संकट में महंत समाजसेवा करे तो उसमें कौनसी बड़ी बात?

एक पोस्ट लिखी थी कि कोरोना संक्रमण के समय किस तरह एक मंदिर के रास्तों को पीले रंग के बेरीकेड्स से घेर दिया है। इसमें मैंने कहा था कि मंदिर के सामने वाली सार्वजनिक जगह को महंत अपने कब्जे में रखना चाहता है और इसके लिए अवसर खोजता रहता है। इस पर तत्काल प्रभाव से तीखी प्रतिक्रियाएं मिलने लगीं।

एक ने लिखा मस्जिद के बारे में लिख कर देखो, पतलून उतर जाएगी।

एक मित्र, जिन्हें मैं बड़ा भाई मानता हूं, उन्होंने महंत के सामाजिक कार्यों की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह सब सरकार के आदेश से मंदिर की सुरक्षा के लिए है। बड़े भाई की बात मानना मेरा कर्तव्य है।

मैंने सोचा कि पोस्ट सरकार के आदेश का उपहास करने वाली हो सकती है, इसलिए मैंने इसे तत्काल हटा लिया।

कुछ लेकिन सवाल मेरे दिमाग में है। मंदिर की सुरक्षा किससे की जा रही है? क्या मंदिर में बीमारी प्रवेश करेगी? मंदिरों पर हमला करने के लिए कौन आततायी नगर में प्रवेश कर चुका है?

मंदिर में भगवान की प्रतिमा होती है, जिसके सामने लोग अपना दुख-दर्द दूर करने की प्रार्थना करने के लिए पहुंचते हैं। दुख-दर्द दूर होने के बाद कहते हैं भगवान ने हमारी सुन ली। वे प्रतिमा के सामने धन प्रस्तुत करते हैं, जो सीधे महंत की तिजोरी में जाता है।

मैं भी एक मंदिर में पुजारी रह चुका हूं। वहां भी एक महंत थे, जो साधु थे। मेरी जानकारी में अधिकतर मंदिरों के महंत साधु-संत ही होते हैं।

इस क्षेत्र में लेकिन कई मंदिर हैं, जहां महंत की पदवी गृहस्थ संभाले हुए हैं। उन्हें धर्म का ज्ञान नहीं होता। वे धर्मसम्मत नियमों का पालन भी नहीं करते। उनके पास महंगे वाहनों का काफिला होता है। वे राजनीति में भूमिका निभाते हैं। एक से ज्यादा स्त्रियों से संबंध रखते हैं। मंदिर के चढ़ावे से राजा की तरह वैभवशाली जीवन व्यतीत करते हैं।

इस समय एक बीमारी की आशंका से हड़कंप मचा हुआ है।

इस परिस्थिति में सवाल लाजिमी है कि धर्म का स्वरूप क्या है? क्या यह भोलेभाले भारतीयों की आस्था का व्यापार नहीं है? क्या प्रतिमा में भगवान है जिसकी सुरक्षा सरकार को करनी पड़ रही है? और महंत अगर संकट के समय समाजसेवा कर रहा है तो क्या वह अपनी निजी कमाई से कर रहा है?

जिस तरह सरकार जनता के धन से चलती है, उसी तरह मंदिर भी जनता के धन से ही चलते हैं। मंदिर से होने वाली कमाई का कुछ हिस्सा यदि समाज के लिए खर्च कर भी दिया जाए तो उसमें कौन सी बड़ी बात है?

इन सवालों के मद्देनजर मैं श्रद्धालुओं के धन से विलास करने वाले उस महंत की समाजसेवा की प्रशंसा नहीं कर पा रहा हूं। यह तो उसका कर्तव्य है, जो उसे हमेशा ही करते रहना चाहिए। क्या मेरी बात गलत है?

श्रषिकेश राजोरिया

Rishikesh Rajoria FB post on April 8 at 11:36 AM

लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। इससे इंडिया क्राईम के संपादक या प्रबंधन का सहमत होना आवश्यक नहीं है – संपादक

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