जब इलाहाबाद में पहली बार गरजी एके 47: जवाहर पंडित हत्याकांड

अंकित तिवारी

प्रयागराज, 28 मई 2020।

13 अगस्त 1996 को पहली बार इलाहाबाद में एके-47 गरजी थी। जवाहर पंडित की हत्या काफी हाउस सिविल लाइंस के पास हुई थी। बालू खनन के ठेके और सियासी वर्चस्व की लड़ाई बनी थी कारण। जवाहर यादव मुलायम सिंह यादव को बेहद करीबी था।

1996 में स्वतंत्रता दिवस से ठीक 2 दिन पहले जब देश भर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रहती है, इलाहाबाद शहर एके-47 से दहल गया था। शाम करीब 6:00 बजे हमलावर फायरिंग करके फरार हो चुका था। हमले में दबंग नेता जवाहर यादव उर्प जवाहर पंडित की मौके पर ही मौत हो गई थी।

जवाहर यादव के भाई गुलाबी यादव ने सिविल लाइंस में मुकदमा दर्ज कराया।

इस मामले में करवरिया बंधु के ऊपर मुकदमा दर्ज हुआ। 23 वर्ष 2 महीने 18 दिन बाद एडीजे कोर्ट ने फैसला सुनाया।

आईपीसी की धारा 302, 307, 142, 148, 149 आर्म्स एक्ट की धारा 7 में अदालत ने दोषी माना। उन्हें सश्रम उम्रकैद और 7.20 लाख जुर्माना सुनाया।

बचाव नहीं माना अदालत ने

अपने बचाव पक्ष में उदयभान ने अदालत में कहा कि हत्या के दिन शहर के बाहर बीजेपी नेता कलराज मिश्रा के घर पर थे। कोर्ट ने उनसे रसीदी टिकट दिखाने को कहा जो वे पेश नहीं कर सके। उनके बड़े भाई कपिल मुनि करवरिया के पक्ष में कलराज मिश्रा गवाही देने भी आए, जो कोर्ट ने अस्वीकार कर दी। कपिल मुनी और सूरज भान करवरिया ने बताया कि उस दिन वे रसूला घाट पर थे। उसकी फोटो भी दिखाई लेकिन अदालत ने जब नेगेटिव मांगा तो वे पेश नहीं कर सके।

बचाव पक्ष की ओर से पेश गवाह रमेश का बयान दर्ज हुआ। अभियोजन पक्ष की ओर से रमेश गुप्ता और वादी के अधिवक्ता विक्रम सिंह ने पक्ष रखा। एडीजे कोर्ट ने फैसला सुनाया।

कलराज मिश्र ने तत्कालीन राज्यपाल को रमेश भंडारी को खत भी लिखा था लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ।

सजा के खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

मुकदमे के दौरान मरे कई आरोपी

हत्या में आरोपी मौला महाराज की 1996 में बीमारी के बाद मौत हो गई। बाकी तीन आरोपियों को अदालत ने सजा सुनाई।

जवाहर यादव हत्याकांड के दौरान उनकी गाड़ी के ड्राइवर गुलाब यादव की भी मौत हुई थी। कल्लन यादव और उनके सहयोगी बच निकले थे जो बाद में उनकी बीमारी के कारण मर गए।

देवी भक्त जवाहर पंडित

बताते हैं कि जवाहर यादव देवी मां का बहुत बड़ा भक्त था। जिसके कारण उसके साथी उसे जवाहर पंडित कहने लगे थे।

जौनपुर के छोटे से गांव खेड़ा से निकल कर इलाहाबाद की झांसी में साम्राज्य स्थापित किया था।

उसने शराब के ठेकों से बेशुमार दौलत कमाई। 1981 में मुलायम सिंह से मुलाकात करके 1989 में विधायक बना।

प्रयागराज के जोशी विधानसभा से बाहुबली विधायक रहे जवाहर यादव उर्फ पंडित की सियासी अदावत कई लोगों से थी।

विजमा यादव बनीं विधायक

जवाहर यादव की शादी 1990 में विजमा यादव से हुई थी। शादी के 6 साल बाद ही जवाहर यादव की हत्या हो गई। उसके बाद विजना यादव ने घूंघट से निकल कर सड़क पर पति के हत्यारों को चुनौती दी। उन्होंने राजनीति में हाथ आजमाया। सीधे चुनाव लड़ा। चुनाव जीत कर विधानसभा में पहुंची।

करवरिया की पत्नी भी बनी विधायक

इसी तरह उदयभान करवरिया के जेल जाने के बाद उनकी पत्नी नीलम करवरिया प्रयागराज के मेजा विधानसभा से चुनाव लड़ी। वर्तमान में विधायक है।

करवरिया परिवार की दबंगई

इलाहाबाद और कौशांबी की राजनीति में लंबे समय तक दखल रखने वाले करवरिया बंधु परिवार भले एक हो लेकिन सत्ता के लिए अलग-अलग दलों से टिकट पर चुनाव लड़े और जीते भी।

सन 2000 में कपिल मुनि कौशांबी से जिला पंचायत अध्यक्ष बने। 2009 में बीएसपी के टिकट पर प्रयागराज के फूलपुर से सांसद बने। उदयभान 2002 में 2007 में 12 से चुनाव जीते।

छोटे भाई सूरजभान 2005 में मंझनपुर से ब्लॉक प्रमुख रहे। 2010 में इलाहाबाद कौशांबी के विधान परिषद सीट से एमएलसी चुने गए।

करवरिया मंझनपुर के चकनारा गांव के थे। जगन नारायण 1967 में सिराथू चुनाव से लड़े लेकिन हार गए। बेटे वर्सेस नारायण उर्फ भूखल महाराज ने इलाहाबाद उत्तरी दक्षिणी से निर्दलीय लड़ा लेकिन हार का सामना करना पड़ा।

तीसरी पीढ़ी उदयभान कौशांबी से जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। 1997 में इलाहाबाद 12 विधानसभा से सीट से जीते। 2012 में इलाहाबाद की उत्तरी से चुनाव लड़े उदयभान लेकिन हार का सामना करना पड़ा।

इनके पिता जगन नारायण करवरिया, भाई वशिष्ठ नारायण दबंग थे। 1970 में दोनों भाई इलाहाबाद आए। रियल एस्टेट के धंधे में बादशाह बनकर उभरे।

जालंधर के साहित्यकार उपेंद्र नाथ अश्क खुसरो बाग में रहते थे। उपेंद्र नाथ अश्क उन दिनों इंदिरा गांधी के बेहद करीबी थे। उनका भी मकान खाली कराने के लिए करवरिया बंधुओं ने दबाव डाला लेकिन सफलता नहीं मिली। 1993 में सरकार बैकफुट पर आई तो करवरिया बंधु का बालू का काला कारोबार ठप हो गया। 1996 बदला चुकाया।

पंडित को अंदाजा था कि करवरिया बंधु उनसे हिसाब बराबर करने की फिराक में थे। विधानसभा भंग होने के बाद उन्हें मिली सुरक्षा खत्म हो गई। इसके बाद ही उन पर विरोधियों के गुस्से का नजला फूटा था।

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