कोरोना युद्ध में भारत बनाम ताईवान

क्या कोरोना का ईलाज तालाबंदी के इर्दगिर्द सिमट चुका है? क्या हमें किसी ठोस रणनीति कि कोई जरूरत नही।

दुनिया के इतिहास में महामारी का ये वो प्रथम स्टेज था, जब राहुल गांधी के सचेत करने के बाद भी भारत ने इसे गंभीरता से लेना मुनासिब नही समझा था। क्योंकि ये वो दौर था, जब भारत मे न सिर्फ नमस्ते ट्रंप की ज़ोर शोर से तैयारी चल रही थी बल्कि एमपी में कमलनाथ सरकार को गिराने के लिए सम्पूर्ण मंत्रिमंडल अपना पसीना बहा रहा था।

नमस्ते ट्रंप है जिम्मेदार
कोरोना जैसी महामारी को भारतीय मीडिया नजर अंदाज करके अहमदाबाद में नमस्ते ट्रंप की पीआर में जुटकर ट्रंप के पोस्टर और स्टेडियम को गूगल बना रहा था।
कोरोना अब तक अंतरराष्ट्रीय महामारी बनकर उभर चुका था लेकिन भारत के टीवी चैनल के लिए कोरोना को एक मामूली खबर बताई जाती रही।

क्या घरबंदी – तालाबंदी ही इलाज है
आज दुनियाँ कोरोना के प्रकोप से त्राहि त्राहि कर रही है। इस बीच एक बड़ी बहस दुनिया के विश्व पटल पर बेबस होकर खड़ी है। वजह कोरोना का इलाज महज एक तालाबंदी के इर्द गिर्द आकर खत्म हो चुका है।
ऐसे में एक बड़ा सवाल है कि क्या महज़ एक तालाबंदी को लेकर कोरोना के संक्रमण को रोका जा सकता है। या फिर हमारे पास संक्रमण को लेकर आगे कोई दूसरा उपाय नही है, हम हथियार डाल चुके हैं। अगर ऐसा है तो देश और दुनिया को तबाही की तरफ जाने से कोई नही रोक सकता।
खुद को सुपर पावर की श्रेणी में रखने वाला अमेरिका, जो कभी तालाबंदी के खिलाफ था,आज उसने भी तालाबंदी की अवधि को बढ़ा दिया है। क्योंकि कोरोना अब अमेरिका के कई ग्रमीण इलाको में मजबूती के साथ अपनी जड़ें फैला रहा है।
ऐसे में बहोत अहम सवाल ये है कि क्या हमारे पास खुद की कोई रणनीति नही है। क्या महामारी के इस दौर में हमारी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो चुकी है, कि हमारे पास तालाबंदी के सिवा कोई कारगर उपाय नही!
आइये आज हम आपके साथ एक तस्वीर साझा करते है कि हम क्यों कोरोना के खिलाफ हथियार डालकर महज़ तालाबंदी से जीत की आस लेकर चल रहे है।

आंकड़ों के जंजाल में
भारत मे 737 जिलों में 377 जिले कोरोना के काल से प्रभावित है। देश में 5 ऐसे राज्य है जहां कोरोना संक्रमण ने 1000 से ज्यादा आंकड़ा पर दिया है। ये वो सरकारी आंकड़े है, जिनका सैम्पल टेस्ट मंद गति से कराया जा रहा है। जैसे-जैसे टेस्ट हो रहे हैं, आंकड़े सामने आ रहे हैं।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय आबादी के आंकड़ों पर दलील देता है कि देश में कोरोना संक्रमित के दुगने होने की रफ्तार दुनिया के बाकी बड़े देशो से भारत में बहुत कम है।
ऐसे में सबसे अहम और गौर करने वाली बात ये है कि जब भारत टेस्ट ही सबसे कम कर रहा है, तो देश में कोरोना संक्रमित लोगो की वास्तविक जानकारी का आधार क्या है?

टेस्ट क्यों नहीं
कांग्रेस ने हाल ही में सरकार से टेस्ट के विस्तृत आधार की मांग की है।
कांग्रेस ने आरोप लगाए है कि 10 लाख की आबादी पर देश में जो टेस्ट हो रहे वो प्रयाप्त नही है, सरकार महज तालाबंदी करके वायरस का पीछा नही कर सकती।
क्योंकि हमें टेस्ट की रफ्तार का आंकड़ा बढ़ाने की सख्त जरूरत है।
आपके जानकारी के लिए बताना चाहूंगा कि तालाबंदी से लोगो को परहेज है भी और नही भी। फिलहाल वायरस से निपटने के लिए महज़ तालाबंदी ही एक रास्ता नही है। उसके लिए सिस्टम में सुधार की जरूरत है। ठोस और कारगर रणनीति और टेस्ट में तेज़ी की जरूरत है। हमें तालाबंदी के साथ-साथ बदहाल होती अर्थव्यवस्था पर अभी से रणनीति तय करनी होगी,अन्यथा जिस रफ्तार से अर्थव्यवस्था का किला गिरने लगा है, तो वो दिन दूर नहीं, जब तालाबंदी अर्थव्यवस्था की जड़ों को खोखला करके कई दशक पीछे धकेल देगी।
क्या सरकार के पास कोरोना का इलाज महज एक तालाबंदी पर सिमट कर रह गया है? या फिर तालाबंदी के साथ कोई मुकम्मल तैयारी भी है, जो कोरोना और अर्थव्यवस्था से लड़ने के लिए सक्षम है।
सरकार को इसका जवाब देना होगा कि आने वाले कल में देश में जो बेरोजगारी की सुनामी इंतज़ार में बैठी है, उसके लिये सरकार की क्या तैयारी है।
जरूरत है आज देश में वायरस के खिलाफ टेस्ट की संख्या बढ़ाने की, लेकिन अब तक स्वास्थ्य मंत्रालय देश मे सबसे कम टेस्ट होने की वजहों का सही जवाब देने में असमर्थ रहा है।

देश के बाहर भी नजर दौड़ाएं
अप्रैल तक दुनिया के सभी देशों में कोरोना टेस्ट दर भारत से कही ज्यादा देखी गई।
जवाब में स्वस्थ मंत्रालय द्वारा अपनी वेबसाइट पर अमेरिका से भारत के टेस्ट आंकड़ो पर एक ग्राफिक्स जारी करता है कि अमेरिका में जब 10 हजार मामले थे, तो 1,39,878 टेस्ट अमेरिका ने किए थे जबकि भारत में 10 हजार केस पर 2,17,554 टेस्ट किये गए थे।
स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि भारत ज्यादा टेस्ट कर रहा है लेकिन पॉजिटिव मामले देश में कम मिल रहे हैं।
सवाल ये है कि हम इस डाटा के जरिये 33 लाख टेस्ट करने वाले अमेरिका के सामने खुद को किस श्रेणी में खड़ा कर सकते है?
हम किसी भी हालत में ऐसा नही कर सकते क्योंकि हमारी टेस्टिंग क्षमता बहुत कम है।
भारत ने अप्रैल 2020 तक अपनी टेस्टिंग क्षमता में कुछ विस्तार जरूर किया लेकिन उसमे भी कई सवाल अब तक सामने खड़े हैं।
कोरोना टेस्ट की रिपोर्ट में लगने वाला समय क्या है? रिपोर्ट 6 से 8 घंटे में आ रही हैं या रिपोर्ट आने में 24 से 48 घंटे का वक़्त लग रहा है?
सरकार के पास हालांकि इस सवाल का कोई जवाब नही है।
पीएम ने “मन की बात’ में कई तरह के तरीके बताए कोरोना से बचाव के लिए। टेस्टिंग लैब की संख्या जरूर बताई लेकिन पीएम मन की बात में सैम्पल टेस्ट की बात पर ख़ामोश रहे।

आंकड़े क्या कहते हैं
15 अप्रैल तक देश में 2,74,599 सैम्पल टेस्ट हुए।
8 अप्रैल तक 1,27,919 सैम्पल टेस्ट हुए थे।
एक हफ्ते में महज़ 1,46,680 सैम्पल टेस्ट हुए।
हर दिन का औसत निकालें तो 20 हजार से ज्यादा टेस्ट जाते हैं।
देश दुनिया के सामने कोरोना के खिलाफ महज़ दो ही हथियार है (तालाबंदी और टेस्ट), दूसरा कोई हथियार फिलहाल अब तक तैयार नहीं हो सका है।

आइये बाकी कुछ देशो का भ्रमण करा दें, जहां काफी हद तक कोरोना के खिलाफ मजबूत रणनीति के चलते उठाये कदम कारगर साबित हुए।

दक्षिण कोरिया का दबदबा
दक्षिण कोरिया ने तालाबंदी की जगह न सिर्फ तेज़ी से टेस्ट का रास्ता अपनाया बल्कि उससे ज्यादा खुद की मज़बूत रणनीति पर काम किया। हर एक व्यक्ति की पारदर्शी सूचना और समय पर लिए एक्शन के चलते दक्षिण कोरिया ने कोरोना पर शिकंजा कस दिया।

जर्मनी भी जीता
दूसरी तरफ जर्मनी कोरिया के मॉडल को पीछे छोड़ते हुए 18 लाख टेस्ट के साथ आगे बढ़ा है।

ताईवान ने दिखाया ताव
जर्मनी को भी छोड़िए सीधे चलते हैं चीन से सटे ताइवान में, जिसके बारे मे कहा गया कि चीन के बाद कोई देश विनाशकारी लिस्ट में शामिल होगा, तो वो ताईवान होगा।
चीन से बिल्कुल सटा देश ताइवान है, जहाँ हर रोज़ सैकड़ों उड़ानों का आदान-प्रदान वुहान से होता है।
ताईवान के साढ़े आठ लाख लोग चीन में रहते है।
यहां चौकाने वाली बात ये है कि ताईवान ने न टेस्ट में दुनिया का रिकार्ड बनाया, न तालेबंदी की।
ताईवान 2.38 करोड़ की आबादी वाला देश है, जहाँ कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा दहाई में भी नही पहुँच सका। संक्रमित लोग की संख्या 400 के अंदर रोक ली।

कैसे ताईवान ने कोरोना को हराया
यह जानना जरूरी हो जाता है कि ताईवान ने आखिरकार कैसे देश को वायरस से बचाया।
31 दिसंबर 2020 को वुहान में संक्रमण की खबर के बाद ताइवान ने बिना देरी किये चीन से आने वाली उड़ानें सीमित कर दीं।
तब तक कोरोना का नाम कोविड 19 नहीं था। ताइवान ने चीन से आने वाले हर एक नागरिक की स्क्रीनिंग के साथ-साथ उन्हें क्वारन्टाइन करता गया।
ऐसा इसलिए कि ताईवान ने 2003 सार्स वाईरस के हमले की सीख से नेशनल हेल्थ कमांड सेंटर बना रखा था।
कोरोना के उदय के बाद 30 जनवरी को ही इसे सक्रिय कर दिया। साथ ही चीन ने अपने सेंट्रल एपेडेमिक कमांड सेंट्रल को भी एक्टिव कर दिया।
इसके बाद ताइवान अपने मंत्रिमंडल के साथ मिल कर एक नई रणनीति में न सिर्फ जुट गया बल्कि बिना देरी किये लागू भी करता गया।
देश ने राज्य और जिलों की सभी सीमाओं को सील कर दिया और नियमित तौर पर प्रेस ब्रेफिंग में ताईवान ने जोर पकड़ लिया।
10 फरवरी को ताइवान में 16 मामलों के साथ तथा चीन में 31 हजार के संक्रमित आंकड़ों की प्रष्ठभूमि विश्व पटल पर दिखने लगी, तो ताइवान ने बिना समय गंवाये चीन से जुड़ी सभी उड़ानें पूरी तरह रद्द कर दीं।
चीन, हांगकांग और मकाऊ से आने वाले सभी यात्रियों को सख्त स्क्रीनिंग के साथ क्वारेंटाईन में भेजा जाने लगा।

हम नहीं सुधरेंगे
दुनिया के इतिहास में महामारी का ये वो प्रथम स्टेज था, जब राहुल गांधी के सचेत करने के बाद भी भारत ने इसे गंभीरता से लेना मुनासिब नही समझा।
कारण? क्योंकि ये वो दौर था, जब भारत मे न सिर्फ नमस्ते ट्रंप की ज़ोर-शोर से तैयारी चल रही थी बल्कि एमपी में कमलनाथ सरकार को गिराने के लिए सम्पूर्ण मंत्रिमंडल पसीना बहा रहा था।
कोरोना जैसे बीमारी को भारतीय मीडिया नजरअंदाज करके अहमदाबाद में नमस्ते ट्रंप की पीआर में जुट कर ट्रंप के पोस्टर और स्टेडियम को गूगल बना रहा था।
कोरोना अब तक अंतरराष्ट्रीय महामारी बनकर उभर चुका था लेकिन भारत के टीवी चैनल के लिए कोरोना को एक मामूली खबर बताई जाती रही।

उधर ताईवान ने काम जारी रखा
इधर ताईवान के डिजिटल मंत्रालय ने आर्टिफिशल इंटिलिजेंट का इस्तेमाल करते हुए हर जरूरी डेटा एक-दूसरे से जोड़ना शुरू कर दिया था।
बीमा कपनियों से विदेशों से आने-जाने वालों का न सिर्फ डेटा बल्कि वीज़ा विभाग से जानकारी एकत्र की जाने लगी।
इसके बाद 18 फरवरी 2020 तक ये तमाम जानकारियां मेडिकल स्टोर,अस्पताल लैब और सभी वाजिब जगहों पर उपलब्ध हो चुकी थीं।
वजह यह थी कि ताईवान में जो भी मरीज किसी अस्पताल, क्लीनिक या दवा दूकान पर जाए, उसकी यात्रा का इतिहास सबके पास मौजूद रहे।
ऐसे सभी लोगो के शरीर का तापमान लेकर उन्हें क्वारेंटाईन में भेजा जाता रहा।
आमतौर पर सरकारें ऐसी सूचनाओं का इस्तेमाल नागरिकों पर नियंत्रण करने के लिए करती रही है।
ताइवान के लिए ये कहना गलत न होगा कि उसने सर्वप्रथम इस मामले में जनता का विश्वास हासिल किया। लोगों को फोन पर रेड ज़ोन इलाके का अलर्ट जाने लगा, मास्क पहुँचाया जाने लगा।
खास चीज़ ये कि सरकार ने सभी निर्यात बंद कर अपने स्तर पर उत्पादन शुरू कर दिया।
देखते ही देखते जनवरी 2020 तक ताईवान के पास 4.5 करोड़ सर्जिकल मास्क बन कर तैयार थे।
ताईवान ने 2 करोड़ एन95 मास्क और एक हजार निगेटिव प्रेशर आइसोलेशन रूम बना कर खड़े कर दिए।
आइसोलोशन एक खास तरह का कमरा है, जो हवा का दबाव इतना कम रखता है कि संक्रमित हवा बाहर निकल जाती है।
ताईवान की रणनीति काम आई और उसने एक दिन में एक करोड़ मास्क बनाने का ऐलान कर दिया।
ताईवान की महामारी के खिलाफ जीत कि चार वजह रहीं- लोकतंत्र, पारदर्शिता, विश्वास और तकनीक, जिसके चलते ताईवान ने कोरोना पर काबू में कर लिया।

शिक्षित नेता, सफल सरकार
एक बात गौर करने वाली है कि ताईवान में पढ़े-लिखे लोगों को ही चुनने की परंपरा है।
ताईवानी राष्ट्रपति लंदन कॉलेज से पीएचडी हैं। उपराष्ट्रपति महामारी के अच्छे विशेषज्ञों में गिने जाते हैं।
किसी देश की कामयाबी और जीत के पीछे चुने हुए अच्छे लोगो का चयन काफी मायने रखता है।

भारत के दावे और सच
ऐसे समय में जब भारत ये दावा करे कि देश में कोरोना के बढ़ने की रफ्तार कम है, तो दावों पर ध्यान से गौर करना चाहिए।
तब गौर करने वाली बात और अहम हो जाती है जब ये दावा किया जाए कि हमने समय पर सही तैयारी और रणनीति को अंजाम दिया।
इस संकट में भारत अपनी बेहतर क्षमता का केसा इस्तेमाल कर रहा है।
ये हम सबके सामने है बेशक सरकारे गरीबो को खाना पहुँचा रही है।
सभी के बराबर समय पर टेस्ट हों रहे हैं।
सैम्पल टेस्ट में सरकार के अनुसार हम किसी से पीछे नही हैं।
घर-घर लोगो को सहूलियतें प्रदान की जा रही है।
शायद यही वजह है कि ‘मन कि बात’ को जनता मन से न सिर्फ सुनती है बल्कि पूरी निष्ठा के साथ उस पर अमल करती आ रही है।
लेकिन मज़दूरों का पलायन, किसानों की फसल, घरों में भूखे मर रहे लोगों, अस्पतालों में मास्क, मेडिकल उपकरण, वेंटिलेटर, डॉक्टरों, इलाज के वक़्त संक्रमण के बाद हो रही मौतें, इन सब पर खास रणनीति की जरूरत है, जिस पर ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा गया।
देखा जाए तो सरकार से कहीं चार हाथ आगे, हर छोटी-बड़ी संस्थाएं, मंदिर-मस्जिद, ट्रस्ट, आम लोग खुद के पैसों से लोगो की मदद कर रहे हैं।
तालाबंदी तो चोर से घर कि सुरक्षा का एक जरिया मात्र है लेकिन चोर का इंतज़ाम करना, उसे खत्म करना होगा।
इसके लिए हमें ठोस रणनीति और मजबूत कदम की जरूरत है।

अब्बास नकवी
लेखक मुंबई के पत्रकार हैं।

From The FB Wall of Abbas Naqvi Journalist
April 18 at 9:01 PM

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