हथियारों का कुटीर उद्योग – भाग 7

सिकलीगरों का हाले-दर्द – जाएं तो जाएं कहां

सिकलीगरों के लिए हालात ऐसे बन चले हैं कि ये पूरा का पूरा समुदाय ही संकट के दौर से गुजर रहा है। उनकी कहानी पर कोई आसानी से भरोसा नहीं करता है। वे उन्हें तो बस अपराधी के अक्स में ही देखते हैं। ऐसे में सिकलीगर समाज के मुखिया दीवान सिंह के साथ क्या-क्या होता होगा, यह कोई नहीं जान सकता। उनके दर्द का अहसास तो उसी को हो सकता है, जो उस दर्द को भोग पाया हो। उनके अंतहीन दर्द की कहानी, उन्हीं की जुबानी सुनें तो बेहतर होगा। इंडिया क्राईम के लिए देश के ख्यातनाम खोजी पत्रकार विवेक अग्रवाल ने इस इलाके के अंदर तक जाकर पूरी पड़ताल की। इंडिया क्राईम की यह बेहद खास और एक्सक्लूसिव रपट –

 

दीवान सिंह की कहानी भी अजीब है। सरकारी भरोसे पर उन्होंने अपने तमाम दस्तावेज पेश किए तो एक लाख रुपए बतौर कर्ज मिल गए, ढाबा खोलने के लिए जमीन मांगी तो मिल गई लेकिन सरकार ने उसके लिए एक लाख पिच्यानवे हजार रुपए बतौर किराया मांग लिया। याने कि जितने की मुर्गी नहीं उतने का मसाला। जिद्दी दीवान सिंह ने वहीं ढाबा बना लिया तो अब स्थानीय नगरपालिका उनके ढाबे को अतिक्रमण मान कर छापे मारती रहती है।

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धार से तकरीबन 90 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव सिंघाना, जहां पंद्रह बीस घर सिकलीगरों के बसते हैं। वहीं हाईवे के एक तिराहे पर है छोटा सा एक ढाबा, जिस पर मिलते हैं दीवान सिंह। दीवान सिंह इलाके के तमाम सिकलीगरों के मुखिया हैं। उनको दर्द है तो इस बात का कि हर कोई उनके साथ झूठ का ही मायाजाल रचता है।

 

सिकलीगर समाज के नेता दीवान सिंह कहते हैं, “मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जी थे, उन्हें हर स्थिति से अवगत करवाया, सब कुछ बताया। उनके बाद में उमाजी आईँ। उनसे भी हम मिले। काफी प्रयास किया। उमाजी ने अपन एक निजी सचिव श्री शर्मा को निर्देश दिया कि हमें मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास होने चाहिएं। पुलिस हमें परेशान करती है, तो इन्हें बचाया जाए। कलेक्टर को आदेश दिया। कलेक्टर ने हमारे डेरों में दल-बल समेत कैंप लगाए। हमारे दस्तावेज लिए। हमें कहा कि मुख्यधारा से जोड़ेंगे। सभी अधिकारियों को भी आदेश मिले थे। उन सबने काम तो शुरू किया, इस बीच उमाजी चली गईं, और सारा काम वहीं ठप्प हो गया।“

 

दीवानजी चाहते हैं कि सिकलीगरों को वैकल्पिक कामकाज मुहैय्या करवाने के लिए सरकार तो पहल करे ही, समाज भी उनका साथ दे। लेकिन अफसोस कि ऐसा होता नहीं है। दीवान सिंह कहते हैं, “ वो चाहें छोटे हों या बड़े हों, वो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हथियार ही बनाते हैं। वे घरों में बनाते हैं, जंगलों में बनाते हैं, गांव में बनाते हैं, छुप कर ही हथियार बनाते हैं, इसके सिवा कोई धंधा तो है नहीं। जमीन भी नहीं है कि खेती-बाड़ी कर लें। या सरकार अगर सिकलीगर समाज को आदिवासी का दर्जा दे देती तो उससे शिक्षा से लेकर रोजगार तक में काफी सुविधा मिल सकती है। किसी तरह का कर्ज मिल सकता तो भी काफी मदद हो जाती। हमारा कोई नेता भी तो नहीं है जो सिकलीगरों की आवाज शासन तक पहुंचा सके।”

 

दीवान सिंह को इस बात का भी गुस्सा है कि उनके लोगों को सरकार नौकरी क्यों नहीं देती। अगर उनको हथियार बनाने के कारखानों में नौकरी दी जाए, तो वे बेहतरीन हथियार बना सकते हैं। दीवान सिंह कहते हैं, “अगर शासन यह सोच ले कि सिकलीगरों को भी रोजगार की गारंटी दे, या किसी कारखाने में, या हथियार बनाने के कारखानों में सिकलीगरों को काम दें, तो ये तय है कि वे अच्छे से अच्छा हथियार बना कर दे सकते हैं। सरकार भी जो हथियार नहीं बना सकती है, वो भी हमारा समाज बना कर सरकार को दे सकता है।”

 

अब अपने ढाबे के जरिए किसी तरह आजीविका चलाने की जुगत में लगे दीवान सिंह को यह समझ नहीं आ रहा है कि किस तरह से उनके समाज और उनका भी उत्थान होगा। वे तो बस कोशिशों में ही लगे हुए हैं कि किसी भी तरह सरकार तक उनकी आवाज तो पहुंचे।

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