मटका माफिया के बुरे दिन #04: मेनबाजार मटका में लूटपाट का बोलबाला

  • मेन बाजार मटका में खेलियों से धोखाधड़ी
  • सबसे कम रकम वाले आंकड़े खुलते हैं मेन बाजार में
  • पप्पू सावला ने बदले मेन बाजार के नियम
  • मटका किंग रतन खत्री की बनाई साख कर दी खत्म

विवेक अग्रवाल

मुंबई, 2 जुलाई 2019

मटका किंग कल्याणजी भगत और रतन खत्री की बनाई साख अब मटका सट्टे में खत्म हो चुकी है। इसके पीछे कारण मेन बाजार मटका में खेलियों से धोखाधड़ी को माना जा रहा है। अब मेन बाजार में वही आंकड़े खुलते हैं, जिस पर सबसे कम रकम के दांव लगे होते हैं। अपना फायदा बढ़ाने के चक्कर में मेन बाजार मटके के संचालक पप्पू सावला ने नियम बदल डाले हैं।

भगत-खत्री का दौर खत्म

मुंबई के वरली बाजार मटका से कल्याणजी भगत द्वारा शुरु किए गरीबों के जुए ने हिंदुस्तान में सब कुछ बदल कर रख दिया। रतन खत्री उनके पास आंकड़े लगाता था। उसने 12 अंकों के वरली बाजार को शून्य से नौ तक के अधिक सरल और बेहतर मेन बाजार मटके से तब्दील करके मटका किंग की गद्दी हथिया ली।

रतन खत्री ने मेन बाजार मटके का आगाज करने के लिए एक प्रेस कॉंफ्रेंस बुलाई थी। उस जमाने में पत्रकारों को एक दुकान में बुला कर शानदार नाश्ता और कोड्रिंक्स व चाय के बाद रतन खत्री ने कहा कि उसने आज से जुए का नया सिलसिला शुरु किया है। इसे मटका कहा जाएगा क्योंकि इक्के से दहले तक ताश के पत्ते मटके में डाले जाएंगे। दहले को शून्य का आंकड़ा माना जाएगा। तीन पत्ते मटके से निकाले जाएंगे। जो पत्ते निकलेंगे, वे ही आज के आंकड़े होंगे।

इस आसान से जुए ने चंद दिनों में ही रतन खत्री को पूरे देश में मशहूर कर दिया। उसने बेहद ईमानदारी से आंकड़े खोलना और जीती रकम लोगों को बांटना शुरू की।

90 का दशक बीतते-बीतते तो मटके में गलाकाट प्रतियोगिता और अंडरवर्ल्ड के दखल ने मटका संचालकों को लालची बना दिया। मटके पर कब्जे के लिए हत्याएं तक होने लगीं। ऐसे में अरुण गवली गिरोह की मदद से रतन खत्री से जबरन कब्जाए मेन बाजार पर पप्पू हीरजी सावला ने कब्जा कर लिया। इसके बाद अपना नफा बढ़ाने के लिए रतन खत्री के तौर-तरीके पूरी तरह पप्पू सावला के गिरोह ने बदल दिए।

आंकड़ों में फेरबदल

भगत-खत्री के वक्त में दिन भर की जमा रकम का 80 फ़ीसदी पंटरों या खेलिया में बांटा जाता था। उनका कहना था कि लोगों को पैसा बांटेंगे तो वे हमारे पास खेलने आएंगे।

पप्पू सावला ने तय किया कि ओपन और क्लोज के लिए जो रकम लग रही है, उनके आंकड़ों का पूरा डेटाबेस कंप्यूटर में डाला जाएगा। जिन आंकड़ों पर सबसे कम पैसा लगा होगा, वही आंकड़ा खोला जाएगा। इससे उन्हें अधिक फायदा होगा।

पारदर्शिता खत्म

भगत-खत्री के कामकाजी दिनों में सड़क चलते तीन लोगों को बुला कर तीन पत्ते खिंचवा कर सबके बीच में ही आंकड़े खोले जाते थे। पारदर्शिता के जरिए विश्वास जमाए रखने की यह सबसे शानदार कसरत होती थी। कई बार तो यह भी देखा गया कि रतन खत्री किसी फिल्मी पार्टी में है। वहीं पर जेब से ताश की नई गड्डी निकाल कर गुलाम, बेगम, बादशाह, जोकर हटा कर बाकी बचे पत्तों से आंकड़े खुलवाता। पार्टी में मौजूद फिल्मी सितारों से वह पत्ते खिंचवा लेता था। उसके आदमी तुरंत वहीं से आंकड़े बुकियों को बताते।

पप्पू सावला ने तय किया कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। मेन बाजार के आंकड़े वह अपनी मर्जी से खोलने लगा। पारदर्शिता खत्म हो गई। इसके चलते साख और विश्वसनीयता भी खत्म हो गई।

टाईम बदला

रतन खत्री के दौर में ओपन के लिए ठीक रात 9:00 बजे और क्लोज के लिए 12:00 बजे दिन में आंकड़े खुलते थे। वह वक्त का बड़ा पाबंद था।

पप्पू सावला द्वारा मेन बाजार मटका पर कब्जा करने के बाद ओपन के आंकड़े 9:45 पर आने लगे क्योंकि उन्हें कम दांव लगे आंकड़ों की खोज करनी होती है। यही स्थिति क्लोज के आंकड़ों के लिए भी हो चुकी है, इसका वक्त बढ़ कर 12.30 हो गया है।

तुरंत आंकड़े बताना जरूरी

रतन खत्री हमेशा ऐसी जगह से मटका आंकड़े खोलता, जहां कम से कम तीन फोन मौजूद हों। आंकड़े खुलते ही देश के 3 सबसे बड़े बुकियों के पास फोन करके आंकड़े बताए जाते। उनके पास से दूसरे दर्जे के बुकियों तक फोन जाते।

वर्तमान में वक्त की पाबंदी जैसी कोई बात ही नहीं रह गई है। अब अपनी जरूरत के हिसाब से मटका खोला जाता है।

मटके में छुट्टी

पुराने दौर के मटका कारोबार का एक जानकार बताता है कि भगत-खत्री त्यौहार के दौरान पांच दिनों के लिए मटका बंद करवाते थे। दीवाली, होली, ईद, क्रिसमस, गणेश चतुर्थी जैसे तमाम बड़े त्यौहारों के पांच दिन पहले से मटका कारोबार बंद कर देते थे। रतन खत्री कहता था कि लोग त्योहार मनाने के लिए मिली रकम, मटके में लगा देंगे तो घर-घर में कोहराम मच जाएंगा। उसकना माना था कि गरीबों की हाय का पैसा कभी नहीं फलता।

इस सूत्र के मुताबिक पप्पू सावला ने मेन बाजार मटके में ‘छुट्टी का सिस्टम’ ही बंद कर दिया है। पप्पू सावला का गैंग गरीबों को लूटने पर आमादा है।

मटका खेलने वालों के बीच आज भी जुए की यह सबसे भरोसेमंद और सस्ती व्यवस्था न केवल विश्वसनीयता खो चुकी है, काफी हद तक निचले पायदान पर सरक गई है। धीरे-धीरे यह खत्म होने की कगार पर है।

जारी: मेनबाजार मटका बंदी के पीछे कोल्हापुर पुलिस

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