नीचे वाला भी चोरी कर रहा है, उसके नीचे वाला भी चोरी कर रहा है। कहता है कि ऊपर वाला कर रहा है, और हमसे मांग रहा है, तो मैं कहां से लाऊं। मैं भी चोरी करूंगा, लोगों से उगाही करूंगा।

प्रश्न: महिला पुलिसकर्मियों के सामने क्या चुनौतियां हैं?

उत्तर: महिला पुलिसकर्मियों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां है कि जब आज भर्ती होती है, तो उनकी संख्या भी कम है, वे ज्यादातर पुरुषों से घिरी रहती हैं। अब उनमें कई भेड़िए हैं, कई बदमाश है, कई लुच्चे-लफंगे भी हैं। इसलिए बहुत सी जगह अब एसीपी चाहते हैं कि इनको ऐसा काम दो, जो डेस्क जॉब हो। लोगों की शिकायतें सुनें, वायरलेस, टेलीफोन ड्यूटी या दफ्तर में बैठ जाएं। फील्ड में भेजने में कोई समस्या नहीं हैं, महिलाएं काम तो कर सकती हैं, पर इनके इर्दगिर्द भेड़िए रहते हैं, ये दूसरी समस्याएं खड़ी करते हैं।

आप बाहर भ्रष्टाचार की शिकायत देखने जाएं, उसके पहले अपने विभाग का भ्रष्टाचार दूर करना पड़ेगा। जब मैं पुलिस फाउंडेशन का चेयरमैन था, तब ऐसे भ्रष्टाचार मतलब व्यभिचार की कई जिलों और राज्यों से शिकायतें आई थीं। उसके हिसाब से रात में जब गश्त में औरतें निकलती हैं, दो लड़कियां के साथ छह आदमी हैं, और वे छह आदमी, दोनों लड़कियों को रात में तंग कर रहे हैं, तो वे क्या करें? पुरुष कहते हैं कि क्या करें रात में बहुत थकान हो गई है. बोरडम हो गया है, कुछ एंटरटेनमेंट होना चाहिए, ऐसी बातें होती हैं, तो समस्याएं बढ़ती जाती हैं।

कांस्टेबल रैंक में जब तक संख्या वृद्धि नहीं होगी, कम से कम 35 फीसदी ना पहुंच जाए, स्थिति मेंनहीं सुधरेगी। बमुश्किल 10 फीसदी के आसपास महिला बल है। जब ये संख्या में पुरुषों के बराबर होने लगेंगी, तो अंतर पड़ेगा। उनके शोषण की समस्या भी कम हो जाएगी। लड़कियां फील्ड वर्क अच्छा कर सकती हैं, और अच्छा करने का नमूना भी उन्होंने दिया है, परंतु उनकी संख्या में बढ़ोतरी की जरूरत है।

….

अंकित तिवारी प्रयागराज के बेबाक पत्रकार हैं। वे इंडिया क्राईम से मानद तौर पर जुड़े हैं।

प्रकाशन तिथी 04 दिसंबर 2025

All Image Courtesy: x.com_singh_prakash 01

Leave a Reply

Web Design BangladeshBangladesh Online Market