दाऊद के भाई नूरा की हफ्तावसूली अलग चलती थी!

इंद्रजीत गुप्ता

मुंबई, 24 मई 2022

नूरा या नूर कासकर या नूर भाई या नूरुल हक नाम अपने बहुत बार सुना होगा। ये नाम है भाई के भाई का यानी दाऊद इब्राहिम के भाई का। जब छोटा भाई अंडरवर्ल्ड का भाई हो तो, बड़े भाई का भाई भी ‘बड़ा भाई’ होता है।

मुसाफिरखाना

मुंबई के मुसाफिरखाना इलाके में उन दिनों तस्करी हुआ करती थी। इस पर कब्जा करने की होड़ पठानों के साथ कोंकणी गिरोह कर रहे थे।

सन 1997 की बात है। मुसाफिर खाने के करीब की फीतिमा बिल्डिंग में कपडे की दुकान थी, जो बहुत अच्छी चलती थी। इसमें ज्यादातर विदेश कपड़े बिकते थे।

दुबई में बैठे नूरा को उसके मुंबई के प्यादों ने खबर दी कि फलां दुकान मोटी कमाई कर रही है। तब नूरा सपरिवार दुबई में रह रहा था। नूरा और दाऊद पाकिस्तान से अंडरवर्ल्ड पर नियंत्रण रख रहे थे।

नूरा की धमकी

कुछ दिनों बाद नूरा के दो गुंडे उस कपड़ा दुकान के मालिक के पास आए और कहा कि नूरा भाई से बात करने के लिए हमारे साथ चलो। वे कारोबारी को अपने साथ लेकर एक करीबी एसटीडी बूथ पर पहुंचे। वहां से दुबई में बैठे नूरा को फोन लगाया। कारोबारी से उन्होंने कहा कि लो नूरा भाई से बात करो।

दूसरी तरफ से फोन पर नूरा ने कहा कि मैं नूरा बोल रहा हूं। सुना है कि आपकी दुकान बहुत अच्छी चल रही है। तुम पचास लाख रुपए हफ्ता दो।

यह धमकी सुनते ही व्यापारी का तो पसीना ही छूट गया। उसे चक्कर आने लगे। दिन में ही तारे दिखने लगे। व्यापारी ने रोकर कहा कि नूरा भाई दुकान ठीक से नहीं चल रही है। आपको किसी ने गलत बताया है कि मुझे बहुत आमदनी होती है। व्यापारी फोन पर ही फूट-फूट कर रोने लगा।

दूसरी तरफ से सख्त लफ्जों में नूरा ने धमकी दी कि जैसे शीतल और रुपम स्टोर वालों को गोली मारी है, उसी तरह से तू भी मरना चाहता है क्या?

इस धमकी के बाद फोन कट गया।

इसके बाद तो नूरा के गुंडे लगभग हर रोज़ दुकान पर आ धमकते और कहते कि भाई से बात करो।

यह सिलसिला हर दिन चलता रहा। व्यापारी एसटीडी बूथ जाता, नूरा के आगे दुखड़े रोता, रोज़ कहता कि मेरे पास इतना पैसा नहीं है, नूरा भी हर दिन धमकी का पुराना टेप बजा कर फोन काट देता।

रोजाना फोन करके व्यापारी का फोन बिल आठ हजार रुपए हो चुका था। व्यापारी भी धमकियां सुन-सुन कर थक चूका था। उसके घर वाले भी परेशान हो गए। जब देखो, तब दुकान पर नबरा के गुंडे खड़े रहते थे।

पुलिस मिलीभगत

परेशान व्यापारी ने एक दिन नूरा के खिलाफ रमाबाई पुलिस चौकी (दुकान इस थाने के अंदर थी) और नागपाड़ा पुलिस चौकी (घर इस थाने की हद में था) में एफआईआर लिखाने गया।

पुलिसवालों ने उसे ही उल्टा कहा कि आप आपस में समझ लो, हम क्या करें।

पुलिस से नाराज़ होकर व्यापारी जब दुकान पर आया, तो नूरा के गुंडे उसके पास आए। उन्होंने व्यापारी से कहा कि तुम पुलिस स्टेशन गए थे ना, अब तुझे जहां जाना है, चला जा। हमारे खिलाफ कोई कुछ एक्शन नहीं लेगा। हमारे पास सब खबर आती है।

इससे एक बात तो साफ हो गई कि उन दिनों गिरोहबाजों का नेटवर्क कितना खतरनाक था। पुलिस भी मिली अंडरवर्ल्ड से मिलीभगत रखती थी।

दुकान पर ताला

एक दिन तो हद ही हो गई। नूरा के गुंडे दुकान पर आए। उन्होंने दुकान मालिक, कर्मचारियों और ग्राहकों को जबरन बाहर निकाल दिया। दुकान के दरवाजे बंद करके ताला लगा दिया। उन्होने व्यापारी से कहा कि जब तक हफ्ता नहीं मिलेगा, तब तक दुकान में ताला रहेगा।

अब तो व्यापारी ने हार मान ली। उसने नूरा भाई को समझौते के लिए उसके गुंडे से फोन करवाया।

सौदा खरा-खरा

नूरा ने दूसरी तरफ से व्यापारी से फोन पर बात की। उसने कहा कि नूरा भाई मेरे पास 50 लाख रुपए नहीं हैं लेकिन आपको पैसा देना चाहता हूं।

बहुत रोने-धोने और मिन्नतों के बाद नूरा ने कहा कि मेरा हफ्ता मत दे लेकिन मेरे छोकरों को कुछ खर्चा दे।

व्यापारी ने अभी भी बहुत मिन्नत मसाजत की लेकिन नूरा नहीं माना तो आखिरकार आठ लाख में सौदा पटा।

व्यापारी ने आठ लाख रुपए नूरा के गुंडों को देकर अपना पीछा नूरा और उसके गुंडों से छुड़ाया।

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