मानसिक ग़ुलामी के चक्रव्यूह से निकलें, वरना गमों की ये रात न लंबी होगी

आपको लगता है कि भारत में बहुसंख्यक, जो अल्पसंख्यकों के साथ कर रहे हैं, वो कुछ अनूठा है, पहली बार हो रहा है या सिर्फ यहीं हो रहा है, तो या तो आप बहुत ही मासूम हैं, या बहुत बड़े वाले मूर्ख।

दुनिया भर में बहुसंख्यक, या वो समूह, जो सत्ता में हैं, बाक़ी के साथ यही बर्ताव कर रहे हैं या करते रहे हैं, कुछ अपवादों के साथ।

पड़ोस के पाकिस्तान में सिख, हिन्दू, शिया, अहमदी, सुन्नी, जमाती की चर्चा ख़ूब होती है।

अफ़ग़ानिस्तान में पश्तून तो हज़ारा और ताजिकों को सांस भी नहीं लेने देना चाहते।

अमेरिका के काले, अफ्रीका के गोरे, ईरान इराक़ के सुन्नी, सऊदी बहरीन कुवैत के शिया, चीन के उगयुर, म्यांमार के रोहिंगिया, श्रीलंका के तमिल और मुसलमान तकरीबन तक़रीबन ऐसे हालात में जी रहे हैं।

रोज़ाना अपनी निष्ठा का सबूत देना है, समुदाय के छोटे से छोटे पाप का सामुदायिक अपराध बोध पालना है, शिक्षा, रोज़गार या बराबरी की बात नहीं करनी है और अधिकार मांगना दूर उसका ज़िक्र करना भी पाप है।

ऐसा इसलिए क्योंकि जो सत्ता में है या जिसके मन में आ गया है कि सत्ता हमारी है वो बाक़ी को अपना दास समझने की ग़लतफहमी में है।

इसमें एक वर्ग है जो खुद को शासक वर्ग समझ रहा है लेकिन बाक़ी के साथ मानवीय व्यवहार करना या दिखाना चाहता है।

इसमें में भी लेकिन बराबरी की भावना कम और दयाभाव ज़्यादा है।

दूसरा गुट है जो किसी भी क़ीमत पर अपनी सत्ता का अहसास दिलाना चाहता है।

तीसरा है जो चाहता है कि उसका प्रभुत्व पीढ़ी दर पीढ़ी क़ायम रहे।

इसके लिए उसे अपने अल्पसंख्यक की मानसिक दासता चाहिए।

दो हाथ दो पांव तो उसके भी हैं, तो दास कैसे बने?

इसके लिए दो चीज़ ज़रूरी है, डर और मानसिक समर्पण।

लिंचिंग, दंगे, मारपीट, झुंड बना कर हमले इसका हिस्सा हैं।

ये लेकिन तात्कालिक और छोटी अवधि की योजना का हिस्सा भर होता है।

लंबी अवधि में दोयम दर्जे की तरफ धकेलने के लिए ज़रूरी है कि सामने वाले में हीन भावना भरी जाए, उसकी सामाजिक और धार्मिक रीतियों का मज़ाक उड़ाया जाए, उसके पहनावे और रहन-सहन को लेकर सवाल खड़े किए जाएं। उसकी सोच और क्षमता को एक हद तक सीमित कर दिया जाए।

ऐसे हालात बना दें कि वो जीवित रहने को ही अधिकार मानने लगे। हमेशा खुद पर शर्मिंदा रहे और इस से आगे कभी कुछ सोचे न।

हीनता के इस दलदल में धकेलने को अंग्रेज़ी में ‘हेजेमनी’ कहते हैं।

अल्पसंख्यक समूहों के साथ ताक़तवर समूह यही कर रहे हैं।

आसान शब्दों में कहें तो दांत और नाख़ून तोड़कर भेड़ों का झुंड बना दीजिए और चार जंगली कुत्तों के साथ बाड़े में डाल दीजिए।

बहरहाल, परेशानी ये नहीं है कि ऐसा हो रहा है। परेशानी ये है कि लंबे अरसे से ऐसा हो रहा है लेकिन पीड़ित समूह न इसे समझ पा रहे हैं, न इससे बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं।

दांत नाख़ून नहीं हैं, कोई बात नहीं, वो जीवन के लिए सबसे अहम चीज़ नहीं हैं।

भाई लेकिन ये मत भूलिए कि आपके शरीर में आंख, कान, हाथ, पैर और दिमाग़ अभी भी हैं। इनका इस्तेमाल करना सीखिए।

हीनभावना से बाहर निकलिए, ख़ुद को शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक तौर पर मज़बूत कीजिए।

गली के कुत्ते की तरह रोटी निवाले पर आपस में लड़ना, फिरकापरस्ती और छोटी-छोटी बात पर रोना छोड़ कीजिए।

याद रखिए बराबरी मानसिकता से मिलती है, दांत, नाखून या डंडे से नहीं।

कोशिश कीजिए मानसिक ग़ुलामी के चक्रव्यूह से निकलने की, वरना गमों की ये रात न सिर्फ बेहद काली, बल्कि बहुत लंबी होने वाली है।

ज़ैग़म मुर्तजा

पत्रकार व लेखक

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