कोरोना के बहाने दुनिया को बदलने की साजिश

ऐसा लगता है कि दुनिया को साजिशन बदलने की कोशिश शुरू हो गई है।

पटकथा तैयार है। उसके अनुसार फिल्म पर काम चल रहा है।

चीन से एक वायरस आया कोरोना या कोविड-19। इसे पैदा किया या अपने-आप पैदा हुआ, तरह-तरह की बातें हैं। लेकिन यह आ गया है। इसने पश्चिमी देशों में तहलका मचाया। खासतौर से यूरोपीय देशों में और अमेरिका में।

अमेरिका और उसके पिछलग्गू करीब 28 देश दुनिया को अपने हिसाब से चलाने का प्रयास करते रहते हैं और एक हद तक सफल हैं।

सिर्फ चीन और रूस ऐसे देश हैं, जो इनके कहने में नहीं आते। जो देश इनके गुट में नहीं, उनको ये तरह-तरह से परेशान करते हुए अपने हिसाब से ढालने का प्रयास करते हैं। 

पिछली एक शताब्दी से इन अंग्रेजी आधारित देशों का यह एकसूत्री कार्यक्रम है। अर्थव्यवस्था और वैज्ञानिक, तकनीकी विकास इसका आधार है।

दूसरे महायुद्ध में विश्व के राजनीतिक स्वरूप में परिवर्तन हुआ। ब्रिटिश सल्तनत के अधीन कई देश स्वतंत्र घोषित हुए। वहां लोकतंत्र स्थापित हुआ। ब्रिटिश शासक अपने अधीन जिन देशों से गए, वहां कठपुतली सरकारें छोड़ गए। वहां उनके द्वारा स्थापित प्रशासन और न्याय व्यवस्था के आधार पर सरकारें चलती रहीं और लोकतंत्र का झंडा बुलंद बना रहा।

विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। एक चौथा स्तंभ सरकार और जनता के बीच सेतु बनाने के लिए मीडिया। इन चार खंभों पर टिका, इन देशों का लोकतंत्र और इन देशों का एक संगठन बना राष्ट्रमंडल।

इस समय राष्ट्रमंडल भारत, पाकिस्तान, आस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका, नाईजीरिया, न्यूजीलैंड सहित 53 स्वतंत्र राष्ट्रों का संगठन है, जिनकी अगुवाई ब्रिटेन करता है।

इन सभी देशों में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है और प्रशासन, कानून-व्यवस्था की रचना ब्रिटिश शासकों के दिमाग से हुई है।

जाहिर है, राष्ट्रमंडल में शामिल सभी देश दुनिया को चला रहे उन 28 देशों के अनुकूल हैं।

इस तरह दुनिया का दो तिहाई हिस्सा इन 81 देशों की ताबेदारी में है। इसका सिरमौर है अमेरिका। वह राजनीतिक तौर पर ब्रिटेन का जुड़वां भाई है और आर्थिक रूप से स्वतंत्र है।

अमरीका एक सदी से ज्यादा समय से विश्व में अपना आर्थिक दबदबा कायम रखने में सफल है।  

पिछले दिसंबर में जब चीन में कोरोना वायरस का आतंक फैला, तब कई ताकतें सक्रिय हुईं।

कोरोना नामक एक नया दानव धरती पर प्रकट हुआ है, उसे किस तरह संभाला जाए। चीन ने अपने तरीके से संभाला।

तब तक खबर फैलने लगी कि कोरोना के संक्रमण से बड़े पैमाने पर जनहानि की आशंका बनती है।

चीन ने जो कुछ किया, उसे देखकर अन्य देशों में भी खलबली मची। चीन से जो लोग विदेशों में गए, वे यह वायरस अपने साथ ले गए।

यूरोप में यह खतरनाक तरीके से फैला और जर्मनी, स्पेन, इटली आदि देशों में हजारों लोग मरने लगे।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कोरोना से पीडि़त हुए और उनका इलाज हुआ। इसका प्रचार भी बहुत हुआ। वहां की खबरें दुनिया में फैलने लगी।

जो देश अपनी स्वास्थ्य एवं चिकित्सा व्यवस्था पर गर्व करते आए हैं और विश्वस्तरीय माने जाते हैं, उन देशों में बहुत से लोग मरे तो उनकी प्रतिष्ठा को भी आघात लगा।

चीन और यूरोप में हुई व्यापक जनहानि के आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे वैश्विक महामारी घोषित किया।

गैर अमेरिकी, गैर यूरोपीय देशों में इसका प्रचार शुरू हुआ कि कोरोना नाम की भयानक बीमारी फैली है, जिससे लोग पलक झपकते मौत के नजदीक पहुंच जाते हैं। उन्हें बचाने के बहुत प्रयास करने की जरूरत है और पूरी दुनिया को ऐसे प्रयास करने चाहिए।

जिसे हम मीडिया कहते हैं, वह पूरी तरह पश्चिमी देशों से प्रेरित है, उन देशों के रंगढंग अपनाए हुए है।

टीवी चैनलों पर यूरोपीय वेशभूषा और विचारधारा का प्रचार प्रसार है। कोट, पेंट, शर्ट और अंग्रेजी तौर तरीके। महिलाएं हों या पुरुष।

भारत में इस समय कोई भी चैनल ऐसा नहीं है, जहां महिला एंकर भारतीय वेशभूषा में दिखाई दें। राष्ट्रमंडल के तमाम देशों में भी कमोबेश यही स्थिति है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन पश्चिमी देशों के हिसाब से स्वास्थ्य की रीति-नीति तय करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था है।

जब उसने महामारी की घोषणा की, तब सभी देशों में मीडिया के जरिए इसका जमकर प्रचार हुआ।

विश्व बैंक ने विभिन्न देशों के लिए रियायती दरों से कर्ज बांटने की योजना घोषित कर दी।

भारत सहित कई देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने आर्थिक प्रलोभन में विश्व बैंक के काउंटर पर कतार लगाई।

मीडिया ने खबर चलाई कि विश्व बैंक कोरोना से निबटने के लिए इमरजेंसी फाइनेंस कर रही है।

विश्व बैंक ने इस फंड में 40 देशों को आर्थिक सहायता देने के लिए 160 अरब (बिलियन) डॉलर की राशि आबंटित कर दी।

इस फंड से 25 देश सहायता ले चुके हैं। इसे हम गरीब देशों को आसान दरों पर दिया गया सस्ता कर्ज कह सकते हैं।

भारत की मोदी सरकार ने भी एक अरब डालर ले लिए। भारत के हिसाब से करीब 75,750 करोड़ रुपए से ज्यादा।

इस फंड से सहायता राशि प्राप्त करने वाले देशों को तीन शर्तों का पालन करना अनिवार्य है।

1. देश का हर नागरिक मास्क पहनेगा, अर्थात अपना मुंह छुपाएगा।

2. सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखना जरूरी है। मतलब लोग एक दूसरे से दो गज दूरी बनाकर रखें। गले मिलना, हाथ मिलाना बंद।

3. देश को दो-तीन महीनों के लिए लॉकडाउन करना जरूरी है।

जिन देशों के राष्ट्रप्रमुख आर्थिक लाभ के लिए कुछ भी कर सकते हैं, उन्होंने ये शर्तें मानीं और विश्व बैंक से सहायता राशि ले ली।

इन तीन शर्तों का पालन करने से कोई भी महामारी नहीं रोकी जा सकती।

इस तथ्य और सत्य के बावजूद इन देशों के राष्ट्रप्रमुखों ने ये शर्तें अपने यहां की जनता पर थोप दी और जबर्दस्ती उनका पालन करने के लिए लिए पुलिस लगा दी।

इन देशों के राष्ट्र प्रमुखों ने विश्व बैंक की शर्तों के मुताबिक अपने यहां तीनों शर्तें लागू करते हुए जनता के रोजमर्रा के जीवन पर अचानक ब्रेक लगा दिया।

अपने ही देशों के नागरिकों के जीवनक्रम को छह माह के लिए जबरन रोक दिया।

भारत के दुर्भाग्य से ऐसा जन विरोधी कार्य करने वाले राष्ट्र प्रमुखों में भारत के प्रधानमंत्री आदरणीय नरेन्द्र मोदी भी शामिल हैं।

इन शर्तों के लागू होने से दुनिया की तस्वीर बदल गई। कोरोना का तो कुछ नहीं बिगड़ा। इन देशों की आर्थिक व्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा।

सबसे ज्यादा नुकसान भारत को पहुंचा, जो कि इन देशों में सबसे विशाल, जबसे ज्यादा जनसंख्या वाला और 28 राज्यों, 9 केंद्र शासित प्रदेशों वाला स्वतंत्र गणराज्य है।

समझा जा सकता है कि कोरोना के बहाने विश्व बैंक के माध्यम से आधी दुनिया को इतना जोरदार झटका दे दिया है कि जिन विकसित देशों में कोरोना से बड़ी जनहानि हो चुकी है, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा।

जहां कोरोना से बहुत कम जनहानि हुई है, वे देश विश्व बैंक की शर्तों का पालन करते हुए घुटनों पर आ चुके हैं।

आज विश्व बैंक से मदद लेने वाले देशों में लॉकडाउन है। हर नागरिक को मास्क लगाना पड़ रहा है और सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखना जरूरी है। उत्पादन ठप है और खर्च की स्थिति बनी हुई है। मास्क का खर्च अतिरिक्त जुड़ गया है।

कोरोना से बचाव के लिए सेनिटाइजर, वेंटीलेटर, टेस्ट किट आदि का कारोबार अचानक बढ़ गया है।

कोरोना वायरस जितना फैल रहा है, उससे कई गुना ज्यादा मीडिया में उसका प्रचार है। हर चैनल पर, हर अखबार में कोरोना की खबरें हैं।

लोकतंत्र स्थगित है। विश्व बैंक के फंड से धनराशि प्राप्त करने वाले देशों के राष्ट्र प्रमुख मस्त हैं, जनता त्रस्त है।

महामारी अगर फैलती है, तो उसके आधार पर भी व्यापार खड़ा करने वाली कंपनियों की कमी नहीं है।

भारत भी विश्व बैंक से सहायता लेने के कारण विकट स्थिति में फंस गया है।

यह विकसित देशों की साजिश है। भारत सहित विकासशील देशों को आर्थिक रूप से गुलाम बनाए रखने का नया प्रपंच है, जो लोकतंत्र के आधार पर खुद को स्वतंत्र राष्ट्र मानते आ रहे हैं।

आदरणीय प्रधानमंत्री मोदी ने इस साजिश को नहीं समझा और सिर्फ 75,750 करोड़ रुपए के लालच में भारत को भी मुसीबत में डाल दिया।

क्या हम मोदी को देशभक्त मान सकते हैं? क्या इसी तरह भारत विश्व गुरु बनेगा?

ऋषिकेश राजोरिया

लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। इससे इंडिया क्राईम के संपादक या प्रबंधन का सहमत होना आवश्यक नहीं है – संपादक

Leave a Reply

%d bloggers like this:
Web Design BangladeshBangladesh Online Market