Mumbai Mafia: हाजी मस्तान का डायमंड क्लब भी कमाल था

इंद्रजीत गुप्ता

मुंबई, 25 मई 2022

60 और 70 के दशक में भारतीयों के लिए हज यात्रा का मुंबई से इंदिरा डॉक से समुद्र मार्ग से भाप के जहाजों द्वारा जाने का रहा है। मुंबई से ही हज यात्रा संभव होने के कारण तमाम देश के लोग मुंबई आते थे। यहीं हज यात्रियो को सरकार वीजा देती थी। हज यात्रियों के रुकने के लिए मुंबई में मुसाफिरखाना बना हुआ है।

हज यात्रियों को ले जाने वाले जहाज का नाम अल अकबरी और अल नूरजहां था। ये नूरजहां शिपिंग कॉर्पोरेशन याने भुंगल लाइन कंपनी के जहाज थे। इस जहाज में एक बार में 3,600 हाजी सफर कर सकते थे। 90 दिन का यह सफर होता था। हज कमेटी ऑफ इंडिया जिन हाजियों को पात्र ठहराती थी, उनके नाम बाकायदा अखबार में छपाए जाते थे। जो हज करना चाहते, वे एक फार्म भरते थे। फार्म के साथ एडवांस रकम पांच हजार रुपए भरनी होती थी। हज का खर्च उन दिनों 32 हजार पांच सौ रुपए होता था। इस रकम से हाजियों के किराए, सऊदी में हाथ खर्च के लिए 10 हजार रियाल सरकार देती थी। टिकिट ढाई हजार रुपए का होता था। हज कमेटी एक ड्राफ्ट भी अल राज़ी बैंक (सऊदी) का देती थी, जिससे खर्च के लिए रकम हासिल कर सकते थे।

उन दिनों लगभग 50 हजार लोग हज का फार्म भरते थे, लिहाजा लॉटरी से हाजियों का नंबर निकलता था। उस वक्त हज यात्रियों के लिए सरकार पासपोर्ट नहीं देती थी, हज कमेटी एक पासपोर्ट जारी करवाती थी, जो कि सिर्प हज के लिए ही मान्य होता था।

मुंबई से हाजी 20 से 22 दिन अंदर जेद्दाह पहुंचते थे। वहां से मक्का की दूरी तक़रीबन 100 किमी है। यह यात्रा बस से होती थी।

एक जहाज मुंबई से सऊदी जाता था, तो दूसरा वहां से मुंबई के लिए हज यात्रियों को भर कर वापस लाया था। तब जहाजों में सरकारी डॉक्टर तैनात होते थे, जो सफर में बीमार पड़ने वाले हाजियों का इलाज करते थे।

हज के आठ दिनों बाद मुंबई वापसी के लिए हाजी फिर जेद्दाह जाते थे। यहां हाजी खरीददारी करते थे।

हाजी अपना राशन साथ ले जाते थे क्योंकि सरकार खाना नहीं देती थी। वे दाल, चावल, सत्तू, आटा, अचार वदैरह साथ रखते थे। इसके कारण हाजियों के पास खाने-पीने का बहुत सामान होता था।

यह सामान उठाने के लिए हज कमेटी कुली देती थी। कुली के साथ में दो सब-कुली भी होते थे। 10 से 15 हाजी पर एक कुली और दो सब-कुली तैनात होते थे।

इस पृष्ठभूमि का लब्बोलुबाब यह है कि देश के सबसे बड़े सोना तस्कर हाजी मिर्जा मस्तान के काली दुनिया में आमद की राह समझ लें।

मिर्जा मस्तान से हाजी मस्तान तक

मुसाफिरखाना के ठीक बगल में हाजी मस्तान के वालिद ने साईकिलों के पंचर लगाने की दुकान कोली थी। इसका नंबर सात था।

उम्र के सात-आठ साल में मिर्जा मस्तान अपनी दुकान पर बैठ साईकिलों के पंचर बनाता था। पंचर की दुकान इतनी चलती नहीं थी इसलिए मस्तान कुछ परेशान रहता था। उसकी दुकान के ऊपर ही हाजी रहते थे इसलिए वह हज यात्रा के बारे में तमाम तफसील जानता था।

मिर्जा मस्तान जानता था हाजी कैसे हज के लिए आते-जाते हैं। क्या-किस तरह होता है। उसने हज कमेटी में पहचान बना कर जुगत लगाई और बतौर कुली इंदिरा डॉक पर काम करने लगा। अब वह हाजियों का सामान उठाने वाला कुली बन गया।

कुछ ही समय में उसने पंचर की दुकान बंद कर दी। उसने धीरे-धीरे हज के दौरान क्या-क्या जेद्दाह से लाया जा सकता है, सब जान लिया। वह जातता था कि हज यात्रियों की जांच और तलाशी नहीं होती है। जहाज से उतरो और सीधे बाहर निकल जाओ। हज यात्री कितना भी सामान लाएं, कोई पूछने वाला नहीं था। इसी का फायदा मस्तान ने भी उठाया।

हाजियों के साथ हज से वापसी में हाजी मस्तान उनके खजूर के टिन के डिब्बों में डाल कर सोना-चांदी मुंबई लाने लगा। खजूर का डिब्बा उस वक्त 20 और 25 किलो का होता था। उनमें भर कर सोना आसानी से लोग ले आते थे।

मस्तान का गिरोह

हाजी मस्तान के साथ कई और भी कुली सोना-चांदी तस्करी में जुड़ गए थे। ऐसा ही एक कुली अशरफू रहमान उर्फ लल्लू था, दूसरा मोहम्मद नूरा उर्फ नूरा अट्ठाईस था। जब भी जेद्दाह से सोना-चाँदी आता था, मस्तान के लोग नूरा की गाड़ी में माल रख कर गोदी से बाहर निकल जाते थे।

मोहम्मद नूरा उर्फ नूरा अट्ठाईस इसलिए कहते थे क्योंकि उसकी एंबेस्डर कार का नंबर 28 था। ये दोनों मस्तान के दांए और बाएं कहे जाते थे।

मस्तान का डायमंड क्लब

सन 1970 तक मस्तान ने बहुत पैसा कमा लिया। उसने मुसाफिरखाना के ठीक सामने अनीस चेंबर में आठ और नौ नंबर की दो दुकानें लीं। इन दुकानों में मस्तान ने एक क्लब बनाया, जिसका नाम रखा डायमंड क्लब। इस क्लब में मुंबई के सारे लफंगे-बदमाश जुआ खेलने आते थे। उस वक्त के बड़े दबंगों में करीम लाला, युसूफ पटेल, वरदराजन जैसे नाम होते थे, वे भी यहाँ जुआ खेलते थे।

कुछ समय बाद तो आलम यहे हो गया कि इस क्लब से मस्तान अपना साम्राज्य चलाने लगा।

कुछ समय बाद हाजी मस्तान ने डायमंड क्लब अशरफू रहमान उर्फ लल्लू को उपहार में दे दिया था।

लल्लू पिटा लेकिन जुबान न खोली

मस्तान का सोना बरास्ते समंदर मुंबई के गिरगांव चैपाटी पर आने की खबर डीआरआई (DRI,  Directorte of Revenue Intelgance) को लग गई। यह जानकारी लल्लू को भी मिल गई। लल्लू ने बड़ी चालाकी से माल सही-सालमत उतारा और गिरगांव चौपाटी की रेत में गाड़ दिया। डीआरआई अफसरान ने छापा मारा लेकिन माल नहीं मिला तो उन्होंने लल्लू को दबोच लिया।

डीआरआई अफसरान ने लल्लू से बहुत पूछताछ की लेकिन उसने जबान नहीं खोली। कई दिनों की पूछताछ के बाद लल्लू को छोड़ने के पर वे मजबूर हो गए। इसी से खुश होकर मस्तान ने लल्लू को डायमंड क्लब उपहार में दिया था। इस लल्लू का नाम 1993 बम कांड में भी आया था।

मस्तान ने अपनी साईकिल की पंचर पकाने वाली दुकान नंबर सात को नूरा अट्ठाईस के नाम कर दिया। नूरा ने दुकान को नया नाम दिया – समीर स्टोर। यह उसके बेटे के नाम पर थी। नूरा अट्ठाईस की दिल का दौरा पड़ने से मौत हो चुकी है। नूरा अट्ठाईस के बेटे समीर ने अब वह दुकान किराए पर दे रखी है।

****

Leave a Reply

%d bloggers like this:
Web Design BangladeshBangladesh Online Market