महामारी कानून के तहत जनता पर पुलिसिया अत्याचार शुरू

कुछ दिनों पहले की खबर है। जयपुर के पास दो युवक कार से कहीं जा रहे थे। उन्होंने मास्क नहीं पहन रखा था। पुलिस के जवानों ने उन्हें रोका और गिरफ्तार कर लिया। गाड़ी जब्त कर ली।

कर्नाटक में सीआरपीएफ का एक जवान अपने घर के बाहर मोटर साइकिल साफ कर रहा था। वहां से पुलिस वाले निकले। सीआरपीएफ जवान ने मास्क नहीं लगा रखा था। पुलिस वाले उसे पकड़ कर ले गए और हवालात में बंद कर दिया।

देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी कई खबरें आई हैं।

देख लें, पुलिस कोरोना नामक महामारी से ‘इस तरह’ बचा रही है।

पुलिस का कहना है कि वह 4 फरवरी 1897 को तत्कालीन अंग्रेज सरकार द्वारा लागू किए महामारी अधिनियम के तहत कार्रवाई कर रही है, जिसे हाल ही केंद्र की मोदी सरकार ने कोरोना के संदर्भ में लागू कर दिया है।

भारत में कोरोना संक्रमण महामारी के रूप में सामने नहीं आया है लेकिन कानून लगने के बाद पुलिस की जोर-जबर्दस्ती जरूर शुरू हो गई है।

क्या जनता द्वारा चुनी गई मोदी सरकार अंग्रेज सरकार के नक्शेकदम पर चल रही है, जिसका लक्ष्य ही भारत की जनता को गुलाम बना कर रखना था?

क्या मोदी सरकार भी भारतीय नागरिकों को गुलाम बना देना चाहती है? अगर ऐसा है तो कैसी स्वतंत्रता और कैसा लोकतंत्र?

मास्क न पहनने वालों के साथ पुलिस की जोर-जबर्दस्ती से यह कहां साबित होता है कि एक बीमारी से बचाव हो रहा है?

मोदी सरकार ने अगर महामारी कानून लागू किया है और कोरोना को महामारी मानती है, तो उसने अभी तक मेडिकल इमरजेंसी लागू क्यों नहीं की?

ऋषिकेश राजोरिया

लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं। इससे इंडिया क्राईम के संपादक या प्रबंधन का सहमत होना आवश्यक नहीं है – संपादक

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