चिलम, चूना और चू… अर्थात राग मक्कारी

विवेक अग्रवाल

केशव पटेल एक किस्सा लाए, ऐसा उन्होंने अपनी बात में कहा है। मैं मानता हूं कि यह किस्सा आपबीती है। उनकी क्या कहूं, हर उस छात्र की कहानी, जो सपने लेकर कॉलेज पहुंचता है, इंकलाब जगाने समाज में जाना चाहता है लेकिन यहीं उसकी भ्रूण हत्या हो जाती है। कैसे? बस उसी का चित्रण राग मक्कारी है।

हीरो के जरिए केशव कहते हैं, “आंखों ही आंखों में हीरो की मुलाकात कुछ अन्य लोगों से हुई। कुछ अपने मिले, कुछ अपने वाले मिले।” तो रिश्तों की कई-कई परतें खुलती जाती हैं। यह समझ आज की जवान होती पीढ़ी में तभी आने लगती है, जब वे दस-बारह साल के बच्चे होते हैं।

केशव कथा कहते-कहते उसमें इस कदर डूब जाते हैं कि किस्सागोई से बतरसी में जा पहुंचते हैं। वे अपने आसपास के चरित्रों, वक्त और स्थानों का चित्रण हूबहू रखते जाते हैं। वे जब लिख रहे होते हैं, तो पूरी ईमानदारी बरतते हैं। जब उनके चरित्र घिनौनी राजनीति और लड़कियों के उन्नत उभारों के दर्शन में लिप्त हैं, तब भी वे घृणा के कम, दया के पात्र ही अधिक लगते हैं। उन्हें खलनायक कहना गलत है, वे भी इसी सिस्टम की पैदाईश हैं, लिहाजा वे भी विक्टिम हैं।

हीरो के व्यक्तिव का बयान करते हुए केशव आक्रामक होकर तंज करने से नहीं चूकते हैं, “उसके मरियल से चेहरे पर डर के निशान साफ तौर पर देखे जा सकते हैं। शर्ट का दांया हिस्सा पैंट के अंदर और बांया हिस्सा पैंट के बाहर है। पैंट को कमर ने नहीं बल्कि नितंबों ने संभाल रखा है। कुल मिला कर उसकी हालत देख कहा जा सकता है कि यह वही सूरत है, जिसे दिखा कर सरकार विश्व बैंक से किसी भी तरह का भारी-भरकम कर्जा ले सकती है।” व्यंग्य की यह शैली लुप्त सी होती जा रही है। कभी हरीशंकर परसाई और शरद जोशी जिस अंदाज में मार कर जाते थे, वह तेवर बना रहे, तो हिंदी साहित्य का भला होगा।

कॉलेज और विश्वविद्यालयों की राजनीति केशव ने करीब से देखी है, कहना गलत होगा। उन्होंने भोगी है, यही कथन सही होगा। उसी का सजीव चित्रण राग मक्कारी में प्रकट होता है। वे कोई मौका नहीं छोड़ते हैं, जब बड़े सरजी, सुदीप सडेरिया उर्फ गठान सर, अंजीव सर उर्फ फोकटा सर जी, गोकुल भैय्या, शर्मा जी, राकेश प्रताप सिंह उर्फ राकेश सर, अनंत सिंह, विक्की, पुष्पराज सिंह, सतीश आवेश, दिव्या, सुनीता, अशोक, जैसे चरित्रों के कारनामों के जरिए सारी कालिख कैंपस के बाहर उलीचते जाते हैं।

जिस पत्रकारिता संकाय की बात करते हुए शिक्षा संस्थानों की तमाम गंदगी को कालीनों के नीचे बुहार कर जनता के सामने लाते हुए केशव आगे बढ़ते जाते हैं, तो यह भय भी मन में भरता जाता है कि अब किसी भी शिक्षण संस्थान में उनके कितने दिन बचे हैं? खैर, वह लेखक ही क्या, जो दुनियावी दबावों से दब जाए।

केशव की कलम वाचाल नहीं, गंभीर है। वह इंकलाबी नहीं लेकिन आग उगलती है क्योंकि सच कहती और दिखाती है। उनका अंदाज मजेदार नहीं, बकबका है। हां, बिल्कुल आंवले के रस जैसा, जो खट्टा तो क्या लगे, कुछ कसैला ही होता है लेकिन उसके गुण कमाल होते हैं। शरीर को स्वस्थ रखते हैं। बस वैसे ही केशव की राग मक्कारी कसैला स्वाद मुंह में भरते हुए मन को सुकून देती चलती है। छात्र जीवन को जिस महीन छलनी से छान कर उन्होंने पेश किया है, वह जरूर ‘मनोरम’ की श्रेणी में आता है।

केशव की राग मक्कारी में एक अध्याय है – चिलम, चूना और चू… कायदे से किताब का यही शीर्षक है। हम लेकिन जानते हैं कि इस भीषण अंधभक्ति काल में, किताबों के ऐसे नाम धरना, खुद को सलमान रुश्दी और तस्लीमा नसरीन की श्रेणी में पहुंचाने जितना घातक है।

मैं मानता हूं कि राग मक्कारी का सार है – चिलम, चूना और चू… अर्थात राग मक्कारी। राग मक्कारी का महाघोषवाक्य है, “यह देश चुनौतियों से उतना परेशान नहीं है, जितना चूतियों से है…

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