किताब : दत्तात्रय लॉज: बॉलीवुड के बरबाद सपनों की बारात

दत्तात्रय लॉज: बॉलीवुड के बरबाद सपनों की बारात
लेखक – विवेक अग्रवाल
पृष्ठ – 184 / अध्याय – 20

‘दत्तात्रय लॉज’ बॉलीवुड के स्ट्रगलरों की कठिन और हैरतनाक जिंदगी के तमाम पहलू समेटते चलती है।

यह कहानी गोरेगांव की दत्तात्रय लॉज और उसके मैनेजर बाबू भाई के इर्दगिर्द चलती है। रुपहले परदे के पीछे की सच्चाईयां आपको हतप्रभ कर देंगी।

सत्य एवं मिथक के बीच बाल भर का अंतर होता है। मिथक में बसे सत्य की पड़ताल ही किसी रचना के साथ चल पड़े, तो कहना क्या। दत्तात्रय लॉज में दोनों की ब्लेंडिंग है। यहां बसे मिथक व सत्य, बॉलीवुड को भेदते, गंदगी उघाड़ते चलते हैं।

बॉलीवुड में चमकने की लाखों ख्वाहिशें औ’ हजारों ख्वाब लिए लोग दत्तात्रय लॉज में आते हैं। यहां का हर शख्श ‘स्ट्रगलर’ है। उनका स्ट्रगल एक वक्त बाद, जिंदा रहने का सवाल बन जाता है। ऐसे ही 22 स्ट्रगलरों की 21 कहानियां दत्तात्रय लॉज में कैद हैं।

कहानियां 21, तो स्ट्रगलर 22 कैसे?

एक स्ट्रगलर लॉज मैनेजर बाबू भाई भी तो हैं, या कहें कि इस ‘महाभारत’ के ‘एक्सक्लूसिव सारथी’ हैं।

दत्तात्रय लॉज में जिगेलो, सुपारी हत्यारे, देह के दलालों, झूठों-मक्कारों से सच्चे-सहृदय इंसानों तक, हर किस्म के किरदारों की कहानियां है। इतने किरदार कब-कहां-कैसे लेखक ने खोजे, पढ़े, जतन किए, यह ताज्जुब की बात है।

विवेक अग्रवाल का खोजी पत्रकार साहित्य रचते हुए भी मरता नहीं। वे हर किरदार के अंदर तक जाकर परत-दर-परत बेनकाब करते हैं। दत्तात्रय लॉज में भी उनका यह हुनर निखर कर दिखता है। उनकी नजरों से तथाकथित फिल्मोद्योग का वह रूप देखने को मिलता है, जो रुपहले परदे के पीछे आज तक बड़ी बेरहमी से छुपा कर रखा हुआ था।

द इंडिया इंक से प्रकाशित।

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